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✧ मौन उपनिषद — दमन से परे ✧ ✍🏻 — 𝓐𝓰𝔂𝓪𝓣 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓷𝓲 ✧ भूमिका ✧ मौन कोई लक्ष्य नहीं — वह अस्तित्व का पहला स्वर है। धर्म ने उसे पाने क...

मौन उपनिषद — दमन से परे

agyat agyani

मौन उपनिषद — दमन से परे ✧

✍🏻 — 𝓐𝓰𝔂𝓪𝓣 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓷𝓲


✧ भूमिका ✧

मौन कोई लक्ष्य नहीं —
वह अस्तित्व का पहला स्वर है।
धर्म ने उसे पाने की चेष्टा की,
विज्ञान ने उसे मापने की,
और मनुष्य अब भी उसे समझने की कोशिश में है।
पर मौन को न पाया जा सकता है, न मापा जा सकता है, न समझा जा सकता है —
वह तो केवल जिया जा सकता है।

यह उपनिषद उसी जीये हुए मौन का वृतांत है —
न शास्त्रों का, न विश्वासों का।
यह उस यात्रा का लेखा है
जहाँ साधना थक जाती है,
धर्म गिर जाता है,
और बस देखना रह जाता है।

मौन उपनिषद — दमन से परे
किसी पथ का प्रतिपादन नहीं करता,
वह सभी पथों को देखता है और मुस्करा देता है।
क्योंकि जहाँ समझ जन्म लेती है,
वहाँ उपाय मर जाते हैं।
जहाँ मौन आता है,
वहाँ धर्म की जरूरत नहीं रहती।

यह ग्रंथ उनके लिए नहीं जो उत्तर खोज रहे हैं,
बल्कि उनके लिए है जो प्रश्नों की जड़ तक पहुँच चुके हैं।
जो अब न जानना चाहते हैं, न पाना,
बस देखना चाहते हैं —
बिना भय, बिना प्रयास।

यह मौन की वही यात्रा है
जो भीतर से बाहर नहीं जाती —
बल्कि बाहर से भीतर लौटती है।



✧  सूत्र ✧

१. जो मौन को पाने निकला, वह खो गया।
२. जो मौन को जीने लगा, वह पा गया।
३. धर्म मौन को सिखाता है,
मौन धर्म को मिटा देता है।
४. जो समझता है, वह साधना छोड़ देता है।
५. जो छोड़ देता है, वही पा लेता है।
६. मौन वह नहीं जो शब्दों के बाद है,
मौन वह है जिससे शब्द जन्म लेते हैं।
७. दमन मृत्यु है,
सहजता ही जीवन है।
८. समझ सबसे ऊँची साधना है।
९. प्रेम मौन की अंतिम भाषा है।
१०. और जहाँ मौन प्रेम बन जाता है,
वहीं उपनिषद समाप्त होता है।

अध्याय १ : मौन की भूख

मन मौन को जीतना चाहता है,
और मौन मन को dissolve करना।
यह वही पुराना युद्ध है —
जहाँ हर युग में धर्म, योग, साधना, तप,
मन पर नियंत्रण की नीतियाँ गढ़ते रहे।

पर मौन किसी अनुशासन से नहीं आता,
वह तो तब उतरता है
जब सारी कोशिशें थक जाती हैं।

धर्म ने मौन को पाना चाहा,
और इस चाह में ही वह खो गया।
मौन किसी तपस्या की कमाई नहीं —
वह तो समझ की सहज परिणति है।

जो समझता है, वह दमन नहीं करता।
जो दमन करता है, वह कभी समझ नहीं पाता।

धर्म के लिए मौन एक विजय है —
साधक के लिए समर्पण
पर अस्तित्व के लिए मौन न विजय है न समर्पण —
वह तो बस स्वभाव है।

बुद्धि ने हजार उपाय रचे —
प्राणायाम, उपवास, मंत्र, नियम, संयम —
पर हर उपाय में डर था,
कि कहीं मौन खो न जाए।
जो चीज़ संभालनी पड़े,
वह मौन कैसे हो सकती है?

