कलेक्टर, राजनेता, शादी में भी आरक्षण

 

सत्य, न्याय और मानवता : जन्म नहीं, कर्म ही मनुष्य का वास्तविक परिचय


1. जाति से नहीं, शिक्षा, संस्कार और कर्म से बनता है मनुष्य

  • जीवनसाथी का चयन केवल जन्म से नहीं, बल्कि शिक्षा, योग्यता, संस्कार और सामाजिक समझ से होता है।
  • मनुष्य का मूल्य उसके चरित्र और कर्म से आँका जाना चाहिए।

और यह भी बताइए, क्या आपके ज़िले का कलेक्टर किसी अशिक्षित, गरीब एससी या एसटी व्यक्ति से विवाह करना पसंद करेगा? सामान्यतः लोग अपने समान शिक्षा, योग्यता, सामाजिक स्तर और जीवन-दृष्टि वाले साथी का चुनाव करते हैं। मंत्री, अधिकारी और उच्च पदों पर बैठे लोग भी प्रायः इन्हीं बातों को प्राथमिकता देते हैं। इसलिए केवल जाति की बात करना वास्तविकता का पूरा चित्र नहीं है; शिक्षा, योग्यता, संस्कार, आर्थिक स्थिति और सामाजिक स्तर भी जीवन के निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


इसलिए पहले अपने भीतर के उस पशुवत् दृष्टिकोण को त्यागिए जो केवल जन्म के आधार पर मनुष्य का मूल्य तय करता है। यदि आपका तर्क यही है कि मनुष्य केवल जन्म से पहचाना जाता है, तो वही तर्क अंततः मनुष्य को उसकी चेतना नहीं, बल्कि केवल उसके जैविक जन्म तक सीमित कर देता है।


महान व्यक्तित्व समाज के सहयोग से बनते हैं
  • किसी भी महान व्यक्ति की सफलता अनेक लोगों के सहयोग, शिक्षा और अवसरों का परिणाम होती है।
  • कृतज्ञता और मानवता ही सच्चे धर्म का आधार हैं।
दूसरी बात, बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के व्यक्तित्व के निर्माण में केवल एक समुदाय का योगदान नहीं था। उनकी शिक्षा, परवरिश, भोजन, छात्रवृत्तियाँ और विदेश में अध्ययन के अवसर अनेक व्यक्तियों और संस्थाओं के सनातन सहयोग से संभव हुए। विभिन्न पृष्ठभूमियों के लोगों ने उनकी प्रतिभा को पहचाना, उन्हें अवसर दिए और आगे बढ़ने में सहायता की। नहीं किसी आरक्षित ने या सरकार ने या मुगलो या अग्रेजो या sc वर्ग ने योगद्दान दिया। किसी भी महान व्यक्ति का निर्माण केवल जन्म से नहीं, बल्कि समाज के अनेक लोगों के सहयोग, शिक्षा और मार्गदर्शन से होता है।

वास्तविक पिता केवल जन्म देने वाले नहीं होते; जो आपका पालन-पोषण करें, शिक्षा दें, सम्मान दें, अवसर दें और कठिन समय में साथ खड़े रहें, वे भी जीवन-निर्माता होते हैं। ऐसे लोगों के प्रति कृतज्ञ होना ही सच्चा धर्म है। सभी के साथ समान व्यवहार कीजिए, अपना कर्तव्य निभाइए और मानवता को सर्वोपरि रखिए—तब जाति का अहंकार स्वयं कम होने लगता है।

भीड़ सत्य का प्रमाण नहीं होती

  • लोकप्रियता, संख्या और शक्ति न्याय की गारंटी नहीं हैं।
  • इतिहास अंततः सत्य, धर्म और विवेक का सम्मान करता है, केवल समर्थकों की संख्या का नहीं।
कुछ लोगों की भीड़, अनुयायियों की संख्या या लोकप्रियता सत्य का प्रमाण नहीं होती। इतिहास में रावण भी अत्यंत शक्तिशाली था, उसके पास विशाल साम्राज्य, विद्वत्ता और समर्थकों की कमी नहीं थी; फिर भी आज स्मरण भगवान राम का होता है, क्योंकि अंततः सम्मान शक्ति का नहीं, धर्म और सत्य का होता है। आज भी अनेक प्रकार के 'रावण' हो सकते हैं। केवल भीड़ का साथ होना न्याय या सत्य की गारंटी नहीं है।


