जीवन ही अंतिम सत्य
जीवन ही ईश्वर है। जीवन से अलग कोई दूसरा ईश्वर, आत्मा या परमात्मा नहीं। जीवन स्वयं ही दिव्यता की अभिव्यक्ति है। जब जीवन को उसकी संपूर्ण गहराई में जिया जाता है, तब भीतर केवल शुद्ध ऊर्जा, सहज आनंद और मौन शेष रह जाते हैं।
जब दुःख को पूर्णतः स्वीकार कर जिया जाता है, तब वह दुःख नहीं रहता; वह परिवर्तन बन जाता है। जैसे सुख स्थायी नहीं है, वैसे ही दुःख भी स्थायी नहीं है। दोनों जीवन की सतह पर उठने वाली तरंगें हैं। आनंद केवल सुख से उत्पन्न नहीं होता, बल्कि सुख और दुःख—दोनों की समग्र स्वीकृति से प्रकट होता है। यही जीवन का वास्तविक समुद्र-मंथन है, और उसका अंतिम छोर शून्य (०) है—जहाँ सभी अनुभव शांत होकर मौन में विलीन हो जाते हैं।
बचपन सत्य है, युवावस्था सत्य है, वृद्धावस्था भी सत्य है। प्रत्येक आयु का वर्तमान ही सत्य है। अतीत केवल स्मृति है और भविष्य केवल कल्पना। दुःख प्रायः पछतावे का रूप ले लेता है और सुख भविष्य के स्वप्न में बदल जाता है। परंतु जब इन दोनों को केवल देखा जाता है, तब न पछतावा बचता है और न स्वप्न का मोह। दोनों धीरे-धीरे आनंद में रूपांतरित होने लगते हैं।
मन का स्वभाव है—सोचना, स्वप्न देखना, पछताना, चाहना और डरना। इसलिए इनका विरोध करने की आवश्यकता नहीं। समस्या इनका होना नहीं, बल्कि इन्हें बिना देखे जीते रहना है। जिस क्षण देखना प्रारंभ होता है, उसी क्षण दृष्टा का जन्म होता है। तब सुख, दुःख, स्वप्न और पछतावा गौण हो जाते हैं; मूल केवल देखना रह जाता है।
यहीं मेरी असहमति पारंपरिक धर्म से है। धर्म प्रायः मनुष्य से कहता है—काम मत करो, क्रोध मत करो, मोह मत करो। परंतु काम, क्रोध और मोह प्रकृति की घटनाएँ हैं; वे घटती हैं। प्रश्न यह नहीं कि वे क्यों उठीं, बल्कि यह है कि उन्हें देखने वाला कौन है।
धर्म यदि केवल नियम देता है और देखने की कला नहीं सिखाता, तो वह बोध नहीं, केवल विचार देता है। विचार उधार लिए जा सकते हैं, पर बोध नहीं। बोध तभी जन्म लेता है जब मनुष्य स्पष्ट देख लेता है कि सब कुछ घट रहा है और भीतर कोई केवल उसका साक्षी है। उसी क्षण दृष्टा का जन्म होता है।
दृष्टा के जन्म के साथ ही भय, अंधविश्वास और अंधानुकरण की आवश्यकता समाप्त होने लगती है। तब गुरु मार्गदर्शक हो सकता है, पर सत्य का स्वामी नहीं। सत्य किसी व्यक्ति, किसी धर्म या किसी पुस्तक की संपत्ति नहीं है। वह केवल वर्तमान क्षण में जागृत दृष्टा के लिए उपलब्ध है।
जीवन ही सत्य है। जीवन ही ईश्वर है। जो जीवन को बिना भागे, बिना पकड़े, बिना किसी कल्पना के, केवल पूर्ण जागरूकता से जी लेता है, वही आनंद को जानता है।
जीवन सूत्र
वेदांत 2.0 का घोषणापत्र
१. जीवन ही अंतिम सत्य है; जो है, वही जीवन है।
२. जीवन ही ईश्वर है; जीवन से अलग कोई ईश्वर नहीं।
३. आत्मा, परमात्मा और ईश्वर यदि जीवन से अलग कर दिए जाएँ, तो वे केवल विचार रह जाते हैं।
