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26_05_12

धर्म पलायन नहीं — कर्म में चेतना है ✧

 धर्म पलायन नहीं — कर्म में चेतना है ✧

✍🏻 — 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓣 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓷𝓲
मनुष्य ने धर्म को समझने में सबसे बड़ी भूल यह की
कि उसने “त्याग” को “सत्य” मान लिया।
किसी ने पद छोड़ा,
किसी ने घर छोड़ा,
किसी ने वस्त्र बदले,
और समाज ने कह दिया —
“यह आध्यात्मिक हो गया।”
लेकिन प्रश्न यह है —


यदि बुद्धिमान लोग संसार छोड़ देंगे,
तो संसार किसके हाथ में बचेगा?
यदि एक जाग्रत कलेक्टर प्रशासन में रहे,
तो वह हजार भ्रष्ट अधिकारियों से अधिक प्रकाश ला सकता है।
यदि एक वैज्ञानिक भीतर से मौन को जान ले,
तो विज्ञान विनाश नहीं, मानवता बन सकता है।
यदि एक इंजीनियर चेतना से जुड़ जाए,
तो तकनीक केवल व्यापार नहीं, सभ्यता का उत्थान बन सकती है।
धर्म का अर्थ कर्म से भागना नहीं है।
धर्म का अर्थ है —
कर्म में चेतना का प्रवेश।
कृष्ण इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं।
वे केवल बाँसुरी बजाने वाले साधु नहीं थे।
वे राजनीतिज्ञ भी थे,
रणनीतिकार भी,
योद्धा भी,
दार्शनिक भी।
यदि त्याग ही अंतिम धर्म होता,
तो कृष्ण अर्जुन से कहते —
“युद्ध छोड़ दो।”
लेकिन कृष्ण ने अर्जुन को युद्धभूमि में खड़ा किया।
क्योंकि अधर्म से भागना भी अधर्म हो सकता है।
✧ जो धर्म मनुष्य को जिम्मेदारी से दूर ले जाए,
वह अधूरा धर्म है। ✧
✧ जो आध्यात्मिकता मनुष्य को अधिक सजग, बुद्धिमान और उत्तरदायी बना दे,
वही जीवित अध्यात्म है। ✧
आज समस्या यह नहीं कि संसार में ज्ञान कम है।
समस्या यह है कि
ज्ञान को भावुकता में बदल दिया गया है।
शास्त्रों को तोड़-मरोड़ कर
त्याग, भीड़, सेवा और भय का व्यापार बनाया जा रहा है।
जबकि वास्तविक अध्यात्म
मनुष्य को भागने नहीं,
और गहराई से जीने योग्य बनाता है।
राम आध्यात्मिक थे —
फिर भी राजा थे।
कृष्ण आध्यात्मिक थे —
फिर भी राजनीति के केंद्र में थे।
अर्थात सत्य संसार के विरोध में नहीं,
अचेतनता के विरोध में है।
✧ धर्म संसार छोड़ना नहीं,
संसार में चेतना के साथ खड़ा होना है। ✧
Vedanta 2.0 life
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