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"जो जैसा है, उसका वैसी ही पूर्ण स्वीकृति के साथ होना।" अस्तित्व की विविधता और प्रामाणिकता (Authenticity of Being) ​अस्तित्व (Exist...

धार्मिक कि परिभाषा

"जो जैसा है, उसका वैसी ही पूर्ण स्वीकृति के साथ होना।"

अस्तित्व की विविधता और प्रामाणिकता (Authenticity of Being)

​अस्तित्व (Existence) किसी कारखाने की तरह नहीं है जहाँ एक ही सांचे में सब कुछ ढाला जाए। यहाँ गुलाब गुलाब है, काँटा काँटा है।
​वेश्या और चोर की प्रामाणिकता: 

एक वेश्या यदि केवल वेश्या है, तो वह अपनी भूमिका में प्रामाणिक है। वह कोई ढोंग नहीं कर रही। वह समाज को यह धोखा नहीं दे रही कि वह कोई 'आध्यात्मिक मॉडल' या संत है। एक चोर यदि चोर है, तो समाज उससे सावधान रह सकता है। उनकी इस स्पष्टता में एक प्रकार की ईमानदारी है।
​इसीलिए इतिहास गवाह है कि एक वेश्या (जैसे आम्रपाली) के लिए बुद्ध के मार्ग पर जाना संभव हो गया, और एक डाकू (वाल्मीकि) के लिए ऋषि बनना संभव हो गया। क्यों? क्योंकि वे जो थे, अपनी पूरी नग्नता और प्रामाणिकता में थे। छिपाने के लिए कोई मुखौटा नहीं था।

​2. तथाकथित 'धार्मिक' का सबसे बड़ा झूठ
​सबसे बड़ा संकट और पाखंड तब शुरू होता है जब कोई व्यक्ति अपनी भूमिका को छिपाकर "मैं सत्य हूँ" या "मैं भगवान हूँ"भक्त धार्मिक ज्ञानी हूं,हूं का दावा करने लगता है।

​पुजारी, पंडित, कथा-वाचक या गुरु जब अपनी सीमा को भूलकर 'कृपा और सफलता ,आशीर्वाद का बाज़ार' लगाने लगते हैं, तो वे अस्तित्व की व्यवस्था के साथ धोखाधड़ी कर रहे होते हैं।
​वे स्वयं को वैसा प्रस्तुत करते हैं जैसे वे हैं नहीं। यह "अप्रामाणिकता" (Inauthenticity) ही चेतना के स्तर पर सबसे बड़ा पाप है। जो पाखंडी है, वह यदि खुलकर स्वीकार कर ले कि "हाँ, मैं पाखंडी हूँ," तो उसका वह स्वीकार ही उसे पाखंड से मुक्त करने की शुरुआत बन सकता है।

 लेकिन संकट तब है जब पाखंड को 'परम सत्य' और 'कृपा' का अमूर्त चोगा पहना परम गुरु सदगुरु ब्रह्मा विष्णु महेश बना दिया जाता है।

​3. पूर्ण स्वीकृति ही एकमात्र धर्म है (Total Acceptance)

​वेदांत के गहरे दृष्टिकोण से देखें, तो धर्म कोई नैतिक आचरण (Moral Code) नहीं है कि आप कुछ खास नियमों को मानेंगे तभी धार्मिक कहलाएंगे।

​धर्म का अर्थ है—जो है, उसकी वैसी ही पूर्ण स्वीकृति (Total Acceptance of What Is)।
​यदि समाज में कोई लंगर चला रहा है, कोई दवा बांट रहा है, कोई कहानी सुना रहा है—तो वह केवल वही कर्म कर रहा है। वह उसका स्वभाव और भूमिका है। उसे वहीं तक सीमित रहना चाहिए। 
उसे 'अंतिम प्राधिकारी' या 'मोक्ष का ठेकेदार' धर्म रक्षक, सनातन गुरु बनने की कोई आवश्यकता नहीं है।

​4. भ्रम से मुक्ति का मार्ग:
 "सावधान रहना"
​जब भूमिकाएँ स्पष्ट होती हैं, तो जीवन में कोई उलझन नहीं होती। यदि कोई वेश्या है, तो समाज जानता है; यदि कोई चोर है, तो समाज सावधान रहता है। समस्या तब पैदा होती है जब चोर साधु के वेश में आ जाता है औररावण साधु बन कर खड़ा होता है,अज्ञानी गुरु के आसन पर बैठ जाता है।
 तब लोग 'सावधान' नहीं रह पाते और गहरे मानसिक व आध्यात्मिक शोषण का शिकार होते हैं।

​अस्तित्व की इस प्रयोगशाला में हर तत्व की अपनी एक ज्यामिति (Geometry) है।

 जो अपने केंद्र पर जैसा है, वैसा ही रहने में उसकी पूर्णता है।
 अपनी भूमिका को छोड़कर 'सर्वशक्तिमान' या 'भगवान' गुरु बनने का ढोंग रचना ही इस धरती पर चेतना का सबसे बड़ा प्रदूषण है।
​अन्वेषण की इस यात्रा में, 'जो है' उसे बिना किसी रंगीन चश्मे के, उसकी पूरी नग्न सच्चाई के साथ देखना ही एकमात्र 'साधना' है।

—"धर्म का आरंभ भगवान बनने से नहीं, स्वयं होने से होता है।"

अज्ञात अज्ञानी
स्वतंत्र चिंतक | VEDANTA 2.0 LIFE के लेखक
मैं न गुरु हूँ, न उपदेशक, न किसी धर्म, संप्रदाय या संस्था का प्रतिनिधि। मेरा प्रयास केवल इतना है कि जीवन को उसी रूप में देखा जाए, जैसा वह है।