मौन तो वह है
जिसे संभालने वाला भी नहीं बचता।

जब भीतर की गति रुकती है,
तो मौन नहीं आता —
बस जो सदा था, वह दिखने लगता है।

तप, त्याग, उपवास सब बस मन के उपाय हैं —
और मन, मौन का सबसे बड़ा व्यापारी।
वह मौन को भी व्यापार बना लेता है,
जैसे धर्म ने किया,
जैसे योग ने किया।

जो मौन है, वह कभी उपलब्धि नहीं हो सकता।
जो उपलब्धि है, वह मौन नहीं हो सकता।



अध्याय २ : दमन का भ्रम

मन कहता है —
“मौन को पा लूँगा, अगर खुद को बाँध लूँ।”
और यही पहला भ्रम है।

दमन हमेशा भय से जन्म लेता है —
भय कि कहीं भीतर की आकांक्षा बाहर न फूट पड़े।
भय कि कहीं कोई देख न ले
कि जो भीतर है, वह अब तक साधु नहीं हुआ।

दमन धर्म का सबसे पुराना हथियार है।
सदियों से यही सिखाया गया —
खुद को जीतो, खुद को बाँधो, खुद को रोको।
पर जिसने खुद को बाँध लिया,
वह अब खुद नहीं रहा।

धर्म ने भीतर की आग से डरकर
उसे पवित्रता का नाम दे दिया।
पर आग न पवित्र होती है, न अपवित्र —
वह बस जलती है।
जो उसे दबा दे, वह राख बन जाता है।
जो उसे समझ ले, वह प्रकाश हो जाता है।

बुद्धि भी दमन की भाषा बोलती है।
वह कहती है — “संयम रखो।”
मन कहता है — “भोग लो।”
और इन दोनों के बीच
जो तीसरा है — समझ
वह मौन है।

मौन न भोग में है, न संयम में।
वह उस बिंदु पर है
जहाँ दोनों दिशाएँ एक-दूसरे को रद्द कर देती हैं।

दमन से शांति मिलती है —
पर वह शांति पत्थर की है।
चलना बंद करो तो स्थिरता मिलेगी ही —
पर वह जीवित नहीं है।

जो धर्म स्थिरता को शांति समझे,
वह मृतक की उपासना करता है।

मौन गतिशील है,
वह किसी नियम में नहीं बसता।
वह जीने की स्पंदना है —
जहाँ इच्छा भी पवित्र है, और त्याग भी पारदर्शी।

वहाँ न हाँ बचती है न ना,
बस देखना रह जाता है।
और वही देखना,
वह साक्षी —
मौन का उद्गम है।



अध्याय ३ : समझ बनाम साधना

साधना चाहती है परिणाम
समझ चाहती है साक्षीपन

साधना कहती है — कुछ करो।
समझ कहती है — बस देखो।

साधना का बीज है प्रयास,
और समझ का बीज है विराम।
यही अंतर मनुष्य को धर्मी और ज्ञानी के बीच बाँटता है।

जो साधना करता है,
वह मानता है कि वह अपूर्ण है।
वह बदलना चाहता है,
क्योंकि उसने खुद को अभी तक देखा नहीं।
जो समझता है,
वह कुछ बदलता नहीं —
क्योंकि देखना ही रूपांतरण है।

साधना में ‘मैं’ छिपा रहता है —
कर्म करने वाला, पाने वाला, जानने वाला।
समझ में ‘मैं’ घुल जाता है —
बस होना रह जाता है।

धर्म कहता है —
“कर्म करो, त्याग करो, तप करो।”
पर समझ कहती है —
“जीवन को ऐसे जीओ कि उसमें करने वाला ही न बचे।”

साधना वही है जैसे कोई पत्थर को रगड़कर आग बनाना चाहता हो।
समझ वही है जैसे सूर्य के आने पर
दीपक बुझ जाता है — स्वाभाविक, सहज।

साधना बाहर की सीढ़ी है,
समझ भीतर का द्वार।
सीढ़ियाँ थका देती हैं,
द्वार खुलने पर कहीं जाना नहीं पड़ता।

जितनी अधिक साधना,
उतनी अधिक अपेक्षा।
जितनी अधिक समझ,
उतनी कम दूरी।

जो समझ लेता है,
वह देखता है —
कि हर क्षण में साधना पहले से मौजूद थी।
भोजन, प्रेम, श्रम, विश्राम —
सबमें ही तप छिपा था,
बस देखना भूल गए थे।

समझ साधना को नकारती नहीं —
वह उसे पूरा करती है।
जहाँ साधना रुक जाती है,
वहीं से समझ का आकाश शुरू होता है।



