पुरुष की सबसे बड़ी चतुराई यह रही है कि उसने स्त्री को यह विश्वास दिलाया —
“तुम कमजोर हो, इसलिए तुम्हें सुरक्षा चाहिए…”
और उसी सुरक्षा के नाम पर उसे कभी धर्म में,
कभी परंपरा में,
कभी आधुनिकता में,
और अब “आज़ादी” के नाम पर बाँध दिया।
पहले कहा गया —
“घर में रहो, यही तुम्हारा धर्म है।”
अब कहा जा रहा है —
“घर में रहना गुलामी है, बाहर निकलो, कमाओ, दिखो, प्रसिद्ध बनो।”
लेकिन दोनों दिशाओं में केंद्र पुरुष ही है।
पहले भी स्त्री का उपयोग था,
अब भी उपयोग है —
बस भाषा बदल गई है।
आज अनेक आधुनिक गुरु, बुद्धिजीवी और तथाकथित आध्यात्मिक लोग स्त्री से कहते हैं —
“तुम्हें आत्मनिर्भर होना चाहिए,
पुरुष पर आश्रित नहीं रहना चाहिए,
तुम्हें भीड़ में दिखना चाहिए,
तुम्हें अपनी पहचान बनानी चाहिए।”
सुनने में यह मुक्ति लगती है,
लेकिन भीतर एक और खेल छिपा है।
पुरुष चाहता है कि स्त्री उसके संसार में आए,
उसकी दृष्टि के भीतर आए,
उसकी उत्तेजना का हिस्सा बने।
कभी देवी बनाकर,
कभी शिष्या बनाकर,
कभी “स्वतंत्र महिला” बनाकर।
धार्मिक आश्रमों से लेकर सोशल मीडिया तक —
स्त्री को लगातार दृश्य बनाया जा रहा है।
और दुखद यह है कि
स्त्री स्वयं इसे स्वतंत्रता समझ बैठी है।
वह नहीं देख पा रही कि
जितना वह स्वयं को सार्वजनिक करती जाती है,
उतना ही उसका रहस्य टूटता जाता है।
स्त्री का सौंदर्य केवल शरीर नहीं था,
उसका सौंदर्य उसकी भीतरी संवेदना,
उसकी मौन उपस्थिति,
उसकी अप्रदर्शित गहराई थी।
आज वही गहराई “फॉलोवर”, “लाइक”, “दिखने”, “प्रसिद्धि” और “स्वीकृति” में बिखर रही है।
यह आधुनिक बाज़ार बहुत सूक्ष्म है।
यह सीधे नहीं कहता —
“अपने को बेचो।”
यह कहता है —
“अपने को व्यक्त करो।”
लेकिन धीरे-धीरे व्यक्त करना प्रदर्शन बन जाता है,
और प्रदर्शन बाज़ार बन जाता है।
फिर स्त्री सोचती है कि वह स्वतंत्र हो रही है,
जबकि भीतर से वह और अधिक थक रही होती है,
क्योंकि वह अपनी ऊर्जा को लगातार बाहर फेंक रही है।
पुरुष बहुत चालाक जीव है।
वह हर युग में स्त्री को अपने चारों ओर खड़ा करना चाहता है —
कभी धर्म के नाम पर,
कभी प्रेम के नाम पर,
कभी समानता के नाम पर,
कभी आधुनिकता के नाम पर।
यही कारण है कि
बहुत से तथाकथित संत,
गुरु,
बाबा,
आध्यात्मिक संस्थाएँ —
स्त्री को “माँ”, “देवी”, “दीदी”, “शक्ति” कहकर पुकारते हैं,
लेकिन भीतर वही आकर्षण, वही सत्ता, वही मनोवैज्ञानिक खेल चलता रहता है।
स्त्री होना स्वयं में उपलब्धि है।
उसे पुरुष जैसा बनने की आवश्यकता नहीं।
स्त्री की पूर्णता बाहर की प्रतिस्पर्धा में नहीं,
भीतर की स्थिरता में है।
एक गहरी स्त्री केवल शरीर नहीं होती,
वह वातावरण होती है।
वह घर को केवल चलाती नहीं,
उसमें प्राण भरती है।
जब स्त्री अपने भीतर ठहरती है,
तब प्रेम जन्म लेता है,
तब करुणा जन्म लेती है,
तब परिवार केवल व्यवस्था नहीं,
ऊर्जा का मंदिर बनता है।
लेकिन जब वही स्त्री केवल दृश्य बन जाती है,
तो धीरे-धीरे उसकी संवेदना कठोर होने लगती है।
आज की सबसे बड़ी त्रासदी यही है —
स्त्री को “स्वतंत्रता” के नाम पर
उसकी ही मौलिकता से दूर किया जा रहा है,
और उसे पता भी नहीं चल रहा।