राम दुःखी नहीं थे, हमारी दृष्टि दुःखी है
रामायण - वेदांत 2.0 Life
यथा दृष्टिस्तथा सृष्टिः, यथा चेतना तथा गतिः॥
परंतु सत्य यह है कि राम दुःखी नहीं थे, दुःखी हमारी दृष्टि है।
हम घटना को देखते हैं, राम चेतना में जीते थे। और दुःख का आकार घटना से नहीं, चेतना की ऊँचाई से तय होता है।
१. कर्म को बोझ नहीं, साधना बनाना
आज हमारे जीवन में जो कुछ घट रहा है, उसका बड़ा भाग हमारे ही पूर्व कर्मों का परिणाम है। जागरण का अर्थ कर्मों से भाग जाना नहीं है। भागना पलायन है; जागरण है—उसी कर्म को पूर्ण सजगता से जीना।
राम ने यही किया। उन्होंने वनवास को दंड नहीं, दीक्षा माना। राज्य को भोग नहीं, दायित्व माना। सीता-वियोग को केवल व्यक्तिगत शोक नहीं बनाया, बल्कि करुणा की व्यापकता में रूपांतरित कर दिया। इसलिए चौदह वर्ष का वनवास, रावण जैसा शत्रु और असंख्य कठिनाइयाँ भी उन्हें भीतर से तोड़ न सकीं।
जब दुःख सामने आया, तब उससे भी बड़ा धैर्य उनके भीतर पहले से उपस्थित था।
२. शास्त्रों की दृष्टि
शास्त्र बार-बार इसी सत्य की ओर संकेत करते हैं।
वाल्मीकि रामायण में कहा गया है—
प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्लौ वनवासदुःखतः।
अर्थात्—राम न तो राज्याभिषेक से अत्यधिक प्रसन्न हुए, न वनवास के दुःख से मुरझाए।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।
सुख-दुःख इन्द्रियों के स्पर्श मात्र हैं। वे आते-जाते हैं, अनित्य हैं। उन्हें पकड़ना नहीं, उन्हें आते-जाते देखना सीखो।
फिर स्थितप्रज्ञ का लक्षण बताते हैं—
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
जो दुःख में विचलित न हो और सुख में आसक्त न हो, वही स्थिर बुद्धि वाला है। राम इसी समता के मूर्त रूप हैं।
योगवशिष्ठ कहता है—
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
बंध भी मन है और मोक्ष भी मन। घटना बंधन नहीं बनाती; घटना को देखने वाली दृष्टि बंधन या मुक्ति बनाती है।
गोस्वामी तुलसीदास भी संकेत करते हैं कि सुख और दुःख समय के बदलते हुए वेश हैं; वे आत्मा का स्वभाव नहीं हैं।
३. मनोविज्ञान क्या कहता है?
आधुनिक मनोविज्ञान भी इसी सत्य की पुष्टि करता है।
मनोवैज्ञानिक रिचर्ड लाज़रस के Cognitive Appraisal Theory के अनुसार दुःख केवल घटना से उत्पन्न नहीं होता, बल्कि उस घटना के प्रति हमारे मूल्यांकन (Appraisal) से उत्पन्न होता है। एक ही घटना दो व्यक्तियों के लिए दो बिल्कुल भिन्न अनुभव बन सकती है।
विक्टर फ्रैंकल, जिन्होंने नाज़ी यातना शिविरों की भयावहता झेली, लिखते हैं कि जब मनुष्य से सब कुछ छीन लिया जाए, तब भी उसके पास एक अंतिम स्वतंत्रता बचती है—अपनी दृष्टि चुनने की स्वतंत्रता। यही स्वतंत्रता राम के जीवन में भी दिखाई देती है।
आधुनिक मनोविज्ञान Resilience (मानसिक लचीलापन) की भी बात करता है। मनुष्य के भीतर कठिन परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने और उनसे उबरने की अद्भुत क्षमता होती है। हम प्रायः दुःख को बड़ा करके देखते हैं, पर अपनी आंतरिक शक्ति को पहचान नहीं पाते।
इसके साथ ही हमारा मस्तिष्क Negativity Bias से भी प्रभावित होता है। वह खतरे और पीड़ा को पहले देखता है, संतुलन और सामर्थ्य को बाद में। इसलिए हमें राम का वनवास तो दिखाई देता है, पर वनवास में खिली उनकी समता नहीं दिखाई देती।
४. दृष्टि को बड़ा कैसे करें?
प्रश्न यह नहीं कि दुःख क्यों आया। प्रश्न यह है कि हमारी चेतना कितनी विस्तृत है।
प्रतिदिन एक छोटा अभ्यास करें। जब भी कोई कठिन घटना घटे, स्वयं से पूछें—
"यह केवल घटना है, या मेरी व्याख्या?"
घटना तथ्य है; दुःख प्रायः उसकी व्याख्या है। तथ्य को स्वीकार करें, व्याख्या को देखें।
दूसरा अभ्यास—तुलना छोड़ दें। हम राम को अपने अहंकार की कसौटी पर तौलते हैं और सोचते हैं—"यदि मैं होता तो टूट जाता।" यह हमारा भय है, राम का सत्य नहीं।
तीसरा अभ्यास—चेतना का पोषण करें। जैसे शरीर को प्रतिदिन भोजन चाहिए, वैसे ही चेतना को प्रतिदिन मौन, ध्यान, स्वाध्याय और सत्संग चाहिए। तब जब जीवन में कठिनाई आएगी, भीतर का पात्र पहले से बड़ा होगा।
जिस दिन अपनी आंतरिक शक्ति को देख लोगे, उसी दिन समझोगे कि जो राम के लिए लीला थी, वही हमारे लिए दुःख बन गई; क्योंकि हमारी दृष्टि बाहर अटक गई, भीतर नहीं पहुँची।
सूत्र
दुःख घटना में नहीं, दृष्टि में होता है।
चेतना को बड़ा करो, दुःख अपने आप छोटा हो जाएगा।
Independent Researcher & Philosopher Vedanta 2.0 Life ©
ORCID: https://orcid.org/0009-0000-8083-0685वैश्विक (International) संवाद हेतु विज्ञान और वेदांत के समन्वय का एक स्वतंत्र प्रयास।
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