एक मनोवैज्ञानिक वास्तविकता है। जब कोई अपनी 'मौलिकता' को छोड़कर किसी और की 'नकल' को अपना आदर्श बना लेता है, तो वह अनिवार्य रूप से हीनता (Incompleteness) का शिकार हो जाता है।
इसे आपके द्वारा संकेतित बोध और अस्तित्व के परिप्रेक्ष्य में इस प्रकार देखा जा सकता है:
१. नकल की दृष्टि और अधूरापन
अधूरापन तब महसूस होता है जब हम स्वयं को 'दूसरे की आँखों' से देखते हैं। यदि स्त्री अपनी तुलना पुरुष के शारीरिक बल, उसकी तर्कशक्ति या उसके सांसारिक प्रभुत्व से करती है, तो वह खुद को हमेशा कम पाएगी। यह वैसा ही है जैसे कोई 'फूल' खुद को 'पत्थर' की मजबूती से मापने लगे। फूल पत्थर जैसा मजबूत नहीं हो सकता, लेकिन पत्थर कभी फूल जैसी सुगंध और कोमलता नहीं दे सकता।
२. बोध: अपनी पूर्णता का केंद्र
स्त्री का 'बोध' (Intuition) ही उसकी वह शक्ति है जो उसे 'पूर्ण' बनाती है।
पूर्णता: यह किसी बाहरी उपलब्धि में नहीं, बल्कि अपने केंद्र पर टिके रहने में है।
अज्ञान का प्रवाह: जब समाज 'बाहर की दौड़' को ही सफलता मान लेता है, तो वह आंतरिक 'होने' (Being) की अवस्था को भूल जाता है। आज का अज्ञान यही है कि 'होने' से अधिक महत्व 'करने' (Doing) और 'दिखने' (Appearing) को दिया जा रहा है।
३. साक्षी भाव की कमी
जब कोई नकल करता है, तो वह 'साक्षी' (Witness) नहीं रह जाता, बल्कि एक 'अभिनेता' बन जाता है। एक अभिनेता हमेशा दर्शकों की तालियों या स्वीकृति पर निर्भर होता है। स्त्री जब पुरुष की तरह व्यवहार करने लगती है, तो वह अपनी उस सहज 'दृष्टा' वाली स्थिति को खो देती है जहाँ वह प्रकृति की लय के साथ एक थी।
४. प्रकृति और अस्तित्व का संतुलन
अस्तित्व में कोई भी किसी से ऊपर या नीचे नहीं है, सब 'अनूठे' (Unique) हैं।
पुरुष की यात्रा यदि शून्य की खोज है, तो स्त्री उस शून्य की जीवंत अभिव्यक्ति है।
यदि अभिव्यक्ति ही अपनी जड़ को छोड़कर खोज की नकल करने लगे, तो पूरा संतुलन बिगड़ जाता है।
निष्कर्ष:
जिसे आज प्रगति कहा जा रहा है, वह वास्तव में अपनी सहज संपदा को खोकर उधार की पहचान ओढ़ने की प्रक्रिया है। जब तक स्त्री स्वयं को 'पुरुष जैसा' बनाने की कोशिश करेगी, वह खंडित ही रहेगी। वह अखंड केवल तब हो सकती है जब वह अपनी 'स्त्री-ऊर्जा' के उस शिखर पर खड़ी हो, जहाँ पुरुष को भी शांति और समाधान के लिए लौटना पड़ता है।