पेज list

DASHBORD

26_05_09

स्वभाव: धर्म ओर आत्मा की खोज

स्वभाव का तात्विक विवेचन: दर्शन, मनोविज्ञान और आध्यात्मिक धर्म का एक व्यापक अनुसंधान

भारतीय मनीषा के केंद्र में 'स्वभाव' शब्द एक ऐसी धुरी है, जिस पर न केवल वैयक्तिक अस्तित्व, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांडीय व्यवस्था टिकी हुई है। 'स्व' और 'भाव' के मेल से बना यह शब्द अपने भीतर 'स्वयं के होने' या 'आंतरिक सत्ता' के उस रहस्य को समेटे हुए है, जिसे समझने का प्रयास उपनिषदों के ऋषियों से लेकर आधुनिक युग के मनोवैज्ञानिकों और विचारकों ने किया है। स्वभाव केवल एक व्यवहारगत विशेषता नहीं है, बल्कि यह वह आदि-कारण (जगत-कारण) है, जिसे श्वेताश्वतर उपनिषद जैसे प्राचीन ग्रंथों में सृजन के मूल आधार के रूप में देखा गया है । जब हम 'स्वभाव के धर्म' की बात करते हैं, तो हम अनिवार्य रूप से अस्तित्व की उस सत्यता की ओर संकेत करते हैं, जहाँ एक वस्तु या जीव अपने आंतरिक गुणों के साथ पूर्ण सामंजस्य में जीता है। इस व्यापक शोध रिपोर्ट में स्वभाव की परिभाषा, इसकी दार्शनिक प्रणालियों में स्थिति, इसकी स्वीकृति का धार्मिक महत्व और आधुनिक काल तक इसकी विकसित हुई समझ का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

स्वभाव की व्युत्पत्ति और शास्त्रीय परिभाषा

संस्कृत भाषा में 'स्वभाव' (svabhāva) की व्युत्पत्ति 'स्व' (अपना) और 'भू' (होना या बनना) धातु से हुई है, जिसका अर्थ है 'स्वयं की सत्ता' या 'आंतरिक प्रकृति' । पाली साहित्य में इसे 'सभाव' (sabhāva) कहा गया है, जो किसी धर्म या पदार्थ के उस गुण को संदर्भित करता है जो उसे विशिष्ट बनाता है । दार्शनिक दृष्टिकोण से, स्वभाव वह गुण है जो किसी वस्तु से कभी अलग नहीं हो सकता; जैसे अग्नि का स्वभाव उष्णता है, जल का स्वभाव शीतलता है, और चैतन्य का स्वभाव जानना है ।

इतिहास के पन्नों में 'स्वभाववाद' नामक एक स्वतंत्र विचारधारा का उल्लेख मिलता है, जो प्रकृतिवाद (Naturalism) के अत्यंत निकट थी। यह मत मानता था कि संसार में परिवर्तन किसी बाहरी ईश्वर या अदृश्य शक्ति के कारण नहीं, बल्कि वस्तुओं के अपने स्वभाव के कारण होते हैं—अर्थात "चीजें वैसी ही हैं जैसा उनका स्वभाव उन्हें बनाता है" । इस सिद्धांत का साम्य कुछ हद तक चार्वाक दर्शन के साथ भी देखा जाता है, जो केवल प्रत्यक्ष और प्राकृतिक कारणों को ही सत्य स्वीकार करता है।

स्वभाव की परिभाषा को मुख्य रूप से तीन स्तरों पर समझा जा सकता है:

स्तर

परिभाषा का आधार

मुख्य विशेषता

तात्विक (Ontological)

वस्तु का सार (Essence)

वह गुण जो वस्तु के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है ।

मनोवैज्ञानिक (Psychological)

प्रवृत्ति और संस्कार

जन्मजात मानसिक ढांचा और व्यवहारिक झुकाव ।

आध्यात्मिक (Spiritual)

शुद्ध चेतना

माया और कर्मों के आवरण से परे आत्मा की वास्तविक स्थिति ।

विभिन्न भारतीय दार्शनिक प्रणालियों में स्वभाव का स्थान

भारतीय दर्शन की षड्-दर्शन परंपरा और श्रमण परंपराओं ने स्वभाव को अपनी-अपनी सैद्धांतिक संरचनाओं के भीतर अलग-अलग रूपों में व्याख्यायित किया है। इन मतों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि स्वभाव केवल एक व्यक्तिगत लक्षण नहीं, बल्कि एक व्यापक ब्रह्मांडीय सिद्धांत है।

