"मैं" का विसर्जन: भगवान, द्वैत और अस्तित्व की स्वीकृति
"मैं" का विसर्जन
भगवान, द्वैत और अस्तित्व की स्वीकृति पर दो चिंतन
खुद को जाने बिना भगवान की खोज अधूरी है
बार-बार केवल यह कहना कि "भगवान का स्मरण करो", "पूजा करो", "नाम जपो" या "ईश्वर को मानो" पर्याप्त नहीं है। यह वैसा ही है जैसे कोई स्वयं अपने भगवान को खोज न पाया हो और दूसरों से कहता रहे कि जाओ, उसे खोजो।
सबसे पहले प्रश्न होना चाहिए — मैं कौन हूँ? आत्मबोध क्या है? और भगवान कौन है?
यदि भगवान है, तो उसका नियम, उसका स्वभाव और उसकी उपस्थिति कहाँ है? क्या वह केवल मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर या किसी पुस्तक में है, या हमारे अस्तित्व की प्रत्येक धड़कन, प्रत्येक श्वास और प्रत्येक क्षण में?
प्रकृति में अमृत भी है और विष भी। यदि दोनों अस्तित्व का हिस्सा हैं, तो क्या भगवान केवल अमृत है और विष किसी दूसरे का है? यदि ऐसा है, तो फिर दो परम सत्ताएँ माननी पड़ेंगी। यदि नहीं, तो समझना होगा कि अस्तित्व हमारी पसंद-नापसंद से कहीं बड़ा है।
क्या भगवान कोई राजनीतिक दल है कि एक का समर्थन करो और दूसरे का विरोध? क्या वह कोई व्यक्ति है जिसे पुकारना पड़े क्योंकि वह कहीं खो गया है? यदि भगवान सर्वव्यापी है, तो उसे खोजने या बुलाने की आवश्यकता क्यों हो? क्या वह खो गया है, या हम स्वयं अपने विचारों में खो गए हैं?
मेरी दृष्टि में भगवान जैसा कोई अलग अस्तित्व नहीं; जो कुछ भी है, वही भगवान है। तब स्मरण का अर्थ बार-बार "भगवान-भगवान" कहना नहीं, बल्कि उस "मैं" को पहचानना है जो स्वयं को भगवान से अलग मान बैठा है।
समस्या भगवान के खो जाने की नहीं है; समस्या "मैं" के बने रहने की है।
जब तक यह अहंकार कहता रहेगा — "मैं भगवान को खोज रहा हूँ", तब तक खोजने वाला और खोजे जाने वाला दो बने रहेंगे। यही दूरी भ्रम है।
जब "मैं" शांत होता है, तब भगवान को लाना नहीं पड़ता। वह पहले से उपस्थित है। इसलिए प्रश्न यह नहीं कि भगवान कहाँ है; प्रश्न यह है कि भगवान को ढक कौन रहा है?
वह परदा हमारा अहंकार, हमारी मान्यताएँ, हमारी पहचान और हमारे विचार हैं। हम उसी चेतना में जीते हैं, उसी से श्वास लेते हैं, उसी से धड़कते हैं, और फिर भी उसी को खोजते फिरते हैं।
यदि भगवान कोई ऐसा व्यक्ति है जो किसी से प्रेम करता है और किसी से घृणा, किसी को स्वीकार करता है और किसी को अस्वीकार, तो वह सीमित है। परम सत्य सीमित नहीं हो सकता।
जिन महापुरुषों को आत्मबोध हुआ, उन्होंने किसी दूसरे भगवान को नहीं पाया। उन्होंने अपने भीतर उसी चेतना का प्रत्यक्ष अनुभव किया जो सबमें समान रूप से विद्यमान है।
मनुष्य उसी परम चेतना का बीज है। जैसे एक छोटे से बीज में विशाल वृक्ष की संभावना छिपी होती है, वैसे ही मनुष्य में परमात्मा की संभावना विद्यमान है। बीज को बाहर से लाया नहीं जाता; केवल उसके विकास में बाधा बनने वाली परिस्थितियाँ हटाई जाती हैं।
हम समुद्र से अलग नहीं हैं। हम उसी समुद्र की एक बूँद हैं। बूँद में समुद्र का पूरा विस्तार नहीं समाता, पर उसका स्वभाव, उसका स्वाद और उसका सार अवश्य समाया होता है। इसी प्रकार हमारी श्वास, धड़कन और जीवन में वही चेतना निरंतर प्रवाहित है।
इसलिए आध्यात्मिकता किसी मत, पंथ, पूजा-पद्धति या अंधविश्वास का नाम नहीं है। यह स्वयं को जानने की प्रक्रिया है। और जब स्वयं का भ्रम समाप्त हो जाता है, तब भगवान कोई बाहरी वस्तु नहीं रह जाता — वह स्वयं अस्तित्व का प्रत्यक्ष अनुभव बन जाता है।
स्मरण भगवान का नहीं, "मैं" के विसर्जन का होना चाहिए — क्योंकि जहाँ "मैं" नहीं रहता, वहीं भगवान प्रकट होता है।
द्वैत, दर्द और अद्वैत
द्वैत दृष्टि कभी भगवान नहीं खोजती — दर्द भगवान खोजता है। द्वैत के बिना जीवन असंभव है; द्वैत को पूरी तरह जीना ही अद्वैत है। दुनिया द्वैतवादी नहीं, दर्दवादी है।
दर्द का अर्थ है — एक पक्ष सहमत, दूसरा असहमत, और फिर दोनों के बीच निर्णय देने वाला एक "तीसरा" खोजा जाने लगता है। यही तीसरा भगवान बन जाता है — एक मध्यस्थ, एक न्यायाधीश, जिसे शिकायत सुनाई जाए।
द्वैतवादी बनाम दर्दवादी
द्वैतवादी अस्तित्व को जैसा है वैसा स्वीकार करता है — बिना शिकायत के। दर्दवादी को भगवान चाहिए, क्योंकि उसने अस्तित्व के एक हिस्से को अस्वीकार कर रखा है और अब उसी अस्वीकृति से उत्पन्न पीड़ा के लिए एक उद्धारकर्ता खोज रहा है।
द्वैत तो स्वयं जीवन है, और जीवन की पूर्णता ही अद्वैत का लक्ष्य है। अद्वैत द्वैत के विपरीत कोई अलग उपलब्धि नहीं — वह द्वैत की सम्पूर्ण, निःशर्त स्वीकृति का स्वाभाविक परिणाम है।
जो लोग बार-बार "भगवान-भगवान" करते हैं, वे प्रायः यह नहीं करते कि दूसरे पक्ष को भी स्वीकार करें। वे केवल अच्छे को स्वीकृत करते हैं और भगवान को पुकारते हैं; उन्हें दूसरा — विपरीत, अप्रिय, असहज — पसंद नहीं। यही आधा स्वीकार, आधा अस्वीकार — भक्ति नहीं, चयन है।
दोनों को समझना, दोनों को जीना — फिर भगवान जीवन ही होता है, कोई अलग भगवान नहीं बनता।
भगवान है — इसका अर्थ यह नहीं कि कहीं कोई पृथक सत्ता प्रतीक्षा कर रही है। इसका अर्थ है कि जब "मैं" खो जाता है, तब सिर्फ एक अस्तित्व शेष रहता है, जिसमें अमृत और विष, सहमति और असहमति, दोनों समाहित हैं — विभाजित नहीं।
॥ इति ॥