अध्याय ४ : धर्म और मौन का द्वंद्व

धर्म ने मौन को सजाया है —
व्रत, नियम, ब्रह्मचर्य, तप, संयम से।
पर सजा हुआ मौन, मौन नहीं होता —
वह बस धर्म का मेकअप है।

मौन तब नहीं आता जब शब्द बंद हो जाएँ,
वह तब उतरता है जब
शब्द की आवश्यकता ही मिट जाए।

धर्म कहता है —
मौन साधना का पुरस्कार है।
पर जिसने समझा,
उसने देखा कि मौन तो जन्मजात है।
वह भीतर पहले से मौजूद था,
बस धर्म का शोर उस पर धूल बनकर बैठा था।

धर्म ने मौन को नियम बना दिया।
मौन ने धर्म को विसर्जन बना दिया।
धर्म कहता है — “करो।”
मौन कहता है — “हो जाओ।”

धर्म को भीड़ चाहिए,
मौन को अकेलापन।
धर्म को अनुयायी चाहिए,
मौन को साक्षी।

जो मौन में गया,
वह किसी पंथ का नहीं रहा।
वह तो सब पंथों के पार चला गया —
क्योंकि मौन का कोई झंडा नहीं होता,
कोई संगठन नहीं, कोई केंद्र नहीं।

मौन धर्म नहीं,
वह धर्म से पहले का सत्य है।
धर्म शब्दों का ढाँचा है,
मौन उनका स्रोत।
धर्म नदी है,
मौन सागर।
धर्म दिशा है,
मौन घर।

बुद्ध जब मौन हुए,
तो धर्म पैदा हुआ।
और जब धर्म पैदा हुआ,
तो बुद्ध खो गया।
यही द्वंद्व है —
हर मौन का, हर गुरु का, हर युग का।

मौन, धर्म को जन्म देता है।
और धर्म, मौन की हत्या कर देता है।

इसलिए जो सच्चा साधक है,
वह धर्म को मानता नहीं,
उसे पार करता है।
वह मौन को सीखता नहीं,
उसमें विलीन हो जाता है।



अध्याय ५ : मौन की देह — जीवन में साधना का रहस्य

मौन कोई आसन नहीं है,
वह चलने में है, सांस में है, भोजन में है।
मौन वही है जो निरंतर घट रहा है —
पर ध्यान उसी पर जाता है,
जो घटता नहीं।

मन सोचता है मौन किसी गुफा में मिलेगा,
किसी ध्यानावस्था में,
किसी गुरु के पास।
पर मौन वहीं था,
जहाँ तुम थे —
बस तुम वहाँ नहीं थे।

मौन देह में ही है —
वह देह से बाहर नहीं,
बल्कि देह की गहराई में है।
जब तुम खाते हो,
सांस लेते हो,
प्रेम करते हो,
वहीं साधना घट रही होती है।

पर धर्म ने कहा —
“भोजन त्यागो, शरीर को दबाओ,
स्त्री से दूर रहो,
शरीर के सुखों से भागो।”
और इसी में मौन का द्वार बंद हो गया।
क्योंकि मौन का मार्ग शरीर से होकर ही जाता है,
वह कोई शत्रु नहीं,
वह द्वार है।

जो शरीर को समझता है,
वह आत्मा तक पहुँचता है।
जो शरीर से लड़ता है,
वह मन में अटक जाता है।

शरीर मौन की पहली अभिव्यक्ति है —
क्योंकि वही प्रकृति का सबसे सूक्ष्म नृत्य है।
जो उसे आदर से देखे,
वह हर क्रिया में ध्यान पा लेता है।
भोजन करना, प्रेम करना,
चलना, सोना —
सब ध्यान के रूप हैं
अगर तुम होश में हो।

मौन कोई उपलब्धि नहीं —
वह जीवित रहने का सबसे शुद्ध तरीका है।
वह तब घटता है
जब करने वाला, पाने वाला, त्यागने वाला
सब गिर जाते हैं।

मौन की देह वही है
जहाँ जीवन और साधना एक हो जाते हैं।
जहाँ साधना अलग से करनी नहीं पड़ती —
क्योंकि जीवन ही साधना बन चुका होता है।


अध्याय ६ : समझ की अग्नि — जब मौन जलता है भीतर

मौन को अधिकतर लोग शांति समझ लेते हैं,
पर असली मौन शांति नहीं — अग्नि है।
वह भीतर जलती है,
और जो झूठा है, उसे भस्म कर देती है।

