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  चरित्र और स्वतंत्रता: मनुष्य की वास्तविक संपत्ति जीवन में जो भी सफलता, धन या उपलब्धि प्राप्त होती है, वह एक विनिमय (Exchange) का परिणाम है...

"धन खोकर मनुष्य फिर धनी बन सकता है, लेकिन चरित्र और स्वतंत्रता खोकर वह भीतर से भिखारी हो जाता है।"

 चरित्र और स्वतंत्रता: मनुष्य की वास्तविक संपत्ति

जीवन में जो भी सफलता, धन या उपलब्धि प्राप्त होती है, वह एक विनिमय (Exchange) का परिणाम है। बिना मूल्य चुकाए कुछ भी प्राप्त नहीं होता। कोई अपने श्रम का विनिमय करता है, कोई अपने समय का, कोई अपने ज्ञान का, कोई अपनी बुद्धि का, कोई अपने पसीने और संघर्ष का। यह स्वाभाविक है।
धन साधन है, साध्य नहीं। श्रम का उचित मूल्य लेना धर्म है। अपनी क्षमता का उपयोग करना भी धर्म है। परंतु संकट तब शुरू होता है, जब मनुष्य धन के लिए अपनी चेतना, अपने विवेक, अपनी स्वतंत्रता और अपने चरित्र का विनिमय करने लगता है।
स्वतंत्रता और चरित्र मनुष्य की सबसे बड़ी संपत्ति हैं। इन्हें खोकर प्राप्त की गई सफलता वास्तव में सफलता नहीं, बल्कि पराधीनता है।
जिस प्रकार स्त्री का चरित्र उसके सम्मान का आधार माना गया है, उसी प्रकार मनुष्य की स्वतंत्रता उसके आत्मसम्मान का आधार है। यदि कोई पुरुष सत्य बोलने का साहस खो देता है, तो वह अपनी स्वतंत्रता बेच देता है। यदि कोई स्त्री अपने चरित्र से समझौता करती है, तो वह अपना नैतिक आधार खो देती है। यह उदाहरण किसी एक लिंग को ऊँचा या नीचा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि यह बताने के लिए है कि जीवन में कुछ मूल्य ऐसे होते हैं जिनका कोई बाज़ार मूल्य नहीं हो सकता।
जिसके पास चरित्र और स्वतंत्रता दोनों हैं, वह वास्तव में धनी है, चाहे उसके पास धन कम हो। और जिसने इन्हें खो दिया, वह बाहरी वैभव के बाद भी भीतर से निर्धन है।
धर्म का अर्थ केवल पूजा, वेशभूषा, मंदिर, आश्रम या प्रवचन नहीं है। यदि किसी साधु, संत, धार्मिक व्यक्ति या सामान्य मनुष्य के जीवन में स्वतंत्रता और चरित्र नहीं हैं, तो उसका धर्म केवल अभिनय है।
आज संसार में अभिनय की सफलता अधिक दिखाई देती है, परंतु अस्तित्व अंततः उसी का साथ देता है जो सत्य, चरित्र और स्वतंत्रता को धन से ऊपर रखता है।
चरित्र और स्वतंत्रता अमूल्य हैं। शेष सब कुछ पुनः प्राप्त किया जा सकता है, पर जिसने इन्हें खो दिया, वह भीतर से भिखारी हो जाता है, चाहे संसार उसे कितना ही सफल क्यों न कहे।