धर्म दुःख मिटाने का साधन नहीं, सत्य को स्वीकारने की कला है
आज धर्म का बड़ा भाग इस प्रश्न पर केंद्रित हो गया है कि "भगवान से क्या माँगें ताकि दुःख दूर हो जाए?" जबकि वास्तविक प्रश्न यह होना चाहिए कि हम दुःख से भागना क्यों चाहते हैं?
मनुष्य अपने स्वभाव से नहीं जीता। वह दूसरों के ज्ञान, दूसरों के जीवन, दूसरों की सफलता, दूसरों के परिवार और दूसरों के आदर्शों की नकल करता है। यही तुलना और अनुकरण अधर्म का बीज बन जाते हैं।
जब धर्म केवल यह कहता है कि पूजा करो, दान करो, सेवा करो, संतों का सम्मान करो ताकि सुख मिले, तब वह मनुष्य में एक नई निर्भरता पैदा करता है। प्रश्न यह नहीं कि सेवा क्यों न करें; प्रश्न यह है कि सेवा किस भाव से करें? यदि सेवा पुरस्कार पाने, स्वर्ग पाने या दुःख मिटाने के लिए है, तो वह भी एक सौदा बन जाती है।
सच्ची सेवा कर्तव्य है, व्यापार नहीं।
यदि कोई संत यह कहे कि "हमारी सेवा करो, हमारा सम्मान करो", तो यह आध्यात्मिकता नहीं, अहंकार है। एक सच्चा गुरु अपने व्यक्तित्व से नहीं, अपने जीवन से शिक्षा देता है। वह लोगों को अपने ऊपर निर्भर नहीं बनाता, बल्कि स्वयं में जागने की प्रेरणा देता है।
जब कोई दुःखी होता है, तब अक्सर कहा जाता है—"तुमने भगवान को नहीं माना, इसलिए दुःखी हो।" यह कथन सत्य नहीं है। दुःख जीवन का स्वाभाविक पक्ष है। भगवान का स्मरण दुःख मिटाने का जादू नहीं, बल्कि दुःख को समझने और उसे धैर्यपूर्वक स्वीकारने की शक्ति देता है।
भगवान राम का जीवन इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। उन्होंने कभी यह प्रार्थना नहीं की कि वनवास टल जाए। उन्होंने परिस्थितियों से भागने के बजाय उन्हें स्वीकार किया और अपना कर्तव्य निभाया। राम इसलिए महान नहीं हैं कि उन्हें दुःख नहीं मिला; वे इसलिए महान हैं कि उन्होंने दुःख में भी धर्म नहीं छोड़ा।
धर्म का अर्थ दुःख से बचना नहीं, बल्कि सत्य को स्वीकारना है। राम और हममें मूल चेतना का अंतर नहीं है; अंतर केवल इतना है कि राम जागे हुए थे और हम अभी सोए हुए हैं।
धर्म का उद्देश्य हमें चमत्कार देना नहीं, बल्कि हमारी सोई हुई चेतना को जगाना है।