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  कर्म ही धर्म: सेवा का वास्तविक अर्थ एक डॉक्टर का पहला धर्म राजनीति करना नहीं, बल्कि रोगियों को स्वास्थ्य देना है। यदि वह अपने ज्ञान, कौशल ...

"समाज को सबसे अधिक दान की नहीं, अपने-अपने कर्म के प्रति ईमानदारी की आवश्यकता है।"

 कर्म ही धर्म: सेवा का वास्तविक अर्थ

एक डॉक्टर का पहला धर्म राजनीति करना नहीं, बल्कि रोगियों को स्वास्थ्य देना है। यदि वह अपने ज्ञान, कौशल और करुणा से लोगों को स्वस्थ करता है, तो वही उसकी सबसे बड़ी सेवा है। धन कमाकर उसका कुछ भाग दान कर देना अच्छा कार्य हो सकता है, लेकिन वह उसके मूल कर्तव्य का स्थान नहीं ले सकता।
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इसी प्रकार किसान का धर्म अन्न उगाना है, शिक्षक का धर्म शिक्षा देना है, सफाईकर्मी का धर्म स्वच्छता बनाए रखना है, सरकारी कर्मचारी का धर्म ईमानदारी से जनता की सेवा करना है। जब प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मक्षेत्र में निष्काम भाव से उत्कृष्ट कार्य करता है, तभी समाज वास्तव में समृद्ध और न्यायपूर्ण बनता है।
प्रकृति भी यही शिक्षा देती है। मधुमक्खी शहद बनाती है और साथ ही परागण करके पूरे पारिस्थितिक तंत्र की सहायता करती है। पक्षी, पशु और कीट अपने स्वभाव के अनुसार जीवन-चक्र में योगदान देते हैं। वे न प्रसिद्धि चाहते हैं, न पुरस्कार; वे अपना स्वभावगत कर्म करते हैं। मनुष्य भी यदि अपने कर्म को केवल आजीविका नहीं, बल्कि लोककल्याण का माध्यम बना ले, तो समाज में अनेक समस्याएँ स्वतः कम हो सकती हैं।
सेवा का अर्थ केवल धन देना नहीं है। सेवा का वास्तविक अर्थ है—अपने कार्य को ईमानदारी, कुशलता और करुणा के साथ करना। यदि डॉक्टर अच्छा उपचार करे, शिक्षक ईमानदारी से पढ़ाए, किसान शुद्ध अन्न उगाए, कर्मचारी निष्पक्ष होकर कार्य करे, तो यही सबसे बड़ा दान और सबसे बड़ी सेवा है।
जब धर्म केवल दान, चढ़ावे और संस्थाओं तक सीमित हो जाता है, तब यह भ्रम पैदा हो सकता है कि सामान्य मनुष्य स्वयं सेवा नहीं कर सकता; उसका काम केवल धन देना है और सेवा का अधिकार केवल संस्थाओं या गुरुओं के पास है। यह दृष्टिकोण विचारणीय है। सेवा किसी संस्था का एकाधिकार नहीं हो सकती। प्रत्येक मनुष्य अपने कर्म के माध्यम से समाज की सेवा कर सकता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि दान या सामाजिक संस्थाएँ अपने आप में गलत हैं। जहाँ आवश्यकता हो, वहाँ दान और संगठित सेवा दोनों का महत्वपूर्ण स्थान है। किंतु यदि दान, अपने कर्तव्य से बचने का साधन बन जाए, या यह धारणा बना दी जाए कि केवल धन देकर धर्म पूरा हो जाता है, तब धर्म का मूल उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता का संदेश निष्काम कर्म है—अपने कर्तव्य को श्रेष्ठता और समर्पण के साथ करना। सच्चा धर्म वहीं से आरंभ होता है जहाँ मनुष्य अपने कार्य को पूजा मानता है और उसके माध्यम से जीवन को अधिक सुंदर, स्वस्थ, न्यायपूर्ण और करुणामय बनाने का प्रयास करता है।
यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्म को ही सेवा मान ले, तो समाज को कम दान और अधिक ईमानदारी की आवश्यकता होगी। तब धर्म प्रदर्शन नहीं, बल्कि जीवन जीने की शैली बन जाएगा।
Independent Researcher & Philosopher
Vedanta 2.0 ©
(इंटरनेशनल रजि. –Internal Science)
वेदांत 2.0 “न मार्ग, न साधना, न नियम –
केवल समझ।
जो देख लिया, वही मोक्ष;
जो समझ गया, वही साधना, तो अभी जी लिया वही ईश्वर जीवन ही ईश्वर है।