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ॐ सत्यं मे गुरुः। सत्यं मे शरणम्। सत्यं मे जीवनम्। गुरु-पूजा नहीं, सत्य-पूजा Agyat Agyani मेरी दृष्टि में सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि गुर...

ॐ सत्यं मे गुरुः। सत्यं मे शरणम्। सत्यं मे जीवनम्।

ॐ सत्यं मे गुरुः। सत्यं मे शरणम्। सत्यं मे जीवनम्।

गुरु-पूजा नहीं, सत्य-पूजा

Agyat Agyani

मेरी दृष्टि में सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि गुरु कितना महान है, बल्कि यह है कि उसे भीतर स्मरण करने से मैं कैसा बन रहा हूँ।

जिसे हम बार-बार स्मरण करते हैं, उसके गुण धीरे-धीरे हमारे भीतर उतरने लगते हैं। यदि गुरु में क्रोध, अहंकार, लोभ, भय, सत्ता या विभाजन है, तो वही संस्कार शिष्य में भी विकसित हो सकते हैं।

इसीलिए मैं कहता हूँ—गुरु की अंध-पूजा मत करो; सत्य की पूजा करो। गुरु का सम्मान करो, पर उसे अंतिम सत्य मत मानो।

आज संसार में जितने भी धर्म, संप्रदाय और गुरु-परंपराएँ हैं, उनके अनुयायियों के स्वभाव को देखो। शिष्य अक्सर अपने गुरु के स्वभाव का ही प्रतिबिंब बन जाते हैं। यही सबसे बड़ी परीक्षा है।

यदि गुरु का स्मरण तुम्हें अधिक स्वतंत्र, अधिक करुणामय, अधिक सत्यनिष्ठ और अधिक जागरूक बना रहा है, तो वह स्मरण सार्थक है।

यदि वह तुम्हें संकीर्ण, भयभीत, कट्टर या अंधभक्त बना रहा है, तो चाहे गुरु कितना ही प्रसिद्ध क्यों न हो, उस स्मरण पर पुनर्विचार आवश्यक है।

सूत्र:

न गुरोर्विरोधो मे, विरोधोऽसत्यपाखण्डयोः।
सत्ये तिष्ठतु यो नित्यं, स एव गुरुरुच्यते॥

"जिसका स्मरण करते हो, उसी का स्वभाव धीरे-धीरे तुम्हारा स्वभाव बन जाता है। इसलिए व्यक्ति नहीं, सत्य को अपने भीतर स्थापित करो।"

श्लोक १

न गुरुः पूजनीयः स्यात्, पूजनीयं तु सत्यमेव।
गुरुः मार्गप्रदर्शकः स्यात्, सत्यं तु परमं पदम्॥

अर्थ: गुरु नहीं, सत्य पूजनीय है। गुरु मार्ग दिखाता है, पर परम लक्ष्य सत्य है।


श्लोक २

यद् स्मरति मनुष्यस्तु, तद्भावं स प्रपद्यते।
तस्मात् सत्यं स्मरेन्नित्यं, न व्यक्तिं सीमितां बुधः॥

अर्थ: मनुष्य जिसका स्मरण करता है, वैसा ही बनता है। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति सीमित व्यक्ति का नहीं, सत्य का स्मरण करे।


श्लोक ३

व्यक्तिर्माध्यममात्रं स्यात्, सत्यं नित्यं निरञ्जनम्।
व्यक्तौ बद्धो भवेज्जीवः, सत्ये मुक्तिर्न संशयः॥

अर्थ: व्यक्ति केवल माध्यम है; सत्य शाश्वत और निर्मल है। व्यक्ति में बंधन है, सत्य में मुक्ति।


मंत्र (संक्षिप्त)

ॐ सत्यं मे गुरुः।
सत्यं मे शरणम्।
सत्यं मे जीवनम्।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

 

शास्त्र क्या कहता है?


1. सत्य ही ब्रह्म है, व्यक्ति नहीं।


तैत्तिरीय उपनिषद में ब्रह्म की परिभाषा ही सत्य से शुरू होती है - सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म अर्थात ब्रह्म सत्य है, ज्ञान है, अनंत है। 

मुण्डक उपनिषद कहता है - सत्यमेव जयते नानृतम् - अंत में जीतता केवल सत्य है, असत्य नहीं। इसलिए पूजा सत्य की होगी, व्यक्ति की नहीं। 

2. गुरु का स्थान मार्गदर्शक का है, लक्ष्य का नहीं।
गीता में कृष्ण कहते हैं - तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया - गुरु के पास जाओ, प्रश्न करो, सेवा करो। पर किसलिए? ज्ञान के लिए। गुरु ज्ञान दे, खुद को लक्ष्य न बनाये।

कुलार्णव तंत्र तक कहता है, गुरु की परीक्षा लो। एक वर्ष तक परखो। शास्त्र ने कभी अंध-भक्ति नहीं सिखाई।

आपका सूत्र - न गुरोर्विरोधो मे, विरोधोऽसत्यपाखण्डयोः - इसी वैदिक विवेक को फिर से स्थापित करता है। विरोध व्यक्ति से नहीं, असत्य और पाखंड से है।

आपने जो मनोवैज्ञानिक नियम पकड़ा है, वही सबसे बड़ी कसौटी है

जिसका स्मरण करते हो, उसी का स्वभाव धीरे-धीरे तुम्हारा स्वभाव बन जाता है।

योगवशिष्ठ में इसे भावना-योग कहा है। यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी। शास्त्र ने इसीलिए कहा - रूप का ध्यान मत करो, तत्व का ध्यान करो।

व्यक्ति माध्यम है। माध्यम में यदि क्रोध, लोभ, सत्ता-भूख है तो वही शिष्य में उतरेगा। इसीलिए आप ठीक कहते हैं - देखो अनुयायियों को। शिष्य ही गुरु की असली परीक्षा है।

Independent Researcher & Philosopher
Vedanta 2.0 ©
(इंटरनेशनल रजि. – विज्ञान और वेदांत का संश्लेषण) प्राचीन प्रज्ञा को आधुनिक वैज्ञानिक और अस्तित्ववादी (Existential) परिप्रेक्ष्य में दर्ज करने की दिशा में एक उत्कृष्ट और सुदृढ़ प्रयास



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