सांख्य दर्शन: प्रकृति और गुणों का खेल

सांख्य दर्शन, जो भारतीय दर्शन की प्राचीनतम शाखाओं में से एक है, स्वभाव को 'प्रकृति' की अंतर्निहित शक्ति के रूप में देखता है। सांख्य का मूल सिद्धांत 'पुरुष' (शुद्ध चेतना) और 'प्रकृति' (जड़ पदार्थ) के द्वैत पर आधारित है । यहाँ स्वभाव वह स्वायत्त क्षमता है जिसके माध्यम से प्रकृति, पुरुष के सान्निध्य में आते ही विकसित होने लगती है। सांख्य के अनुसार, प्रकृति तीन गुणों—सत्व (प्रकाश), रजस (गति) और तमस (जड़ता)—की साम्यावस्था है। जब इस अवस्था में हलचल होती है, तो प्रकृति का स्वभाव ही उसे 23 तत्वों (बुद्धि, अहंकार, मन, इंद्रियाँ आदि) में रूपांतरित कर देता है । यहाँ स्वभाव 'स्व-कारण' (Self-caused) है, जिसे किसी बाहरी कर्ता की आवश्यकता नहीं होती ।

अद्वैत वेदांत: ब्रह्म ही एकमात्र स्वभाव

अद्वैत वेदांत की दृष्टि सांख्य से भिन्न और अधिक सूक्ष्म है। आदि शंकराचार्य और अवधूत गीता जैसे ग्रंथों के अनुसार, एकमात्र ब्रह्म ही वास्तविक 'स्वभाव' है । जिसे हम सामान्यतः व्यक्ति का स्वभाव कहते हैं, वह 'अविद्या' या 'उपाधि' के कारण उत्पन्न एक भ्रम मात्र है। वेदांत 'चित्त' और 'आत्मा' के स्वभाव में गहरा अंतर करता है। चित्त का स्वभाव परिवर्तनशील है, यह स्मृतियों, वासनाओं और संस्कारों से निर्मित होता है और जन्म-दर-जन्म बदलता रहता है । इसके विपरीत, आत्मा का स्वभाव 'सच्चिदानंद' (सत्य, चित्त, आनंद) है, जो अपरिवर्तनीय, शाश्वत और अछूता है ।

वेदांत का मुख्य प्रयोजन मनुष्य को उसके 'आरोपित स्वभाव' (जैसे—मैं दुखी हूँ, मैं शरीर हूँ) से मुक्त कर उसे उसके 'वास्तविक स्वभाव' (मैं ब्रह्म हूँ) में प्रतिष्ठित करना है । यह प्रक्रिया 'नेति-नेति' (यह नहीं, वह नहीं) के माध्यम से की जाती है, जहाँ व्यक्ति उन सभी विशेषताओं को नकारता है जो उसके आत्म-स्वरूप का हिस्सा नहीं हैं ।

बौद्ध दर्शन: स्वभाव और शून्यता का द्वंद्व

बौद्ध दर्शन में स्वभाव की अवधारणा एक महत्वपूर्ण मोड़ लेती है। प्रारंभिक अभिधम्म साहित्य में 'सभाव' का अर्थ किसी क्षणिक घटना (धम्म) का विशिष्ट लक्षण था । उदाहरण के लिए, पृथ्वी तत्व का स्वभाव 'कठोरता' माना गया। हालाँकि, नागार्जुन और माध्यमिक संप्रदाय ने 'स्वभाव' के इस विचार पर तीखा प्रहार किया। नागार्जुन का तर्क था कि यदि किसी वस्तु का अपना कोई 'स्वभाव' है, तो वह स्वतंत्र, अकारण और नित्य होनी चाहिए । चूंकि संसार की प्रत्येक वस्तु 'प्रतीत्यसमुत्पाद' (आश्रित उत्पत्ति) के नियम से बंधी है और अन्य कारणों पर निर्भर है, इसलिए वस्तुओं का अपना कोई स्वतंत्र स्वभाव नहीं है—वे 'स्वभाव-शून्य' हैं ।