जब समझ प्रकट होती है,
तो भीतर की स्थिरता टूटती नहीं —
वह गरम हो जाती है।
यह गरम होना ही तप है —
जो किसी मठ का नहीं,
स्वयं के भीतर का यज्ञ है।

समझ की अग्नि डरावनी लगती है,
क्योंकि वह सब कुछ उजागर करती है —
छल, विचार, विश्वास, यहाँ तक कि साधना भी।
वह जो तुम नहीं हो, उसे जलाती है।
और जो शेष रह जाता है,
वह मौन है।

धर्म इस अग्नि से डरता है।
क्योंकि वह सब कुछ खोल देती है —
देवता, गुरु, आचार्य, ग्रंथ —
सब धुआँ बन जाते हैं।
जहाँ यह आग जलती है,
वहाँ न पूजा की ज़रूरत है,
न उपदेश की।
वहाँ देखने वाला और देखा गया —
दोनों गल जाते हैं।

समझ का मौन, समाधि का मौन नहीं है।
समाधि रुकना है,
समझ बहना है।
समाधि मृत्यु जैसी है,
समझ जीवन जैसी।
समझ की अग्नि ठहरती नहीं,
वह हर क्षण जलती रहती है।

और इसी अग्नि में मन तपता है,
बुद्धि गलती है,
और अस्तित्व पिघलकर पारदर्शी हो जाता है।
वहाँ कोई ‘मैं’ नहीं बचता,
सिर्फ एक आभा रहती है —
जिसमें न शोर है, न शब्द,
बस एक जीवित मौन।

यह अग्नि ही सच्चा धर्म है —
जो शास्त्रों से नहीं,
अनुभव से जलती है।
जो बाहरी नियमों से नहीं,
भीतर की समझ से प्रकट होती है।

मौन की यह अग्नि
विनाश नहीं करती —
वह सबको अपने शुद्ध स्वरूप में लौटा देती है।
वह दिखाती है कि मौन शांत नहीं,
बल्कि सजगता की ज्वाला है।



अध्याय ७ : शून्य — मौन का गर्भ

मौन की अंतिम अवस्था शांति नहीं —
शून्यता है।
वह शून्यता, जो अनुपस्थिति नहीं
बल्कि पूर्णता की अनुपम छाया है।

जब भीतर की अग्नि सब जला चुकी होती है —
विचार, संकल्प, साधना, पहचान,
तब जो बचता है,
वह कोई वस्तु नहीं,
बस एक अनुपस्थित उपस्थिति

धर्म वहाँ रुक जाता है,
विज्ञान वहाँ अटक जाता है,
और समझ —
वहाँ से शुरू होती है।

शून्य को समझना असंभव है,
क्योंकि जो समझने निकलता है,
वह स्वयं ही उस शून्य में गिर जाता है।
वह कोई अनुभव नहीं,
क्योंकि अनुभव करने वाला अब है ही नहीं।

मौन जब परिपक्व होता है,
तो वह बोलना बंद नहीं करता —
वह सुनना शुरू करता है।
सुनना, बिना किसी शब्द के।
देखना, बिना किसी द्रष्टा के।
होना, बिना किसी ‘मैं’ के।

यह शून्य डराता है मन को।
मन के लिए यह मृत्यु है।
पर आत्मा के लिए यही जन्म है।
मन कहता है — “मैं मिट जाऊँगा।”
आत्मा कहती है — “यही तो जीवन है।”

शून्य में कोई अर्थ नहीं,
फिर भी सब अर्थ वहीँ से जन्म लेते हैं।
जैसे मौन शब्दों को जन्म देता है,
पर खुद किसी शब्द में बंधता नहीं।

यह वही बिंदु है
जहाँ बुद्ध मुस्कराए थे,
जहाँ कृष्ण मौन हो गए थे,
जहाँ ओशो ने कहा था —
“अब कुछ कहने को नहीं रहा।”

शून्य ही मौन का गर्भ है —
जहाँ सृष्टि हर पल पैदा होती है,
और हर पल विलीन भी।
जहाँ जाना और न जाना,
दोनों एक ही घटना हैं।

