कर्म में कोई बड़ा-छोटा नहीं
हाथी का कर्म हाथी का है, चींटी का कर्म चींटी का है। हाथी की सेवा बड़ी नहीं और चींटी की सेवा छोटी नहीं। दोनों अपने-अपने स्थान पर अस्तित्व की सृष्टि में समान भागीदार हैं।
इसी प्रकार कोई मनुष्य ब्राह्मण हो, गुरु हो, चिकित्सक हो, किसान हो या सफाईकर्मी—उसका कर्म न बड़ा है, न छोटा। अस्तित्व ने जिसे जहाँ खड़ा किया है, वहीं उसका धर्म है। अपने स्वभाव और कर्तव्य को ईमानदारी से निभाना ही ईश्वर की सेवा है।
भेदभाव वहीं से शुरू होता है जहाँ कोई कहता है—"मैं बड़ा हूँ, तुम छोटे हो; मैं पुण्यात्मा हूँ, तुम पापी हो; मेरी पूजा करो, मेरे चरण छुओ।" यह भेद दृष्टि धर्म नहीं, अहंकार की दृष्टि है।
अस्तित्व को यदि वृत्त (Circle) की तरह देखें, तो उसमें न कोई स्थायी रूप से आगे है और न पीछे। आज जो आगे दिखाई देता है, अगले ही क्षण पीछे हो सकता है। इसलिए श्रेष्ठता का अहंकार केवल मन का भ्रम है।
सच्चा ज्ञान विभाजन नहीं करता, बल्कि एकता का अनुभव कराता है। जहाँ ऊँच-नीच, जाति, पद, अहंकार और विशेषाधिकार धार्मिकता का आग्रह है, वहाँ धर्म नहीं, अधर्म जन्म लेता है।
श्रीकृष्ण का जीवन इसी सत्य का उदाहरण है। वे राजा होकर भी अपने मित्र सुदामा का सम्मान करते हैं। उन्होंने मित्रता में ऊँच-नीच का भेद नहीं रखा। उनका संदेश यह नहीं था कि लोग केवल उनके चरण छुएँ, बल्कि यह था कि प्रेम, सम्मान और आत्मीयता में सभी समान हैं।
धर्म का अर्थ किसी को अपने सामने झुकाना नहीं है। धर्म का अर्थ है दूसरे को सम्मान देना, उसे समान दृष्टि से देखना और उसके भीतर भी उसी चेतना का दर्शन करना जो अपने भीतर है।
जहाँ समानता है, वहीं धर्म है। जहाँ अहंकार और भेद है, वहीं अधर्म है। कर्म ही मनुष्य की पहचान है, पद या प्रतिष्ठा नाम मुखौटा नहीं।
Independent Researcher & Philosopher
Vedanta 2.0 ©
(इंटरनेशनल रजि. –Internal Science)
वेदांत 2.0 “न मार्ग, न साधना, न नियम –
केवल समझ।
जो देख लिया, वही मोक्ष;
जो समझ गया, वही साधना, तो अभी जी लिया वही ईश्वर जीवन ही ईश्वर है।