यही 'शून्यता' बौद्ध मार्ग में वास्तविक स्वभाव बन जाती है। जब साधक यह अनुभव करता है कि वस्तुएं अपने स्वभाव से रहित हैं, तो वह राग और द्वेष से मुक्त हो जाता है 。 महायान परंपरा में 'तथागतगर्भ' या 'बुद्ध-प्रकृति' को जीव का अंतिम स्वभाव माना गया है, जो मलिनताओं के नीचे छिपा हुआ शुद्ध प्रकाश है ।

जैन दर्शन: स्वभाव, विभाव और पांच समवाय

जैन दर्शन स्वभाव को अत्यंत व्यवस्थित ढंग से परिभाषित करता है। जैन धर्म के अनुसार, प्रत्येक द्रव्य (Substance) का अपना स्वभाव होता है जो उसके अस्तित्व का आधार है। जीव द्रव्य का स्वभाव 'चैतन्य' (चेतना) है । यहाँ 'स्वभाव' और 'विभाव' के बीच का अंतर महत्वपूर्ण है। जब आत्मा अपने शुद्ध गुणों—अनंत ज्ञान और अनंत सुख—में स्थित होती है, तो वह 'स्वभाव' में है । लेकिन जब वह क्रोध, लोभ और अहंकार जैसे कषायों के वशीभूत होकर कार्य करती है, तो उसे 'विभाव' या 'वैभाविक अवस्था' कहा जाता है ।

आचार्य कुंदकुंदाचार्य के 'समयसार' में 'स्व-समय' और 'पर-समय' की गहन व्याख्या मिलती है। 'स्व-समय' वह आत्मा है जो अपने शुद्ध स्वभाव में स्थित है, जबकि 'पर-समय' वह है जो पुद्गल (पदार्थ) और कर्मों के साथ तादात्म्य बिठाकर स्वयं को भूल चुकी है 。 जैन धर्म का 'अनेकांतवाद' यह भी सिखाता है कि किसी भी कार्य की सिद्धि के लिए 'स्वभाव' उन पांच महत्वपूर्ण कारकों (समवायों) में से एक है जो मिलकर परिणाम देते हैं।

समवाय

अर्थ

कार्य में भूमिका

काल

समय

सही समय आने पर ही बीज फलता है ।

स्वभाव

आंतरिक योग्यता

बीज के भीतर वृक्ष बनने की जन्मजात शक्ति ।

नियति

भवितव्यता

कार्य का निश्चित प्रारूप ।

पूर्वकृत

पूर्व कर्म

पिछले जन्मों के संस्कारों का प्रभाव ।

पुरुषार्थ

उद्यम

व्यक्ति का अपना सक्रिय प्रयास, जो अन्य कारकों को बदल सकता है ।

जैन दर्शन के अनुसार, स्वभाव ही वह बीज है जिसमें मुक्ति की संभावना छिपी है, लेकिन उसे प्रकट करने के लिए पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है ।

स्वभाव का धर्म: स्वधर्म और भगवद गीता का संदेश

क्या स्वभाव को स्वीकार करना धर्म है? इस प्रश्न का सबसे सशक्त उत्तर भगवद गीता के 'स्वधर्म' सिद्धांत में मिलता है। गीता के अनुसार, धर्म कोई बाहरी कर्मकांड नहीं है, बल्कि वह आचरण है जो व्यक्ति के अपने स्वभाव (Nature) के अनुकूल हो । भगवान कृष्ण कहते हैं कि दूसरे के धर्म (पराधर्म) का अच्छी तरह पालन करने की तुलना में अपने गुणरहित स्वभाव (स्वधर्म) में मरना भी कल्याणकारी है । 'श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्' (अध्याय 3, श्लोक 35) यह स्पष्ट करता है कि अपने स्वभाव के विरुद्ध जीना 'भयावह' है ।

स्वभाव और धर्म के इस संबंध को निम्नलिखित दृष्टिकोणों से समझा जा सकता है:

  1. स्वभाव आधार के रूप में: प्रत्येक मनुष्य त्रिगुणात्मक प्रकृति (सत्व, रजस, तमस) के एक अनूठे मिश्रण के साथ जन्म लेता है। यह मिश्रण ही उसके 'स्वभाव' का निर्धारण करता है ।