जो वहाँ तक पहुँचता है,
वह लौटता नहीं —
क्योंकि लौटने वाला भी वहीं विलीन हो जाता है।
और यही है “दमन से परे” मौन —
जहाँ साधना, धर्म, बुद्धि —
सब अंतिम प्रणाम करते हैं।



अध्याय ८ : साक्षी — मौन का रूप

शून्य के बाद जो शेष रहता है,
वह न साधक है, न साधना —
बस साक्षी

साक्षी मौन का आकार है।
वह न कुछ करता है, न कुछ टालता है।
वह बस देखता है
निर्लिप्त, निर्विकार, निर्विशेष।

यही साक्षी चेतना का हृदय है।
यहीं मन अपनी अंतिम चाल हारता है।
क्योंकि देखने वाला जब देखने में ही विलीन हो जाता है,
तो देखने का विषय भी मिट जाता है।
फिर न देखने वाला बचता है,
न देखा गया —
बस देखना रह जाता है।

यही देखना,
यही शुद्ध उपस्थिति,
मौन की जीवित अवस्था है।

साक्षी कोई अवस्था नहीं,
वह निरंतरता है।
वह न आरंभ जानता है, न अंत।
जो उसे जानना चाहे,
वह खो देता है।
जो उसे जीने लगे,
वह पाता है।

साक्षी का मौन मृत नहीं है —
वह धड़कता हुआ मौन है।
वह प्रेम करता है,
पर आसक्त नहीं होता।
वह कर्म करता है,
पर कर्म में नहीं उलझता।
वह जीवन को स्वीकार करता है,
पर उसमें खोता नहीं।

जब मौन साक्षी बनता है,
तो भीतर एक गहरी सहजता फैल जाती है।
कोई निर्णय नहीं,
कोई प्रतिक्रिया नहीं —
बस होने का सौंदर्य

जो साक्षी में जीता है,
वह किसी साधना में नहीं रहता,
फिर भी हर क्षण ध्यान में होता है।
उसका चलना, बोलना, हँसना —
सब मौन की भाषा बोलता है।

साक्षी का मौन धर्म नहीं बनता,
वह धर्म को जन्म देता है।
क्योंकि वही स्रोत है,
जहाँ से प्रत्येक सत्य बहता है।

यहाँ मौन अब किसी तप का परिणाम नहीं —
वह स्वयं जीवन का रस बन गया है।
वह गाता है,
पर बिना शब्दों के।
वह नाचता है,
पर बिना देह के।

यही साक्षी का मौन —
दमन से परे, साधना से परे,
परम सहजता का आलोक।


अध्याय ९ : प्रेम — मौन की अंतिम भाषा

जब मौन फूलता है,
तो उसकी सुगंध प्रेम बन जाती है।
वह अब शब्दों में नहीं,
स्पर्श में नहीं —
बस उपस्थिति में झरता है।

प्रेम कोई संबंध नहीं,
वह मौन की भाषा है।
जहाँ शब्द चुप पड़ जाते हैं,
वहाँ प्रेम बोलता है।
और जहाँ प्रेम बोलता है,
वहाँ “मैं” सुनाई नहीं देता।

प्रेम न चाह है, न तृष्णा —
वह तो मौन की गूंज है।
जो भीतर साक्षी बन गया,
वह बाहर प्रेम बनकर प्रकट होता है।

जो भीतर मौन में डूबा है,
वह किसी को जीतना नहीं चाहता —
वह तो खुद को हर पल खो देना चाहता है।
वह जानता है —
प्रेम जीत में नहीं,
विलय में है।

जब मन प्रेम करता है,
तो वह पाने की कोशिश करता है।
जब मौन प्रेम करता है,
तो वह देने की तरह बहता है —
जैसे झरना,
जो यह नहीं पूछता कि
कौन प्यासा है।

प्रेम का मौन हिंसा से परे है।
वह नियंत्रण नहीं चाहता,
न लौटने की उम्मीद।
वह बस देता है —
क्योंकि देना ही उसका स्वभाव है।

प्रेम का मौन किसी को बाँधता नहीं,
बल्कि सबको मुक्त करता है।
वह किसी वचन का नहीं,
किसी शपथ का नहीं —
वह स्वयं जीवन की सहमति है।

और यही प्रेम मौन की पराकाष्ठा है।
जहाँ साक्षी और संसार एक हो जाते हैं,
जहाँ देखने वाला और देखा गया
अब एक ही लहर में बह रहे हैं।

