प्रकृति, स्त्री और ईश्वर का प्रश्न
मनुष्य ने अपने ही मन की कल्पनाओं से देवता, भगवान, गुरु और अनेक धार्मिक प्रतीक बना लिए। वह मंदिरों, मूर्तियों और कर्मकांडों में ईश्वर को खोजता रहा, जबकि जीवन की सबसे निकट, प्रत्यक्ष और जीवित वास्तविकता को देखने से बचता रहा।
यदि मनुष्य यह समझ ले कि प्रकृति ही उसके अस्तित्व का आधार है, और स्त्री उसी सृजन-शक्ति की जीवित अभिव्यक्ति है, तो ईश्वर की खोज किसी दूर के स्वर्ग में नहीं रह जाती। तब ईश्वर जीवन के भीतर, संबंधों में और सृष्टि की निरंतर रचनात्मक प्रक्रिया में दिखाई देने लगता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि स्त्री ही भगवान है या पुरुष उससे छोटा है। इसका अर्थ केवल इतना है कि स्त्री और पुरुष दोनों उसी एक मूल सत्ता की अभिव्यक्तियाँ हैं। सृजन दोनों के सहयोग से पूर्ण होता है। इसलिए किसी एक को श्रेष्ठ या हीन मानना अज्ञान है।
भारतीय परंपरा में शक्ति, आदिशक्ति, जगत-जननी और प्रकृति जैसे प्रतीक इसी सृजन-तत्त्व की ओर संकेत करते हैं। यह जैविक स्त्री की पूजा का आग्रह नहीं, बल्कि उस मूल रचनात्मक ऊर्जा का सम्मान है जिससे समस्त जीवन प्रकट होता है।
विडंबना यह है कि समाज ने एक ओर देवी की पूजा की, लेकिन दूसरी ओर वास्तविक स्त्री को भय, नियंत्रण और हीनता की दृष्टि से देखा। यह विरोधाभास आज भी अनेक रूपों में मौजूद है।
जब मनुष्य स्त्री और पुरुष को विरोधी नहीं, बल्कि एक ही अस्तित्व के परस्पर पूरक आयामों के रूप में देखेगा, तब काल्पनिक श्रेष्ठताओं का आकर्षण कम होने लगेगा। तब धर्म बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि जीवन, प्रकृति और चेतना के प्रति गहरी समझ बन जाएगा।
" मैं किसी परंपरा से डरकर नहीं लिखता। मैं जो देखता हूँ, वही लिखता हूँ। "
संभव है कि पश्चिमी दृष्टि इस विचार को तुरंत न समझ पाए, क्योंकि वहाँ स्त्री और पुरुष का विमर्श प्रायः सामाजिक, राजनीतिक और लैंगिक समानता के संदर्भ में होता है। मेरा संकेत उससे आगे, अस्तित्व और सृजन के स्तर पर है।
संभव है कि पूर्व भी इसे तुरंत स्वीकार न करे, क्योंकि उसने भी समय के साथ प्रतीकों को वास्तविकता से अधिक महत्व दे दिया है। देवी की पूजा करना सरल है, लेकिन जीवित प्रकृति और जीवित स्त्री में उसी सृजन-तत्त्व का सम्मान करना कठिन।
मेरा कथन किसी स्त्री-पूजा का नहीं है, न किसी पुरुष-विरोध का। मेरा कथन केवल इतना है कि जिस सृजन-शक्ति से समस्त जीवन प्रकट होता है, उसे छोड़कर मनुष्य ने असंख्य काल्पनिक प्रतीकों में सत्य खोजा है।
जब तक मनुष्य अपने सबसे निकट के जीवन, प्रकृति और सृजन को नहीं पहचानता, तब तक उसकी ईश्वर-खोज अधूरी रहेगी।
मेरा उद्देश्य किसी धर्म का विरोध करना नहीं, बल्कि उस मूल सत्य की ओर संकेत करना है जो हर जन्म, हर जीवन और हर अस्तित्व में प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित है।
(स्त्री श्री मां शक्ति ऊर्जा)
Independent Researcher & Philosopher
Vedanta 2.0 © Internal Science
ORCID: https://orcid.org/0009-0000-8083-0685
(इंटरनेशनल रजि).
वेदांत 2.0 “न मार्ग, न साधना, न नियम –
केवल समझ।
जो देख लिया, वही मोक्ष;
जो समझ गया, वही साधना, तो अभी जी लिया वही ईश्वर जीवन ही ईश्वर है।"