  2. स्वधर्म अभिव्यक्ति के रूप में: जब मनुष्य अपने जन्मजात गुणों और क्षमताओं के अनुरूप समाज में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करता है, तो वह 'स्वधर्म' कहलाता है। एक शिक्षक का स्वधर्म ज्ञान बाँटना है, और एक सैनिक का स्वधर्म न्याय की रक्षा करना है ।

  3. आंतरिक द्वंद्व की समाप्ति: जब कर्म स्वभाव के अनुकूल होता है, तो मन में संघर्ष समाप्त हो जाता है और 'सत्व' गुण प्रधान होने लगता है, जिससे चित्त की शुद्धि होती है ।

गीता यह भी चेतावनी देती है कि यदि कोई व्यक्ति अपने स्वभाव के विरुद्ध जाकर केवल समाज को दिखाने के लिए कार्य करता है, तो वह आंतरिक रूप से कभी सुखी नहीं हो सकता । अतः स्वभाव की स्वीकृति ही आध्यात्मिक यात्रा का प्रथम सोपान है।

स्वभाव की मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक व्याख्या

आधुनिक मनोविज्ञान में स्वभाव को 'Temperament' और 'Personality' के माध्यम से समझा जाता है। शोध संकेत देते हैं कि स्वभाव का 20% से 60% हिस्सा आनुवंशिक (Genetics) होता है और यह जन्म के समय से ही स्पष्ट दिखने लगता है ।

स्वभाव बनाम व्यक्तित्व (Temperament vs. Personality)

मनोविज्ञान में इन दोनों के बीच के सूक्ष्म भेदों को समझना आवश्यक है, जो भारतीय दर्शन के 'संस्कार' और 'चरित्र' के समांतर हैं।

विशेषता

स्वभाव (Temperament)

व्यक्तित्व (Personality)

स्रोत

जैविक और आनुवंशिक ।

अनुभव, पर्यावरण और सामाजिककरण ।

परिवर्तनशीलता

जीवन भर अपेक्षाकृत स्थिर और अपरिवर्तनीय 。

समय के साथ और प्रयासों से बदला जा सकता है ।

अभिव्यक्ति

प्रतिक्रिया की शैली (कैसा महसूस करते हैं) ।

व्यवहार की सामग्री (क्या करते हैं और क्यों) ।

मनोवैज्ञानिक जैसे कार्ल जुंग ने प्राचीन 'चार स्वभावों' (Sanguine, Choleric, Melancholic, Phlegmatic) को आधुनिक संज्ञानात्मक प्रकारों (Thinking, Feeling, Sensing, Intuition) के साथ जोड़कर यह समझने का प्रयास किया कि कैसे व्यक्ति का आंतरिक ढांचा उसके विश्व-बोध को प्रभावित करता है । यह आधुनिक समझ भारतीय दर्शन के उस विचार का समर्थन करती है कि स्वभाव एक ऐसी 'लिमिट' या 'बाउंड्री' है जिसके भीतर ही व्यक्ति का विकास संभव है।

स्वभाव में जीना: आध्यात्मिक अभ्यास और आधुनिक रहस्यवादी

स्वभाव में जीने का अर्थ है 'सहज' होना। आधुनिक युग के महान संतों ने इस 'सहजता' को ही धर्म का सार बताया है।

रमण महर्षि: सहज समाधि और आत्म-खोज

रमण महर्षि के अनुसार, 'सहज समाधि' ही मनुष्य की वास्तविक स्थिति (Natural State) है । अन्य प्रकार की समाधियाँ, जिनमें व्यक्ति बाहरी दुनिया से कट जाता है, अस्थायी हैं। लेकिन सहज समाधि वह है जहाँ व्यक्ति संसार के सारे कार्य—खाना, चलना, बात करना—करते हुए भी अपने 'आत्म-स्वभाव' से कभी विचलित नहीं होता । महर्षि का प्रश्न "मैं कौन हूँ?" वास्तव में स्वभाव की परतों को हटाने का ही एक साधन है। जब सारे विचार विलीन हो जाते हैं, तो जो बचता है वह हमारा वास्तविक स्वभाव है ।

जे. कृष्णमूर्ति: विकल्पहीन जागरूकता (Choiceless Awareness)

