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26_05_07

स्त्री का योग: परिधि से हृदय तक, हृदय में ठहराव

 स्त्री का योग: परिधि से हृदय तक, हृदय में ठहराव

"स्त्री में कुंडली नहीं होती... स्त्री की काम ऊर्जा परिधि से हृदय, हृदय से योनि चक्र पर जाती है"
इसका अर्थ:
स्त्री की ऊर्जा 'लिनियर' नहीं, 'सर्कुलर' है। वह पूरे शरीर, त्वचा, इंद्रियों में फैली है। यही 'परिधि' है।
• उसका जागरण: स्पर्श → सुरक्षा → प्रेम से ऊर्जा सिमटकर हृदय में आती है।
चित्र में देखिए - पूरे शरीर से सुनहरी धाराएँ हृदय कमल में।
• उसका योग: हृदय में रुक जाना। बस 'होना'।
उपस्थिति। यही 'योग है'।
• उसकी समाधि: हृदय ही उसका सहस्त्रार है।
गीत, संगीत, नृत्य, ममता, सृजन - यही उसका शून्य है, यही पूर्ण है। उसे कहीं ऊपर नहीं जाना।
इसलिए:
स्त्री के लिए मूलाधार से सहस्त्रार की यात्रा नहीं है।
उसकी यात्रा परिधि से हृदय तक है। हृदय में खिल गया तो सब खिल गया। नीचे जो कमल है चित्र में, वह योनि नहीं, धरती से जुड़ाव है। हृदय से ऊर्जा नीचे जाए तो जीवन देती है, बाहर जाए तो नृत्य-गीत बनती है।
2. पुरुष का योग: मूलाधार से हृदय, फिर शून्य की ओर
: "पुरुष को उठा की दिशा बदलना योग है... मूलाधार से हृदय की यात्रा"
इसका अर्थ:
पुरुष की ऊर्जा स्वभाव से 'बहिर्गामी' है।
मूलाधार में काम बनकर बाहर फेंकती है।
• उसका योग:
इस धारा को रोकना, दिशा बदलना, ऊपर मोड़ना। पहला पड़ाव हृदय है।
• उसकी चुनौती:
पुरुष हृदय भूलकर सीधे लक्ष्य पर जाता है।
सूखा रह जाता है। इसलिए उसे 'हृदय तक आना है'।
स्त्री उसे हृदय सिखाती है।
• उसकी यात्रा:
पर हृदय अंतिम नहीं। हृदय से आगे सहस्त्रार तक, फिर शून्य तक।
यही 'ज्ञान और 0' है।
पुरुष का सहस्त्रार में स्थिर होना समाधि है।
3. मिलन का सूत्र: हृदय पर संगम
तो मिलन कहाँ हो?
हृदय पर।
स्त्री पहले से हृदय में है।
पुरुष को यात्रा करके हृदय तक आना है। जब पुरुष हृदय में पहुँचता है, तभी वास्तविक तांत्रिक मिलन होता है।
उसके बाद:
• स्त्री हृदय में ही रहकर पूर्ण है। •
पुरुष हृदय से विश्राम लेकर आगे शून्य की यात्रा पर निकल सकता है।
यही कारण है कि शिव पार्वती के चरणों में बैठते हैं, और पार्वती नृत्य करती हैं।
शिव का मौन, पार्वती का नृत्य - दोनों पूर्ण।
आपके चित्र में यही दिख रहा है:
स्त्री की सारी ऊर्जा हृदय कमल में, और वहाँ से धरती तक फैल रही है। उसे ऊपर नहीं जाना।
उसका ऊपर जाना ही नीचे बहना है - सृजन, प्रेम, करुणा बनकर।
यह बहुत गहरा सूत्र है। 99% लोग यही गलती करते हैं - स्त्री को भी पुरुष वाला 'ऊपर उठो' का योग सिखाते हैं। जबकि उसका योग 'भीतर उतरो और रुक जाओ' का है।
स्त्री मुक्ति 0 नहीं है शस्त्री को प्रकृति में विलय होना है,
इसलिए स्त्री गीत है नेता हैं संगीत है, पुरुष की 0 मे जाना है, यानी पुरुष से आया है स्त्री प्रकृति आई है।
पुरुष की लम्बी यात्रा है स्त्री के लिए कोई बड़ी यात्रा नही है।
पुरुष की एक यात्रा है मूला आधार धरती पर पर प्रकृति फ़िर 0 की यात्रा।
स्त्री नीचे जाती है प्रवजन और हृदय से फैलती है तब पुनः प्रकृति में समय जाती है इसलिए इसलिए कोई ज्ञान नही है,
यदि स्त्र पुरुष के मार्ग पा वाह चाहे राजनीतिक युद्ध आक्रमण हो यह सहज मार्ग नहीं है,
स्त्री प्रकृति सेआई है प्रकृति मे हो जाता प्रकृति में विलय होना है, इसलिए हृदय तक यात्रा पर्याप्त है, नहीं ज्ञात हासिल करना नहीं समाधि हासिल करने है वाह जीत नृत्यों संगीत में ही विलय हो कर मुक्ति होती है