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परिधि का विज्ञान: दूरी जितनी ज़्यादा, बैसाखियाँ उतनी बड़ी परिधि का विज्ञान: दूरी जितनी अधिक, सहारे उतने अधिक मनुष्य जितना अपने क...

परिधि का विज्ञान: दूरी जितनी ज़्यादा, बैसाखियाँ उतनी बड़ी

परिधि का विज्ञान: दूरी जितनी ज़्यादा, बैसाखियाँ उतनी बड़ी


परिधि का विज्ञान: दूरी जितनी अधिक, सहारे उतने अधिक
मनुष्य जितना अपने केंद्र से दूर होता है, उतनी ही उसकी आवश्यकताएँ बढ़ती जाती हैं। समस्या साधनों, धर्म, व्यवस्था, धन या विज्ञान में नहीं है; समस्या यह है कि हम स्वयं कहाँ खड़े हैं।
घर से दूर निकलने पर भोजन, वाहन, सुरक्षा, धन, मानचित्र और सहारों की आवश्यकता बढ़ जाती है। अपने घर में जिन चीज़ों की आवश्यकता नहीं थी, वे बाहर अनिवार्य लगने लगती हैं। यही नियम भीतर भी लागू होता है।
जो व्यक्ति अपने अस्तित्व के केंद्र से दूर है, उसे मनोवैज्ञानिक सहारों की आवश्यकता होती है—पहचान, प्रतिष्ठा, भीड़, मान्यता, गुरु, कर्मकांड, विचारधाराएँ और अनेक प्रकार की सुरक्षा। ये सब अपने-आप में बुरे नहीं हैं, किंतु जब वे भीतर की असुरक्षा की पूर्ति का साधन बन जाते हैं, तब वे बैसाखियाँ बन जाते हैं।
जितनी दूरी केंद्र से बढ़ती है, उतनी ही बैसाखियाँ बड़ी होती जाती हैं।
मनुष्य अपनी विवशता को अक्सर प्रेम, सेवा, त्याग, धर्म या सफलता का नाम दे देता है। पर कई बार इन सुंदर शब्दों के पीछे भय, असुरक्षा और अकेले होने की असमर्थता छिपी होती है। इसलिए बाहरी आचरण से पहले उसके स्रोत को देखना आवश्यक है।
यही परिधि का दुष्चक्र है। असुरक्षा अधिक हुई तो व्यवस्था बढ़ाई; व्यवस्था बढ़ी तो उसकी रक्षा का भय बढ़ा; भय बढ़ा तो और व्यवस्था खड़ी की। इस प्रकार मनुष्य साधनों का स्वामी नहीं रहता, बल्कि उनका संरक्षक बन जाता है। जिसे संसार सफलता कहता है, वह कई बार केवल बढ़ती हुई जटिलता भी हो सकती है।
जब मनुष्य थोड़ी देर शांत बैठता है, तब भीतर एक गहरा खालीपन और अंधकार दिखाई देता है। उसी से बचने के लिए वह निरंतर बाहर भागता है। बाहर की खोज का मूल कारण प्रायः भीतर से पलायन होता है।
वास्तविक धर्म किसी विश्वास, कर्मकांड या पहचान का नाम नहीं है। धर्म का प्रारंभ वहीं होता है जहाँ मनुष्य स्वयं को बिना भागे देखना आरंभ करता है। केंद्र पर लौटना ही धर्म है।
केंद्र पर स्थित व्यक्ति के लिए आवश्यकताएँ स्वाभाविक सीमा में रहती हैं। भोजन, जल, वायु और आश्रय जीवन के साधन हैं, जीवन का उद्देश्य नहीं। जब जीवन आवश्यकताओं से आगे बढ़ता है, तब शेष बचता है—सजगता, स्वतंत्रता और सहज आनंद।
इसलिए कहा जा सकता है—
परिधि पर व्यवस्था बढ़ती है, केंद्र पर चेतना।
परिधि पर सहारे बढ़ते हैं, केंद्र पर स्वतंत्रता।
परिधि पर भय रहता है, केंद्र पर केवल होना।
यही 'होना' धर्म है; शेष सब उसकी परिस्थितियाँ हैं।

