लेखक के बारे में
मैं अपने आपको विद्वान, गुरु या दार्शनिक नहीं मानता।
मैं केवल आठवीं कक्षा तक पढ़ा हूँ। किसी विश्वविद्यालय, कॉलेज या संस्थान से शिक्षा प्राप्त नहीं की। मेरे पास कोई डिग्री, डिप्लोमा या शैक्षणिक उपाधि नहीं है। मेरी भाषा साधारण है, व्याकरण में त्रुटियाँ हो सकती हैं और अपने विचारों को व्यवस्थित रूप से लिखना आज भी मेरे लिए सहज नहीं है।
यदि समाज की सामान्य कसौटियों पर मुझे परखा जाए—शिक्षा, भाषा, बुद्धि, पद, धन या प्रभाव—तो मैं स्वयं को एक साधारण व्यक्ति ही मानता हूँ।
मैं किसी समृद्ध या प्रतिष्ठित परिवार से नहीं आया। मेरे माता-पिता ने मुझे धन से अधिक ईमानदारी, परिश्रम और सादगी की विरासत दी। वही मेरी वास्तविक पूँजी है।
मेरी यात्रा किसी सफलता की नहीं, बल्कि प्रश्नों की यात्रा है। बचपन से मेरे भीतर एक ही जिज्ञासा थी—ईश्वर क्या है? भाग्य क्या है? सुख और दुःख क्यों हैं? मनुष्य संघर्ष क्यों करता है? क्या ब्रह्मांड किसी नियम से संचालित होता है? क्या धर्म, विज्ञान और जीवन को एक साथ समझा जा सकता है?
मैंने इन प्रश्नों के उत्तर किसी एक पुस्तक, गुरु या परंपरा से नहीं लिए। मेरा सबसे बड़ा शिक्षक स्वयं जीवन रहा है। संघर्ष ने मुझे धैर्य दिया, असफलताओं ने प्रश्न करना सिखाया और लोगों के जीवन ने मुझे मनुष्य को समझना सिखाया।
पिछले कई वर्षों से बैंक, सीएससी और सामान्य जनजीवन से जुड़े कार्यों के माध्यम से मुझे हजारों लोगों की समस्याओं को निकट से देखने का अवसर मिला। वहीं मैंने जाना कि पुस्तकों में लिखा जीवन और वास्तविक जीवन में बहुत अंतर होता है। उसी अनुभव ने मेरे भीतर विचारों का एक नया संसार खोला।
मैंने कभी प्रसिद्ध होने या अपने आपको ज्ञानी सिद्ध करने का प्रयास नहीं किया। यदि मेरे विचारों में कोई मूल्य है, तो वह केवल इसलिए कि वे जीवन के अनुभवों से निकले हैं, किसी पद, उपाधि या अधिकार से नहीं।
इसलिए यदि कोई मुझसे पूछे—"आप कौन हैं?"
तो मेरा उत्तर होगा—
मैं भीड़ में खड़ा एक साधारण मनुष्य हूँ, जिसने उत्तरों से अधिक प्रश्नों पर विश्वास किया। जिसने संघर्ष को अपना गुरु बनाया, अनुभव को अपनी पाठशाला और जीवन को अपना विश्वविद्यालय।