जे. कृष्णमूर्ति स्वभाव में जीने का अर्थ 'जो है' (What is) को बिना किसी पसंद-नापसंद के देखना मानते थे। उनके अनुसार, जब हम चुनाव करते हैं कि "मुझे ऐसा होना चाहिए" और "वैसा नहीं", तो हम संघर्ष (Conflict) पैदा करते हैं 。 'विकल्पहीन जागरूकता' वह स्थिति है जहाँ मन केवल एक साक्षी बन जाता है। इस जागरूकता में ही वास्तविक रूपांतरण होता है। कृष्णमूर्ति का तर्क था कि जागरूकता हमारा स्वभाव है, लेकिन इसे 'स्मृति' और 'कंडीशनिंग' ने ढका हुआ है 。

ओशो: प्रामाणिकता ही धर्म है

ओशो ने धर्म को स्वभाव का पर्याय माना। उनका कहना था कि 'धर्म' का अर्थ ही है 'वस्तु का स्वभाव' (जैसे—आग का धर्म जलना)। मनुष्य के संदर्भ में, उसका स्वभाव उत्सव, प्रेम और चेतना है । ओशो स्थापित धर्मों के विरुद्ध थे क्योंकि वे व्यक्ति पर एक 'चरित्र' थोपते हैं जो उसके स्वभाव के प्रतिकूल हो सकता है । उनके अनुसार, व्यक्ति को अपने भीतर के 'होने' (Being) को खोजने के लिए सभी सामाजिक और धार्मिक कंडिशनिंग को तोड़ना होगा। स्वभाव में जीना ही सच्ची 'धार्मिकता' है 。

स्वभाव की स्वीकृति: धर्म या जड़ता?

एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि क्या स्वभाव को स्वीकार करने का अर्थ अपनी बुराइयों या कमजोरियों को स्वीकार कर लेना है? यहाँ 'स्वभाव' शब्द की गहराई को समझना अनिवार्य है।

  1. अज्ञानी की स्वीकृति: "मैं क्रोधी स्वभाव का हूँ, इसलिए मैं क्रोध करूँगा।" यह स्वीकृति नहीं, बल्कि जड़ता और अहंकार है 。

  2. साधक की स्वीकृति: "मैं देख रहा हूँ कि मेरे भीतर क्रोध उठ रहा है, यह मन की एक अवस्था है।" यह जागरूकता है। यहाँ साधक क्रोध को अपना 'वास्तविक स्वभाव' नहीं मानता, बल्कि उसे 'चित्त की एक लहर' के रूप में देखता है 。

वास्तविक स्वभाव वह नहीं है जिसे हम समय के साथ बदलते हुए देखते हैं (जैसे—क्रोध, भय, ईर्ष्या), बल्कि वह है जो इन सबके पीछे 'द्रष्टा' या 'साक्षी' के रूप में मौन खड़ा है । अतः स्वभाव को स्वीकृत करने का धर्म वास्तव में अपनी 'क्षणिक वृत्तियों' को स्वीकार करना नहीं, बल्कि अपने 'अपरिवर्तनीय स्वरूप' को पहचानना है।

वास्तविक स्वभाव का अर्थ और परिभाषा: आज तक का निष्कर्ष

सृष्टि के आरंभ से आज तक, स्वभाव की परिभाषा ने कई आयाम तय किए हैं। यद्यपि विभिन्न दर्शनों की शब्दावली अलग है, लेकिन वे सभी एक सामान्य निष्कर्ष की ओर संकेत करते हैं।

स्वभाव का तात्विक सार

आज के संदर्भ में स्वभाव की स्वीकृत परिभाषा को तीन मुख्य स्तंभों पर खड़ा किया जा सकता है:

  • स्थिरता (Stability): स्वभाव वह है जो परिवर्तन के बीच अपरिवर्तित रहता है। शरीर बदलता है, विचार बदलते हैं, लेकिन 'होने का भाव' (The sense of Being) एक जैसा रहता है ।

  • अकारणता (Uncaused Nature): वास्तविक स्वभाव किसी बाहरी कारण से पैदा नहीं होता। यह हमारा अपना है, उधार लिया हुआ नहीं 。