४. जीवन को जानना ही ईश्वर को जानना है।
५. जीवन का केंद्र विचार नहीं, अनुभव है; और अनुभव का केंद्र दृष्टा है।
६. जो घट रहा है, उसे बदलने से पहले देखो; देखना ही बोध का प्रारंभ है।
७. सुख और दुःख शत्रु नहीं, जीवन की दो तरंगें हैं।
८. केवल सुख चाहने वाला अंततः दुःख का दास बन जाता है।
९. जो दुःख को पूर्ण रूप से जी लेता है, उसके लिए दुःख परिवर्तन बन जाता है।
१०. आनंद सुख का परिणाम नहीं, समग्र स्वीकृति का प्रस्फुटन है।
११. अतीत स्मृति है, भविष्य कल्पना है; केवल वर्तमान जीवन है।
१२. पछतावा अतीत में जीना है, स्वप्न भविष्य में जीना है।
१३. वर्तमान में जीना ही आनंद का द्वार है।
१४. मन का स्वभाव सोचना है; दृष्टा का स्वभाव देखना है।
१५. विचार उधार लिए जा सकते हैं, बोध नहीं।
१६. धर्म यदि देखने की कला न सिखाए, तो वह केवल मान्यता बन जाता है।
१७. काम, क्रोध, मोह और भय शत्रु नहीं; उन्हें बिना देखे जीना ही अज्ञान है।
१८. जो स्वयं को देख लेता है, वह अपने सभी बंधनों को देख लेता है।
१९. दृष्टा का जन्म ही वास्तविक आध्यात्मिक जन्म है।
२०. जहाँ दृष्टा जागता है, वहाँ अहंकार ढहने लगता है।
२१. गुरु मार्ग दिखा सकता है; चलना स्वयं को ही पड़ता है।
२२. सत्य किसी धर्म, पुस्तक या व्यक्ति की संपत्ति नहीं है।
२३. भीड़ विश्वास देती है; दृष्टा सत्य देता है।
२४. जागरण अनुयायी नहीं बनाता, स्वतंत्र मनुष्य बनाता है।
२५. जीवन किसी उपलब्धि का नाम नहीं; जीवन स्वयं पूर्णता की सतत प्रक्रिया है।
२६. समुद्र-मंथन बाहर नहीं, भीतर होता है।
२७. जीवन का अंतिम छोर शून्य (०) है, जहाँ सभी अनुभव शांत होकर एक हो जाते हैं।
२८. शून्य अंत नहीं, समस्त संभावनाओं का मौन स्रोत है।
२९. जो जीवन को पूर्ण जागरूकता से जी लेता है, वही ईश्वर को जी लेता है।
३०. अंततः न धर्म बचता है, न अधर्म; न मैं, न मेरा—केवल जीवन, दृष्टा और मौन शेष रह जाते हैं।
॥ वेदान्त २.० महावाक्यम् ॥
जीवनमेव सत्यम्।
जीवनमेव ईश्वरः।
दृष्टैव बोधः।
बोध एव मुक्तिः।
शून्यमेव पूर्णम्।
मौनमेव आनन्दः॥
भावार्थ
जीवन ही सत्य है।
जीवन ही ईश्वर है।
दृष्टा ही बोध है।
बोध ही मुक्ति है।
शून्य ही पूर्णता है।
मौन ही आनंद है।
न जीवनाद् भिन्नं सत्यम्।
न जीवनाद् भिन्नो ईश्वरः।
न दृष्टेर्भिन्नो बोधः।
न बोधाद् भिन्ना मुक्तिः।
न शून्यात् भिन्नं पूर्णम्।
इति वेदान्त २.०॥
भावार्थ
जीवन से अलग कोई सत्य नहीं।
जीवन से अलग कोई ईश्वर नहीं।
दृष्टा से अलग कोई बोध नहीं।
बोध से अलग कोई मुक्ति नहीं।
शून्य से अलग कोई पूर्णता नहीं।
यही वेदान्त २.० है।
बीज-मंत्र
जीवनं ब्रह्म।
दृष्टा धर्मः।
बोधो मुक्तिः।
शून्यं पूर्णम्।
मौनम् आनन्दः॥
समापन महामंत्र
जीवनमेव सत्यम्।
जीवनमेव ईश्वरः।
दृष्टैव बोधः।
बोध एव मुक्तिः।
शून्यमेव पूर्णम्।
मौनमेव आनन्दः॥
शास्त्र कहाँ सहमति में है ?
