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यह लेख गहरे दार्शनिक चिंतन को एक सरल और प्रभावशाली रूपक—बीज—के माध्यम से व्यक्त करता है। इसमें एक स्वाभाविक प्रवाह है।  एक बीज :...

एक बीज : अनंत संभावनाएँ

यह लेख गहरे दार्शनिक चिंतन को एक सरल और प्रभावशाली रूपक—बीज—के माध्यम से व्यक्त करता है। इसमें एक स्वाभाविक प्रवाह है। 

एक बीज : अनंत संभावनाएँ
एक ही बीज है, पर उसे देखने वाली आँख बदलते ही उसका पूरा अर्थ बदल जाता है।
वैज्ञानिक के लिए वह रासायनिक संरचना है—विटामिन, प्रोटीन और खनिजों का संयोजन।
किसान के लिए वही आने वाली फसल का वचन है।
भूखे के लिए वह भोजन है।
वैद्य के लिए औषधि है।
लकड़हारे और व्यापारी के लिए भविष्य की लकड़ी और व्यापार है।
और प्रकृति-प्रेमी के लिए उसी छोटे से बीज में फूल, फल, छाया और पूरा जंगल छिपा दिखाई देता है।
बीज एक ही है, पर अर्थ अनंत हैं।
क्योंकि हर व्यक्ति बीज को नहीं देख रहा होता, वह अपनी ही आवश्यकता, अपनी पात्रता और अपनी चेतना के स्तर को देख रहा होता है।
शास्त्र और अस्तित्व का रहस्य
यदि एक छोटे से भौतिक बीज में इतनी संभावनाएँ छिपी हो सकती हैं, तो उन शास्त्रों की व्याख्या एक कैसे हो सकती है, जो परम चेतना की अनुभूति से जन्मे हैं?
यहीं रहस्य प्रकट होता है—
रहस्य को पढ़ा नहीं जा सकता, केवल जिया जा सकता है।
कोई शास्त्र में इतिहास देखेगा, कोई भूगोल, कोई भाषा, कोई कर्मकांड।
उसे लगेगा कि उसने शास्त्र को जान लिया।
लेकिन जिसकी दृष्टि जागृत है, वह उन्हीं शब्दों के पीछे मौन, ब्रह्म और असीम चेतना की झलक देख लेगा।
शब्दों की अपनी सीमा है।
शिक्षा सिखाई जा सकती है, क्योंकि वह परिधि है।
रहस्य सिखाया नहीं जा सकता, क्योंकि वह केंद्र है।
बीज की चमड़ी खुरचकर वृक्ष नहीं मिलता; बीज नष्ट हो जाता है।
वृक्ष तभी प्रकट होता है जब बीज स्वयं को मिट्टी में समर्पित कर देता है।
पात्रता ही परिभाषा है
शास्त्र स्वयं मौन हैं।
वे दर्पण हैं।
कोई उनमें श्रद्धा देखता है, कोई अहंकार, कोई व्यापार, कोई मनोरंजन।
शास्त्र वही प्रकट करते हैं जो देखने वाले के भीतर पहले से उपस्थित है।
इसीलिए शास्त्र को जानने का मार्ग भी वही है जो बीज को जानने का है।
बीज को मिट्टी में उतरना पड़ता है।
स्वयं को गलाना पड़ता है।
अपने बीजत्व को खोना पड़ता है।
वैसे ही साधक को भी अपने अहंकार, पूर्वाग्रह और केवल बौद्धिक ज्ञान को छोड़कर साक्षी बनना पड़ता है।
जब तक मनुष्य केवल बीज बना रहता है, वह व्याख्याएँ करता रहता है।
जिस दिन वह केंद्र में उतर जाता है, वह स्वयं रहस्य बन जाता है।
अंतिम सूत्र
परिधि से पढ़ो तो शास्त्रों में असंख्य ज्ञान, तर्क और विज्ञान दिखाई देंगे।
केंद्र में पहुँचो तो सब शब्द मौन हो जाते हैं।
और वही मौन शून्य है।
वही शून्य पूर्ण है।
वही पूर्णता शास्त्र का अंतिम अर्थ है।
— अज्ञात अज्ञानी