विज्ञान, धर्म, आधुनिक बुद्धिजीवी—
सब बाहर से उजले दिखते हैं,
भीतर अब भी अनदेखा अंधकार है।
सभ्यता का चेहरा सजा हुआ है,
पर भीतर की कोई गारंटी नहीं।
व्यवहार तब तक मधुर है
जब तक बात अपने पक्ष में हो;
विपरीत होते ही
सभ्यता ही रास्ता बदलकर
बदले का माध्यम बन जाती है।
यही आज की सभ्यता है—
जहाँ पाप भी कानून की भाषा में सही ठहर जाता है।
कानून मनुष्य बनाता है,
और वही उसे मोड़ना भी जानता है।
चालाक लोग नियमों के भीतर रहकर
विपरीत रास्तों से भी अपने लक्ष्य तक पहुँच जाते हैं,
और समाज उन्हें सही मान लेता है।
फिर वही कर्म,
गंगा में धोने की कोशिश—
पर कुछ दाग जल से नहीं उतरते,
क्योंकि वे भीतर के हैं।
दुनिया ऐसे व्यक्ति को
महान, अहिंसक, संत कह देती है,
इतिहास उसे सम्मान दे देता है—
क्योंकि उसने सब कुछ
“सभ्य तरीके” से किया है।
मैं व्यक्ति को दोष नहीं देता।
डॉक्टर हो या गरीब—
कोई अकेला दोषी नहीं।
दोष उस व्यवस्था का है
जिसे हमने मिलकर रचा है।
एक डॉक्टर सबके लिए एक ही फीस रखता है—
व्यवस्था कहती है: यह न्याय है।
पर उसी में एक गरीब की
सालों की कमाई एक दिन में समाप्त हो जाती है।
यह अन्याय दिखता है,
पर कानून इसे सही मानता है।
तब समझ आती है—
शायद कोई करता ही नहीं।
सब हो रहा है।
डॉक्टर नहीं करता,
गरीब नहीं करता,
सत्ता भी नहीं करती—
सिस्टम चलता है।
फिर दोष किसका?
जिसके पास देखने की आँख है—
वही उत्तरदायी लगता है।
पर वह भी अकेला क्या बदले?
भीड़ के पास आँख नहीं,
और यही चक्र चलता रहता है।
गलती कहाँ हुई?
“मैं” आया—
और संसार हिल गया।
यह “मैं” ही केंद्र है,
जहाँ से शक्ति, संघर्ष और भ्रम जन्म लेते हैं।
मैं कहता हूँ—“मैंने किया”
और यहीं से बोझ शुरू होता है।
जीत-हार, डर-चिंता,
अराजकता—सब उसी से उपजते हैं।
यदि मैं कर्ता हूँ,
तो हर परिणाम मेरा भार है।
और यदि मैं जीतता हूँ,
तो वही जीत
नई समस्या का बीज बनती है।
यदि समझ आ जाए—
“मैं कर्ता नहीं, मुझसे हो रहा है”
तो जीत-हार खेल हो जाते हैं,
सुख-दुख लहरें बन जाते हैं।
लेकिन जैसे ही ऊपर कोई कहता है—
“मैं कर्ता हूँ”
तो नीचे तक सब कर्ता बनने लगते हैं।
और यदि कोई श्रेष्ठ यह कह दे—
“मैं नहीं करता, मुझसे होता है”
तो नीचे तक संतुलन उतर सकता है।
दुख, बर्बादी, नर्क—
यह भी एक विज्ञान है।
और अंततः
सब इसके आगे झुकते हैं।
पर जो जाग गया—
कि “मैं नहीं हूँ, मुझसे हो रहा है”
वहीं से संतुलन जन्म लेता है।
वहीं से शांति,
वहीं से मुक्ति।
यह संसार
सृष्टि की एक गहरी नीति से चल रहा है—
वह नीति सुंदर है, सहज है।
पर “मैं” ने
हर जगह समस्या के घर बना दिए हैं।
अब दुनिया
समाधान बेचती है—
धर्म, गुरु, मोटिवेशन, विचार—
और हर समाधान
एक नई समस्या बन जाता है।
क्योंकि हर समाधान
किसी “कर्ता” से आता है।
जब गुरु, शास्त्र, संस्था कहते हैं—
“हम तुम्हें सफलता देंगे, हमारे पीछे चलो”
तभी खतरा शुरू होता है।
एक व्यक्ति का अहंकार सीमित होता है,
पर जब धर्म, भगवान, या संस्था को कर्ता बना दिया जाता है—
तो पूरा समूह कर्ता बन जाता है।
फिर “मेरा धर्म”, “तेरा धर्म”,
“मेरा भगवान”, “तेरा भगवान”—
यहीं से संघर्ष, युद्ध, हिंसा जन्म लेते हैं।
यही अंधकार है—
अंधे गुरु, अंधी संस्थाएँ,
जो मार्ग नहीं दिखातीं,
बल्कि “कर्ता” बनाती हैं।
यदि गुरु केवल इतना कहे—
“हो रहा है”
और खुद कर्ता न बने,
तो न कोई संस्था जन्म ले,
न कोई विभाजन।
यदि मनुष्य जाग जाए—
कि “मैं कर्ता नहीं”
तो न युद्ध बचे,
न द्वेष, न टकराव।
पर जहाँ “मैं” है,
वहीं चक्र है।
इसलिए—
न कोई अंतिम समाधान है,
न कोई अंतिम विजय।
क्योंकि हर समाधान
फिर एक नए कर्ता को जन्म देता है।
यही संसार का चक्र है।
Independent Researcher & Philosopher
Focus: The Science of Existence, Non-Dualism, and Consciousness Studies
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अज्ञात अज्ञानी