१. जीवन ही ईश्वर है, अलग नहीं।
उपनिषद इसे ही महावाक्य कहते हैं।
सर्वं खल्विदं ब्रह्म, प्रज्ञानं ब्रह्म, अयम् आत्मा ब्रह्म- यह सब ब्रह्म ही है, यह चेतना ही ब्रह्म है, यह आत्मा ही ब्रह्म है।
छांदोग्य ने कहा - जो है वही ब्रह्म है। आप कह रहे हैं - जो है वही जीवन है। दोनों एक ही बात हैं। जहाँ आप जीवन शब्द रखते हैं, उपनिषद ब्रह्म या प्रज्ञान रखता है। आत्मा, परमात्मा को जीवन से अलग मानना ही द्वैत है। अद्वैत तो कहता ही है - अलग कुछ है ही नहीं।
२. सुख-दुख तरंगें हैं, सत्य नहीं।
गीता का पूरा दूसरा अध्याय यही है।
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः। आगमापायिनोऽनित्याः-
इंद्रियों और विषयों के संयोग से जो सर्दी-गर्मी, सुख-दुख पैदा होते हैं, वे आते हैं, जाते हैं, अनित्य हैं।
आप कहते हैं - दुख को पूरा जी लो तो वह परिवर्तन बन जाता है। कृष्ण कहते हैं - तांस्तितिक्षस्व भारत - उन्हें सहो नहीं, देखो कि वे अनित्य हैं। देखना ही रूपांतरण है। यही आपका समुद्र-मंथन है।
३. देखना ही बोध है, दृष्टा का जन्म ही अध्यात्म है।
यह अष्टावक्र गीता का पहला सूत्र है।
You are the witness - beyond body, mind, and world. You are ever free, untouched by action or inaction.
vedanta 2.0 कहते हैं - काम, क्रोध, मोह को रोको मत, देखो। अष्टावक्र कहते हैं - तुम न कर्ता हो, न भोक्ता, तुम केवल साक्षी हो। क्रिया प्रकृति में होती है, तुम में केवल दर्शन होता है। आपका सूत्र १४, १७, १९ तो अक्षरशः अष्टावक्र है - मन का स्वभाव सोचना है, दृष्टा का स्वभाव देखना है।
४. वर्तमान ही सत्य है।
बुद्ध ने इसे चरथ भिक्खवे कहा, उपनिषद ने इहैव - यहीं, इसी क्षण। अतीत स्मृति है, भविष्य कल्पना - यह तो योगवशिष्ठ भी कहता है। पछतावा और स्वप्न दोनों मन की गति हैं। वर्तमान में ठहरना ही द्वार है। आपका सूत्र ११, १२, १३ शत-प्रतिशत श्रुति-सम्मत है।
५. शून्य (०) अंत नहीं, स्रोत है।
vedanta 2.0 अंतिम सूत्र - जीवन का अंतिम छोर शून्य है - यही ईशावास्य उपनिषद का पूर्णमदः पूर्णमिदम् है। शून्य अभाव नहीं, पूर्णता है जहाँ सब अनुभव शांत होकर एक हो जाते हैं। वेदांत 2.0 का 99+1→0 इसी शून्य की ओर इशारा है