  • सहजता (Spontaneity): जो कार्य करने में कोई प्रयास नहीं करना पड़ता, वही स्वभाव है। जैसे सूर्य को चमकने के लिए प्रयास नहीं करना पड़ता, वैसे ही आत्मा को चैतन्य रहने के लिए प्रयास नहीं करना पड़ता 。

दार्शनिक परिप्रेक्ष्य

स्वभाव का अंतिम अर्थ

सांख्य

प्रकृति की त्रिगुणात्मक क्षमता और पुरुष की तटस्थता ।

वेदांत

ब्रह्म-स्वरूप, सच्चिदानंद, माया रहित आत्मा ।

बौद्ध

शून्यता ही स्वभाव है; बुद्ध-प्रकृति की प्राप्ति ।

जैन

द्रव्य के शाश्वत गुण; शुद्ध ज्ञान और सुख ।

मनोविज्ञान

जैविक और न्यूरोलॉजिकल विन्यास (Temperament) ।

धर्म के रूप में स्वभाव का क्रियान्वयन: व्यावहारिक अनुप्रयोग

स्वभाव के धर्म को जीवन में उतारना ही वास्तविक आध्यात्मिकता है। इसके लिए कुछ प्रायोगिक चरणों का उल्लेख विभिन्न परंपराओं में मिलता है:

  1. आत्म-निरीक्षण (Self-Inquiry): दिन भर की गतिविधियों में यह देखना कि कौन से कार्य 'सहज' लग रहे हैं और कौन से 'प्रयासपूर्ण' या 'दबावपूर्ण'। जो सहज है, वह स्वभाव के निकट है 。

  2. दैनिक जीवन को साधना बनाना: बर्तनों को धोना, पैसे कमाना या रिश्तों के तनाव—इन्हें बाधा नहीं, बल्कि स्वभाव को समझने का कच्चा माल (Grist for the mill) बनाना 。

  3. कंडीशनिंग से मुक्ति: यह पहचानना कि हमारे कितने विचार और आदतें हमारी अपनी हैं और कितनी समाज, परिवार या मीडिया द्वारा थोपी गई हैं। दूसरों के विचारों में जीना 'पराधर्म' है 。

  4. मौन और ध्यान: जब मन के शब्द शांत होते हैं, तभी स्वभाव की आवाज सुनाई देती है। ध्यान कोई तकनीक नहीं, बल्कि स्वभाव में ठहरने की कला है 。

निष्कर्ष: स्वभाव में जीना ही सत्य है

इस शोध का अंतिम निष्कर्ष यह है कि स्वभाव की धर्म के रूप में स्वीकृति ही वह एकमात्र मार्ग है जो मनुष्य को उसके अस्तित्वगत संकट से उबार सकता है। जब हम कहते हैं कि "स्वभाव में जीना ही धर्म है", तो हम यह कह रहे होते हैं कि अपने सत्य के प्रति ईमानदार होना ही सर्वोच्च नैतिकता है।

संसार का प्रत्येक संघर्ष 'जो हम हैं' और 'जो हमें होना चाहिए' के बीच के फासले का परिणाम है। इस फासले को मिटाना ही धर्म है। वास्तविक स्वभाव कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे बाहर से प्राप्त करना है; यह वह हीरा है जो हमारे भीतर संस्कारों और स्मृतियों की धूल के नीचे दबा हुआ है। इसे पहचानना ही ज्ञान है, इसे स्वीकार करना ही शांति है, और इसमें अविचल होकर जीना ही मोक्ष या परम धर्म है।

आज तक की समस्त दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक प्रगति हमें इसी एक बिंदु पर लाकर खड़ा करती है कि—स्वभाव ही स्वयं का भगवान है। जब तक मनुष्य अपने स्वभाव के विरुद्ध रहेगा, वह दुखी रहेगा। जिस क्षण वह अपने स्वभाव को पूर्णतः स्वीकार कर लेता है, वह 'सहज' हो जाता है, और सहजता ही बुद्धत्व का दूसरा नाम है।

अतः स्वभाव की परिभाषा आज भी वही है जो उपनिषदों के काल में थी—वह जो बदलता नहीं, वह जो हमारा अपना है, और वह जो हमें संपूर्णता प्रदान करता है। इसे स्वीकार करना न केवल धर्म है, बल्कि यह जीवन जीने का एकमात्र तर्कसंगत और आनंदपूर्ण तरीका है।

वेदांत 2.0 Life