अस्तित्व का नियम यही है कि विष और अमृत, दोनों की संभावना संसार में बनी रहती है। किसी एक को हमेशा के लिए समाप्त कर देना संभव नहीं। इसलिए मनुष्य का वास्तविक मूल्य उसकी शिक्षा, धन, प्रसिद्धि या अनुयायियों से नहीं, बल्कि उसकी सत्यनिष्ठा, ईमानदारी, न्यायप्रियता और विवेक से आँका जाना चाहिए।

महाभारत का संदेश भी यही है कि जब अधर्म और अन्याय बढ़ जाते हैं, तब संतुलन की आवश्यकता होती है। शक्ति, पद, प्रतिष्ठा या समर्थकों की संख्या किसी को स्वतः धर्मात्मा नहीं बना देती। यदि कोई अस्तित्व के नियम, न्याय और सत्य का उल्लंघन करता है, तो वही रावणत्व है। समर्थन और भीड़ मिल जाना पर्याप्त नहीं; इतिहास अंततः उसी का सम्मान करता है जिसके पास विवेक, सत्य, न्याय और धर्म का आचरण होता है। ऐसे ही व्यक्तित्व प्रेरणा बनते हैं, उनके आदर्शों का स्मरण किया जाता है, और यही धर्म का वास्तविक अर्थ है।

4. अभिमन्यु से महाभारत तक : सत्य की अंतिम विजय

  • एक अकेले अभिमन्यु का बलिदान अधर्म के पतन का कारण बना।
  • अस्तित्व का नियम संख्या नहीं, सत्य और न्याय से संचालित होता है।
महाभारत में एक ओर विशाल कौरव सेना थी, जिसमें अनेक महारथी थे। दूसरी ओर एक युवा योद्धा अभिमन्यु था। उसने अकेले चक्रव्यूह को भेदकर उन सभी महारथियों को चुनौती दी। जब वे उसे युद्ध के नियमों के अनुसार पराजित नहीं कर सके, तब अनेक योद्धाओं ने मिलकर युद्ध की मर्यादा का उल्लंघन किया और एक अकेले युवक का वध किया।
किन्तु इतिहास ने सिद्ध किया कि अभिमन्यु का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उसी अन्याय ने अंततः कौरवों के विनाश का मार्ग प्रशस्त किया। एक युवक का बलिदान पूरी आसुरी प्रवृत्ति वाली सेना के पतन का कारण बना। इससे स्पष्ट होता है कि केवल संख्या, भीड़, शक्ति या सामर्थ्य ही विजय का प्रमाण नहीं होती।

अस्तित्व का नियम : सत्य अंततः स्वयं प्रमाण बन जाता है

  • सत्य को भीड़ या सत्ता की आवश्यकता नहीं होती।
  • न्याय, ईमानदारी और विवेक ही स्थायी विजय के आधार हैं।
जो लोग केवल भीड़ की शक्ति देखकर सत्य का निर्णय करते हैं, वे भ्रम में पड़ जाते हैं। अस्तित्व का नियम संख्या से नहीं, सत्य और धर्म से संचालित होता है। उस नियम को समझकर उसके साथ खड़ा रहना ही विवेक है, चाहे उस समय उसकी गणित हमारी बुद्धि को समझ में आए या न आए।

सत्य का स्वभाव यही है कि वह अंततः स्वयं प्रमाण बन जाता है। वह शून्य से सृष्टि की रचना करने की क्षमता भी रखता है और आवश्यकता पड़ने पर असत्य एवं अधर्म के विशाल ढाँचों को भी ध्वस्त कर सकता है। इसलिए मनुष्य का विश्वास भीड़ पर नहीं, सत्य, न्याय और अस्तित्व के नियम पर होना चाहिए।
जाति, मानवता, धर्म और अस्तित्व के नियम की एक वैज्ञानिक एवं दार्शनिक दृष्टि





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