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शरीर के भीतर भी एक सूक्ष्म बिंदु है। उसी बिंदु में प्रवेश करना ही ईश्वर का बोध है। इस प्रवेश की कोई सीधी विधि नहीं है। यह केवल तब घटता है जब जीवन गहरी सजगता और परिपक्वता से जिया जाए।
श्रद्धा, विश्वास, संकल्प, मोह — ये सब मन के खेल हैं। इन्हीं खेलों से बाहर ही संसार की माया खड़ी होती है। भीतर के उस केंद्र में जीना ही ईश्वर में प्रवेश है, अति में प्रवेश है। जीवन को भीतर से बोध, होश, आनंद और प्रेम के साथ जीना ही मार्ग है। साधना, धर्म, विधि–विधान — ये सब बाहरी खेल हैं। जीवित अनुभव ही सच्चा विज्ञान है।
जो जीवन को बाहर खोजता है, वह केवल दुख और बोझ जोड़ता है। ज़रूरत से अधिक सब बोझ है। और बोझ लेकर जीवन जीना असंभव है। जो जी रहे हैं, वे अक्सर केवल बाहरी दिखावा कर रहे हैं — प्रायोजित जीवन, जीने का भ्रम।
कुछ लोग जब यह समझते हैं, तो भोग, साधन और संसार को त्याग कर उसके बोध की आशा करते हैं। वे संसार, साधन, धन और नाते–रिश्ते छोड़ देते हैं। लेकिन त्याग और भोग — दोनों ही माया हैं। भोगी संसारी और त्यागी संन्यासी — दोनों एक ही सिक्के के पहलू हैं। क्योंकि त्यागी जीवन जीना ही छोड़ देता है। वह साधना के नाम पर केवल दुःख पकड़ लेता है। दुःख तो सहज जीवन में भी मिलता है, पर संसार को दुख मानकर त्यागी बने और नया दुःख चुन लिया — यह कैसी मूर्खता है? वहाँ भी नियम हैं, गंभीरता है, लेकिन बोध कहाँ है? जिस ज़रूरत से बोध सम्भव था, वही ज़रूरत छोड़ दी। इसलिए भोगी और त्यागी — दोनों में कोई खास अंतर नहीं है। दोनों एक ही सिक्के के दो रूप हैं। सत्य दोनों के आगे है।
ईश्वर का अनुभव केवल जीने में ही है। जीवन के हर तत्व का गहन बोध ही ईश्वर तक ले जाता है। इसके लिए न धर्म की ज़रूरत है, न शास्त्रों की, न गुरु की, न किसी साधना की। न कोई भविष्य का स्वप्न, न कोई नियम, न कोई बंधन।
और सवाल यही है: यदि पदार्थ और भोग का भी बोध नहीं हो पा रहा, तो जो सूक्ष्म है — उसका बोध कैसे सम्भव होगा?
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