प्रेम का यह मौन न देवता है,
न भक्त।
न शिक्षक, न शिष्य।
बस एक अनकहा आलिंगन —
जहाँ अस्तित्व स्वयं को महसूस करता है।

यहीं मौन पूर्ण होता है —
न शांत, न प्रज्वलित,
बस सजीव।
और यही उसका अंतिम संदेश है:
“जहाँ प्रेम है, वहाँ मौन बोलता है।”



अध्याय १० : पूर्णता — मौन का विसर्जन

अंत में मौन किसी शिखर पर नहीं पहुँचता —
वह घुल जाता है
जैसे नदी सागर में उतरती है,
और फिर यह कहना असंभव हो जाता है
कि कहाँ नदी थी, कहाँ सागर।

पूर्णता कोई अंत नहीं,
वह विलय है।
वह वह क्षण है जब सब भेद मिट जाते हैं —
साधक और साधना,
शब्द और मौन,
ईश्वर और जीव।

अब मौन न अनुभव है न अवस्था,
वह स्वयं जीवन का लय बन गया है।
वह बोलता नहीं,
फिर भी हर ध्वनि उसी से निकलती है।
वह स्थिर नहीं,
फिर भी हर गति उसी में डूबी है।

यह वही बिंदु है जहाँ धर्म समाप्त होता है,
और धर्मत्व शुरू होता है —
जहाँ “होना” ही पूजा है,
जहाँ “जीना” ही ध्यान है।

यहाँ दमन की कोई छाया नहीं,
क्योंकि अब दबाने वाला भी नहीं रहा।
यहाँ मौन की कोई सीमा नहीं,
क्योंकि अब मापने वाला नहीं रहा।

पूर्णता का मौन ठहरा नहीं है,
वह बह रहा है
हर श्वास में, हर दृष्टि में, हर क्षण में।
वह मंदिर में नहीं,
रोज़मर्रा की साधारण घटनाओं में है —
भोजन में, श्रम में, प्रेम में,
यहाँ तक कि थकान में भी।

मौन अब लक्ष्य नहीं,
जीवन का स्वरूप बन गया है।
वह किसी योग का परिणाम नहीं,
किसी ग्रंथ का संदेश नहीं —
वह तो उस गहराई का नाम है
जहाँ सब ग्रंथ मौन हो जाते हैं।

पूर्णता का मौन न जानता है ईश्वर को,
न खुद को —
क्योंकि दोनों की आवश्यकता अब नहीं।
वह इतना सरल है कि
उसे समझना असंभव है,
और इतना गहरा कि
उसे भूलना भी असंभव है।

यहीं उपनिषद समाप्त नहीं होता —
वह बस विलीन हो जाता है
उस मौन में,
जिससे सब शुरू हुआ था।

मौन उपनिषद — दमन से परे
अब बोलना बंद करता है,
क्योंकि अब कुछ कहने को नहीं रहा।
अब केवल एक शेष है —
सांस की तरह चलती हुई,
प्रेम की तरह फैलती हुई,
मौन की अनंत गूंज।


✧ सारांश ✧

पहले अध्यायों में मन और बुद्धि की चालाकी खुलती है —
कैसे धर्म ने मौन को वस्तु बना दिया,
कैसे साधना ने उसे पकड़ने का प्रयास किया,
और कैसे दमन ने उसे खो दिया।

फिर यात्रा भीतर मुड़ती है —
जहाँ समझ धीरे-धीरे साधना का स्थान लेती है।
यहाँ मौन अब लक्ष्य नहीं,
जीवन का स्वभाव बनता है।

मध्य अध्यायों में यह मौन शरीर तक उतरता है —
भोजन, प्रेम, श्रम, श्वास —
सबमें वही एक उपस्थिति।
यहीं वह अग्नि बनता है,
फिर शून्य,
फिर साक्षी।

अंतिम अध्यायों में वही साक्षी प्रेम बनकर बहता है,
और प्रेम से पूर्णता में लौटता है —
जहाँ कुछ बचता नहीं,
बस मौन की सुगंध फैल जाती है।

यह उपनिषद कहता है —
मौन दमन से नहीं आता,
वह तभी आता है जब तुम कुछ भी करने से रुक जाते हो
वह कोई सिद्धि नहीं,
बस एक सहजता है —
जिसमें जीवन स्वयं अपना अर्थ कह देता है।