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26_02_09

मन और बुद्धि केवल यंत्र हैं।

 मन और बुद्धि केवल यंत्र हैं।

मनुष्य अक्सर मन को ही “मैं” समझ लेता है और उसी से ज्ञानी बनने का भ्रम पैदा हो जाता है।
लोग तुम्हे पसंद करते हैं, धन्यवाद देते हैं — लेकिन यह भी मन का खेल है, आत्मा का नहीं।
आत्मा चुप रहती है।
वह हमेशा बोलती नहीं; केवल आवश्यकता होने पर प्रकट होती है।
मन को “मैं” समझ लेना ही सबसे बड़ी भूल है।
जब लोग साथ आते हैं, समर्थन करते हैं एक भीड़ एक हा कहती है सही प्रसन्न होती,
तब मन कहता है, गुरु कहता है, धार्मिक कहता— “मैं सही हूँ।”
और यही मन की गलती है।
ओशो ने ज्ञान गीता, उपनिषद या वेद से हासिल नहीं किया।
पहले भीतर अनुभव हुआ — बुद्धत्व, बोध।
फिर उस अनुभव की तुलना शास्त्रों से की कि जो भीतर खिला है, क्या वही सत्य शास्त्रों में भी है।
शास्त्रों ने अनुभव पैदा नहीं किया; उन्होंने केवल पुष्टि (प्रमाण) दी कि जो भीतर है, वह व्यक्तिगत “मैं” नहीं — वह अस्तित्व है।
ज्ञान बाहर से नहीं आता।
भीतर फूल स्वयं खिलता है।
न वेद, न गीता, न उपनिषद —
कोई भी बाहर की चीज भीतर का फूल नहीं खोलती।
न भगवान, न गुरु, न धर्म।
जीवन को बस जीना होता है।
कोई विशेष उपाय नहीं, कोई साधना अनिवार्य नहीं, कोई जटिल ज्ञान जरूरी नहीं।
जैसा जीवन मिला है, उसे स्वीकार करो।
अपनी जरूरत के अनुसार कर्म करो।
धर्म, शास्त्र, नियम, पहचान — सब भूलकर जीवन को सीधे जियो।
जब जीवन पूर्णता से जिया जाता है —
भीतर फूल अपने आप खिलता है।
सत्य पाने से कोई नहीं रोक सकता;
रोक केवल अपनी धारणाएँ करती हैं।
यह कोई उपदेश नहीं — एक अनुभव है।
25 साल की खोज का सार है।
न धन्यवाद चाहिए, न कोई पूजा।
न मैं भगवान हूँ, न गुरु।
मुझे मूर्ख समझो तो भी मुझे कोई शिकायत नहीं।
यदि यम प्रकृति मन की बात से अपना धर्म छोड़ दे तो प्रकृति नहीं चलेगी। इसलिए धन्यवाद आपकी पसंद ना पसंद की आशा ठीक नहीं रखता हूँ
वेदांत 2.0