धर्म प्रदर्शन नहीं, चेतना की गुणवत्ता है
मेरे लिए धर्म किसी एक मंत्र, एक नाम या एक विधि तक सीमित नहीं है। यदि मेरे भीतर "राधे-राधे" से प्रेम, शांति और जागरूकता जागती है, तो वही मेरा मार्ग हो सकता है। किसी दूसरे के लिए ध्यान, सेवा, मौन, कर्मयोग या कोई अन्य साधना अधिक उपयुक्त हो सकती है।
दूसरों के अनुभव प्रेरणा दे सकते हैं, दिशा दिखा सकते हैं, लेकिन वे मेरे अनुभव का स्थान नहीं ले सकते। चेतना कोई भौतिक मार्ग नहीं है कि जिस पर हर व्यक्ति एक ही दिशा में चलकर एक ही प्रकार का परिणाम प्राप्त कर ले। प्रत्येक मनुष्य का स्वभाव, संस्कार, जीवन-अनुभव और आंतरिक अवस्था अलग है।
हो सकता है किसी व्यक्ति के भीतर ऊर्जा पहले से जागृत हो और उसे केवल सही दिशा की आवश्यकता हो। किसी दूसरे को पहले अपने भीतर सजगता का बीज विकसित करना पड़े। बालक, युवा, वृद्ध—सभी की चेतना की परिपक्वता और जीवन की परिस्थितियाँ भिन्न होती हैं। इसलिए कोई एक साधना सभी पर समान रूप से लागू नहीं की जा सकती।
राम और कृष्ण दोनों भारतीय चेतना के महान प्रतीक हैं, पर उनके जीवन, स्वभाव और कार्य-परिस्थितियाँ भिन्न थीं। इसलिए प्रश्न यह नहीं कि राम का मार्ग श्रेष्ठ है या कृष्ण का; प्रश्न यह है कि मेरे वर्तमान स्वभाव, मेरी स्थिति और मेरी चेतना के विकास के लिए कौन-सा मार्ग अधिक उपयुक्त है।
धर्म अनुकरण नहीं, आत्म-खोज है। जब मनुष्य अपने स्वभाव को समझकर जागरूकता के साथ जीना शुरू करता है, तभी उसकी साधना जीवित होती है। तब धर्म प्रदर्शन नहीं रहता, बल्कि उसके जीवन की गुणवत्ता, करुणा, सरलता और चेतना में स्वतः दिखाई देने लगता है।