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  गीता का सार — कर्ता कौन है? ✧ — 𝓐𝓰𝔂𝓪𝓣 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓷𝓲 मनुष्य गीता को पढ़ता कम है, भीड़ से सुनता अधिक है। भीड़ कहती है — भक्ति करो, सेवा...

गीता का सार — कर्ता कौन है? ✧

 गीता का सार — कर्ता कौन है? ✧

✍🏻 — 𝓐𝓰𝔂𝓪𝓣 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓷𝓲
मनुष्य गीता को पढ़ता कम है,
भीड़ से सुनता अधिक है।
भीड़ कहती है —
भक्ति करो,
सेवा करो,
ज्ञान लो,
गुरु पकड़ो,
समर्पण करो।


लेकिन गीता के आरंभ और अंत को यदि कोई सच में देख ले,
तो पूरा खेल बदल जाता है।
आरंभ में ही कहा गया —
“जो हुआ अच्छा हुआ,
जो हो रहा है अच्छा हो रहा है,
जो होगा अच्छा होगा।”
और अंत में कहा गया —
“यहाँ कुछ भी तुम्हारा नहीं।”
यदि इन दो वाक्यों को कोई भीतर उतार ले,
तो फिर बीच का पूरा मार्ग केवल समझ के लिए रह जाता है।
लेकिन मनुष्य पहले और अंतिम सत्य को छोड़ देता है,
और बीच के साधनों में खो जाता है।
भक्ति साधन थी — उसे व्यवसाय बना दिया।
ज्ञान समझ का मार्ग था — उसे अहंकार बना दिया।
कर्म जीवन की स्वाभाविकता थी — उसे पाप-पुण्य का बोझ बना दिया।
कृष्ण अर्जुन को धर्मगुरु बनाने नहीं आए थे।
वे अर्जुन को युद्ध से भगाने भी नहीं आए थे।
वे केवल अर्जुन के भ्रम को तोड़ने आए थे।
अर्जुन संबंधों में फँसा था।
“मेरे लोग”, “मेरा कुल”, “मेरा पाप”, “मेरी हार”, “मेरी जीत” —
यही उसका अज्ञान था।
तब कृष्ण ने कहा —
तू कर्ता नहीं।
तू केवल निमित्त है।
जो होना है, वह पहले से अस्तित्व में है।
जिसे तू मारने से डर रहा है,
उसे काल पहले ही समाप्त कर चुका है।
यहाँ कृष्ण नहीं बोल रहे थे —
यहाँ काल बोल रहा था।
विश्वरूप बोल रहा था।
अस्तित्व बोल रहा था।
कृष्ण माध्यम बन गए।
यही कारण है कि गीता केवल धर्मग्रंथ नहीं है,
वह “कर्तापन” तोड़ने का विज्ञान है।
लेकिन आज के गुरु क्या कहते हैं?
“हमारी सेवा करो।”
“हमारी भक्ति करो।”
“हमसे जुड़ो।”
“हमारे बिना ईश्वर नहीं मिलेगा।”
यहीं सत्य खो जाता है।
गीता कहती है —
समझो।
दृष्टा बनो।
कर्तापन छोड़ो।
लेकिन पाखंडी व्यवस्था कहती है —
“और अधिक कर्ता बनो।”
यही कारण है कि मनुष्य मुक्त नहीं हो पाता।
वह भक्ति में भी अहंकार जोड़ लेता है।
ज्ञान में भी अहंकार जोड़ लेता है।
त्याग में भी अहंकार जोड़ लेता है।
फिर वह कहता है —
“मैं ज्ञानी हूँ।”
“मैं भक्त हूँ।”
“मैं साधक हूँ।”
और यहीं सबसे बड़ा भ्रम जन्म लेता है।
जिस दिन यह समझ आ जाए कि —
“कुछ भी मेरा नहीं,
मैं भी कर्ता नहीं,”
उसी दिन भीतर का बोझ गिरने लगता है।
तब पता चलता है —
जिस अहंकार को पहाड़ समझ रखा था,
वह तो एक छोटी सी चुहिया निकला।
Vedanta 2.0 life
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