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  चेतना, आयाम और समग्रता का विवेक मनुष्य की सबसे बड़ी भूल तब होती है जब वह अस्तित्व के किसी एक आयाम को ही अंतिम सत्य घोषित कर देता है। जबकि...

चेतना, आयाम और समग्रता का विवेक

 

चेतना, आयाम और समग्रता का विवेक

मनुष्य की सबसे बड़ी भूल तब होती है जब वह अस्तित्व के किसी एक आयाम को ही अंतिम सत्य घोषित कर देता है। जबकि अस्तित्व किसी एक विचार, व्यक्ति, सिद्धांत या पहचान में सीमित नहीं है। "मैं", "भगवान", "गुरु", "धर्म", "विज्ञान", "राजनीति", "प्रेम", "तर्क"—ये सभी जीवन के आयाम हैं, स्वयं जीवन नहीं।

यदि किसी एक आयाम की अतिशयता हो जाए, तो संतुलन टूट जाता है—

  • "मैं" की अति अहंकार बन जाती है।
  • "भगवान" की अति अंधभक्ति में बदल सकती है।
  • "गुरु" की अति व्यक्ति की स्वतंत्र चेतना को कमजोर कर सकती है।
  • "धर्म" की अति कट्टरता और संप्रदायवाद को जन्म दे सकती है।
  • "विज्ञान" की अति यदि केवल भौतिकवाद तक सीमित रह जाए, तो अनुभव, करुणा और चेतना की उपेक्षा कर सकती है।
  • "राजनीति" की अति वैचारिक दासता का रूप ले सकती है।
  • "धन" की अति जीवन को साधनों तक सीमित कर सकती है।
  • "भावना" की अति विवेक को ढक सकती है, और तर्क की अति संवेदनशीलता को।

विवेक का अर्थ किसी आयाम का विरोध करना नहीं, बल्कि प्रत्येक आयाम को उसके उचित स्थान पर देखना है। समग्र दृष्टि वही है जिसमें न "मैं" का निषेध है, न "भगवान" का आग्रह; न विज्ञान का विरोध है, न अध्यात्म का। सबका स्थान है, पर कोई भी अकेला संपूर्ण नहीं।

सूत्र:

"अस्तित्व एक है, अभिव्यक्तियाँ अनेक हैं। जो किसी एक अभिव्यक्ति को ही संपूर्ण सत्य मान लेता है, वही भ्रम में पड़ जाता है। समग्रता में देखना ही विवेक है।"