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  पूजा नहीं, संभावना का जागरण दुनिया ईश्वर-ईश्वर करती है, पर प्रश्न यह है कि ईश्वर कौन है? मेरी दृष्टि में भगवान वह है जिसने अपने भीतर छिपे ...

पूजा नहीं, संभावना का जागरण

 पूजा नहीं, संभावना का जागरण

दुनिया ईश्वर-ईश्वर करती है, पर प्रश्न यह है कि ईश्वर कौन है?
मेरी दृष्टि में भगवान वह है जिसने अपने भीतर छिपे बीज को पहचाना, उसे साधना, सत्य और जीवन के अनुभव से विकसित किया। जैसे एक बीज उचित भूमि, जल, प्रकाश और समय पाकर विशाल वृक्ष बनता है, वैसे ही मनुष्य अपनी अंतर्निहित चेतना को विकसित करके भगवत्ता को प्रकट कर सकता है।


राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, कबीर, नानक या ओशो इसलिए पूजनीय नहीं हैं कि हम केवल उनका नाम जपते रहें। वे इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि उन्होंने यह प्रमाण दिया कि मनुष्य अपने भीतर की सर्वोच्च संभावना को जागृत कर सकता है।
यदि हमें धन चाहिए तो केवल किसी धनवान की पूजा नहीं करते; हम उसके गुण, परिश्रम, अनुशासन और कार्यपद्धति को समझते हैं। यदि राष्ट्रपति बनना हो तो केवल राष्ट्रपति का नाम लेने से कोई राष्ट्रपति नहीं बन जाता। उसके लिए योग्यता, अभ्यास और कर्म चाहिए।
फिर आध्यात्मिक जीवन में केवल "राम-राम", "कृष्ण-कृष्ण", "कबीर-कबीर" दोहराने से क्या परिवर्तन होगा, यदि उनके बताए मार्ग पर चलना ही न सीखा जाए?
सच्ची श्रद्धा पूजा में नहीं, अनुकरण में है। सच्चा स्मरण नाम लेने में नहीं, जीवन में उतारने में है।
राम के सूत्र, कृष्ण की गीता, बुद्ध की जागरूकता, कबीर का सत्य, नानक की सेवा और ओशो की सजगता—इन सबका उद्देश्य हमें स्वयं अपने भीतर के बीज को विकसित करने की प्रेरणा देना है।
जब हम उनके मार्ग को समझते हैं, प्रश्न करते हैं, खोजते हैं, प्रयोग करते हैं और अपने जीवन में उसके परिणाम देखते हैं, तभी वे हमारे सच्चे गुरु बनते हैं। तब वे केवल पूजनीय नहीं रहते, बल्कि हमारे पथप्रदर्शक और परम मित्र बन जाते हैं।
धर्म का अर्थ अंधविश्वास नहीं, बल्कि सत्य की खोज है। साधना का अर्थ केवल जप नहीं, बल्कि अपने भीतर छिपी संभावना को जागृत करना है। यही ज्ञान है, यही अध्यात्म है, और यही मनुष्य होने की सार्थकता है।