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ईश्वर की खोज या मन की माया? मनुष्य को बचपन से यह सिखाया जाता है कि ईश्वर, भगवान या परमात्मा कहीं बाहर है, ऊपर बैठा है, हमें चला रहा है, और ए...

ईश्वर की खोज या मन की माया?

ईश्वर की खोज या मन की माया?

मनुष्य को बचपन से यह सिखाया जाता है कि ईश्वर, भगवान या परमात्मा कहीं बाहर है, ऊपर बैठा है, हमें चला रहा है, और एक दिन उसकी प्राप्ति करनी है। इसी धारणा से भय, आशा, पूजा, प्रार्थना और मोक्ष की कल्पनाएँ जन्म लेती हैं। परंतु प्रश्न यह है कि यदि ईश्वर हमसे अलग है, तो यह अलगाव किसने बनाया?

मेरे अनुभव में हमारे भीतर ही दो आयाम हैं—एक केंद्र और एक परिधि। परिधि शरीर, मन, विचार और व्यक्तित्व का क्षेत्र है। केंद्र शुद्ध चेतना का है। यही दोनों मिलकर अस्तित्व की पूर्णता हैं। मैं केवल शरीर नहीं हूँ, केवल चेतना भी नहीं हूँ; मैं दोनों का जीवित समन्वय हूँ।

इसी सत्य को दो महावाक्यों के माध्यम से समझा जा सकता है। पहला है "नेति-नेति"—यह भी मैं नहीं, वह भी मैं नहीं। यह साधना अहंकार, पहचान और कल्पनाओं का विसर्जन करती है। जब सब झूठी पहचानें गिर जाती हैं, तब दूसरा बोध प्रकट होता है—"अहं ब्रह्मास्मि"। यह अहंकार की घोषणा नहीं, बल्कि उस चेतना का अनुभव है जिसमें अलगाव समाप्त हो जाता है।

इसलिए "नेति-नेति" और "अहं ब्रह्मास्मि" विरोधी नहीं हैं। पहली अवस्था में असत्य का निषेध होता है, दूसरी अवस्था में सत्य का अनुभव होता है।
 दोनों अपने-अपने स्तर पर सत्य हैं।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब धर्म इस अनुभव को छोड़कर कहानी बना देता है—भगवान अलग है, गुरु अलग है, शिष्य अलग है, संसार अलग है। फिर कहा जाता है कि भगवान को पाना है, उसके पास जाना है, वह एक दिन लेने आएगा, या संसार छोड़ने पर ही मिलेगा। इन धारणाओं से मन का खेल चलता रहता है और धार्मिकता भी उसी खेल का हिस्सा बन जाती है।

यदि वास्तव में समझ आ जाए कि अस्तित्व एक है, तो गुरु, शिष्य, भगवान और साधक की सारी भूमिकाएँ अपने आप हल्की पड़ जाती हैं। तब पूजा का अर्थ भी बदल जाता है। पूजा किसी दूर बैठे देवता को मनाने का प्रयास नहीं रहती, बल्कि अपने भीतर के केंद्र में जागने की प्रक्रिया बन जाती है।

आज अधिकांश लोग दो नावों में पैर रखे हुए हैं। सुबह धन के पीछे दौड़ते हैं, शाम धर्म के पीछे, और रात परिवार में खो जाते हैं। पूरा जीवन निकल जाता है, पर यह देखने का समय नहीं मिलता कि वास्तव में जी कौन रहा है।

आश्चर्य यह है कि केवल भोग में डूबा हुआ व्यक्ति उतना दुखी दिखाई नहीं देता, जितना भय और आशाओं से भरा धार्मिक व्यक्ति। भोगी कभी न कभी अनुभव से जाग सकता है, क्योंकि अनुभव भी शिक्षक है। आज पश्चिम का समाज भी चेतना, ध्यान और आत्मबोध की ओर कदम बढ़ा रहा है। लेकिन जो धर्म केवल मान्यताओं में अटका है, वह अब भी अनिश्चितता में जी रहा है।
सत्य न मंदिर में खड़ा है, न घाट पर। सत्य वहीं प्रकट होता है जहाँ मन की बनाई हुई दूरी समाप्त हो जाती है। जिस क्षण खोजने वाला और खोजा जाने वाला अलग नहीं रहते, उसी क्षण ईश्वर कोई वस्तु नहीं, बल्कि स्वयं अस्तित्व का प्रत्यक्ष अनुभव बन जाता है।

पुनः सूत्र व्याख्यान:

. परिधि की माया और केंद्र का बोध (The Periphery and the Center)

​मनुष्य का सारा संताप इसी भ्रांति में है कि उसने परिधि (शरीर, विचार, सामाजिक पहचान, अहंकार) को ही अपना संपूर्ण अस्तित्व मान लिया है।