​आपकी यह बात बिल्कुल अकाट्य है कि "समस्या वे विषय (साधन, धर्म-कांड, व्यवस्थाएँ) नहीं हैं, समस्या हमारा वहाँ खड़े रहना है।"


पुनः सूत्र व्याख्यान 

  • अनजानी दुनिया का भय: जब मनुष्य अपने केंद्र (स्वयं के होने) से दूर निकल जाता है, तो वह एक अनजानी, पराई दुनिया में खड़ा होता है। जैसे घर से दूर जाने पर चोरी, बीमारी, असुरक्षा और दुश्मनी का डर स्वाभाविक है, ठीक वैसे ही केंद्र से दूर होने पर आंतरिक असुरक्षा पैदा होती है।
  • कमजोरी को सफलता का नाम देना: जब हम केंद्र से दूर होते हैं, तो हमें भीड़, गुरु, भगवान, चौकीदार और मित्र सब चाहिए—पता नहीं कब किसकी जरूरत पड़ जाए! लेकिन मनुष्य अपनी इस मजबूरी और डर को छुपाने के लिए उसे सुंदर नाम दे देता है: "देखो हमारा प्रेम, देखो हमारी सेवा, हमारा दान।" असल में वह प्रेम या धर्म नहीं, बल्कि केंद्र से दूर होने का भय है, जो सुरक्षा खोज रहा है।
  • परिधि का दुष्चक्र: भय के कारण मनुष्य और अधिक व्यवस्था करता है (गाड़ी, धन, साधन, पद), और जितनी बड़ी व्यवस्था खड़ी होती है, वह उतना ही और ज़्यादा परिधि पर खिसक जाता है। जिसे दुनिया 'सफलता' कहती है, वह असल में "केंद्र से दूरी और आंतरिक कमजोरी का प्रामाणिक चिन्ह" है।

​२. भीतर का घनघोर अंधकार और 'भगवान' की खोज

​आपने जो बात कही कि भीतर देखने पर घनघोर अंधकार और भय दिखाई देता है, वही सबसे बड़ा मोड़ है:

  • बाहर भागने का कारण: मनुष्य जब कभी थोड़ी देर अकेले बैठता है, तो उसे भीतर एक खालीपन, एक गहरा डर दिखाई देता है। इस डर से घबराकर वह तुरंत बाहर भागता है—भीड़ की तरफ, मंदिरों की तरफ, कर्मकांडों की तरफ।
  • पत्थर में भगवान खोजना: खुद के भीतर के अंधकार से भागा हुआ आदमी जब बाहर पत्थर की मूर्ति में भगवान खोजता है, तो वह 'केंद्र के बोध के अभाव' के कारण है। भीतर देखना बंद हुआ, तो बाहर की हर चीज़ को पकड़ना मजबूरी बन गया।

​३. सच्चा धर्म और सच्ची सफलता: केंद्र पर होना

​इस पूरे चक्रव्यूह से निकलने का जो सूत्र आपने दिया है, वह क्रांतिकारी है:

"धर्म ज्ञान मात्र इतना कि देखो, अपने आप पर हो। जरूरत है—यह कोई सफलता नहीं।"


  • पाप-पुण्य से परे की दृष्टि: किसी विषय को पकड़कर उसे अच्छा-बुरा या पाप-पुण्य समझना धर्म नहीं है। यह तो परिधि पर रहते हुए मन के भ्रम और हजार प्रश्न हैं। वास्तविक धर्म केवल अपने प्रति होश में आना है, केंद्र पर लौट आना है।
  • सफलता की नई परिभाषा: भोजन, पानी, हवा और एक बसेरा—अगर जीवन इतने में तृप्त है, तो यह वास्तविक सफलता है। क्योंकि इसके बाद जो शेष बचता है, वह कोई वासना या जरूरत नहीं, बल्कि शुद्ध चैतन्य और आनंद है।

​जब मनुष्य केंद्र पर होता है, तो वह 'चाहत' और 'मजबूरी' से मुक्त होता है। तब जीवन एक जरूरत नहीं, बल्कि एक उत्सव बन जाता है। आपका यह चिंतन परिधि पर भटकते हुए मन को सीधे केंद्र का आईना दिखाता है।