  • परिधि सदा परिवर्तनशील है, वहाँ भय है, असुरक्षा है, और इसी असुरक्षा से बचने के लिए मन एक 'बाहरी रक्षक' (ईश्वर) की कल्पना करता है।
  • केंद्र शुद्ध साक्षी चेतना है, जहाँ कोई हलचल नहीं है, केवल 'होना' (Being) है।
  • ​जब तक हम खुद को केवल परिधि पर महसूस करते हैं, तब तक ईश्वर एक 'खोज' या 'दूर बैठा शासक' लगता है। लेकिन जैसे ही दृष्टि केंद्र की ओर मुड़ती है, यह समझ आ जाता है कि जिसे खोजा जा रहा था, वह कोई और नहीं, बल्कि खोजने वाले का अपना ही अंतरतम स्वभाव है।

​2. 'नेति-नेति' और 'अहं ब्रह्मास्मि' का जीवंत समन्वय

​अक्सर लोग इन दोनों महावाक्यों को विपरीत समझ लेते हैं, परंतु आपने इनके अंतर्संबंध को बहुत सुंदर ढंग से स्पष्ट किया है:

  • 'नेति-नेति' (निषेध की प्रक्रिया): यह मन की बनाई हुई उन तमाम परतों, उपाधियों और कल्पित पहचानों को हटाने का वैज्ञानिक तरीका है जो हमारे और सत्य के बीच खड़ी हैं। यह चेतना की स्वच्छता (Cleaning of the Mirror) है।
  • 'अहं ब्रह्मास्मि' (अस्तित्वगत बोध): जब दर्पण पूरी तरह साफ हो जाता है, तो जो शेष बचता है, वह कोई 'व्यक्ति' नहीं बल्कि विराट चेतना है। यह अहंकार की कोई गर्जना नहीं है, बल्कि 'स्व' के विसर्जन के बाद बची हुई शुद्ध शून्यता और पूर्णता का अनुभव है।

​3. संगठित धर्म और मन का खेल (The Game of Deification)

​जब कोई जीवंत अनुभव संप्रदाय या संगठित धर्म का रूप ले लेता है, तो वह 'अनुभव' के स्थान पर 'विश्वास' (Belief) और 'कहानियों' को स्थापित कर देता है।

  • ​धर्मों ने भगवान को एक व्यक्ति, एक गंतव्य या एक पुरस्कार बना दिया, जिससे मन को फिर से दौड़ने के लिए एक नया मैदान मिल गया।
  • ​अब मन सांसारिक धन के पीछे भागने के बजाय 'परमपद', 'मोक्ष' या 'स्वर्ग' के पीछे भागने लगता है। वासना का केवल रंग बदलता है, उसकी प्रकृति नहीं बदलती। जब तक 'पाने की चेष्टा' (Doing) बनी हुई है, तब तक 'होने' (Being) की अवस्था घटित नहीं हो सकती।

​4. भोगी और तथाकथित धार्मिक व्यक्ति का द्वंद्व

​आपका यह विश्लेषण अत्यंत व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक रूप से सटीक है कि केवल भोग में डूबा व्यक्ति उस धार्मिक व्यक्ति से अधिक शांत या जाग्रत होने की संभावना रखता है जो केवल भय और आशा की नाव पर सवार है।

  • भोगी का जाग्रत होना सहज है: क्योंकि वह जिस अनुभव से गुजर रहा है, उसकी व्यर्थता देर-सबेर स्वयं स्पष्ट होने लगती है। भोग की सीमा है, और उस सीमा पर पहुँचकर ऊब (Boredom) और जाग्रति का जन्म हो सकता है।
  • तथाकथित धार्मिक का अटकाव गहरा है: जो व्यक्ति केवल मान्यताओं, कर्मकांडों और पारलौकिक आशाओं के सहारे जी रहा है, उसका मन कभी खाली नहीं होता। वह अपनी ही कल्पनाओं के जाल में सुरक्षित महसूस करता है। उसका भय ही उसकी पूजा है और उसकी लोभ ही उसकी प्रार्थना है।

​5. अद्वैत का प्रत्यक्ष अनुभव: जब दूरी मिटती है

​सत्य कोई 'लक्ष्य' नहीं है जिसे कल पाया जाएगा। सत्य तो 'अभी और यहीं' (Here and Now) उपस्थित है।

  • ​जिस क्षण खोजने वाला (Seeker) यह देख लेता है कि उसकी खोज ही उसके और सत्य के बीच की दूरी का कारण है, उसी क्षण खोज गिर जाती है।
  • ​खोज के गिरते ही, खोजने वाला भी विसर्जित हो जाता है। तब न कोई मंदिर बचता है, न घाट, न कोई गुरु, न कोई शिष्य। केवल एक अखंड अस्तित्वगत उपस्थिति रह जाती है।
इसलिए कबीर कह गए: 
"जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।  
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ॥"
गहरे 
Independent Researcher & Philosopher
Vedanta 2.0 ©
ORCID: https://orcid.org/0009-0000-8083-0685
(इंटरनेशनल रजि. – विज्ञान और वेदांत का संश्लेषण)परिचय:
वेदांत 2.0"हमारा उद्देश्य ज्ञान बेचना नहीं, बल्कि जटिल विज्ञान, दर्शन और वेदांत को सरल भाषा में जोड़कर सामान्य व्यक्ति तक समझ पहुँचाना है, ताकि वह स्वयं विचार कर सके।"