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✧ THIS IS A GAME ✧ — The Fundamental Insight of Vedanta 2.0 ✧ खेल का बोध ✧ (जैसा घटा, वैसा कहा) मनुष्य कुछ नहीं करता — सब हो रहा...

THIS IS A GAME ✧— The Fundamental Insight of Vedanta 2.0

✧ THIS IS A GAME ✧
— The Fundamental Insight of Vedanta 2.0

✧ खेल का बोध ✧

(जैसा घटा, वैसा कहा)

मनुष्य कुछ नहीं करता —
सब हो रहा है।
“मैं कर रहा हूँ”
बस एक पाला हुआ भ्रम है।

जिसे हम ईश्वर कहते हैं,
वह भी कोई बाहर बैठा मालिक नहीं —
धरती, ब्रह्मांड, समय, जन्म-मृत्यु
सब वही खुद है
खुद के साथ खेलता हुआ।

शिव, विष्णु, ब्रह्मा —
वे भी बँधे हुए लगते हैं,
क्योंकि बंधन भी उसी का खेल है।
कुछ भी उससे बाहर नहीं।

कभी कोई मनुष्य
उसका प्रमाण बन जाता है —
कि “हाँ, सब वही है”
लेकिन वह प्रमाण भी टिकता नहीं,
वह भी उसी में विलीन हो जाता है।

मन और बुद्धि से देखो
तो “जीवन” जैसा कुछ नहीं है।
बस एक बोध है —
कि यह सब लीला है।

फिर जब यह बोध
पूरी तरह फैल जाता है —
तो बोध भी गल कर
उसी में मिल जाता है।

“मालिकी” का पहला स्वाद
आनंद देता है —
पर कोई भी मालिकी स्थायी नहीं।
स्थायित्व पत्थर होना है,
और पत्थर में कोई रस नहीं।

जब बोध होता है
और मन फिर भी बँटता है —
तब नर्क बनता है।
लेकिन जब तक अज्ञान है,
तब तक “मैं हूँ” का झूठ
ही जीवन लगता है।

जैसे समुद्र से
एक बूँद उठती है —
वाष्प बनती है,
फिर लौट आती है समुद्र में।

कोई सरोवर टिकता नहीं।
हर ठहराव सूख जाता है।
नई बूँद आती है,
खेल चलता रहता है।

आनंद लौटने में है —
ठहरने में नहीं।

जो अपना समुद्र बनना चाहता है
वह भ्रम में है —
समुद्र बना नहीं जाता,
उसी में हो जाना होता है।

जो यहाँ साथी बने रहना चाहता है,
वह पत्थर बन जाता है।
कोई जीवन-आनंद वहाँ नहीं।

परिवर्तन ही रस है।
बार-बार आना —
एक कला है।
और वही अवतार है।

पुनर्जन्म भटकाव है —
अवतार भी पुनर्जन्म है,
लेकिन अंतर यह है कि
अवतार जानता है —

> “मैं नहीं हूँ।
यह एक खेल है।
एक लीला है।”

✦ 𝕍𝕖𝕕𝕒𝕟𝕥𝕒 𝟚.𝟘 𝕋𝕙𝕖 𝕌𝕟𝕚𝕧𝕖𝕣𝕤𝕒𝕝 𝕍𝕚𝕤𝕚𝕠𝕟 𝕠𝕗 ℂ𝕠𝕟𝕤𝕔𝕚𝕠𝕦𝕤𝕟𝕖𝕤𝕤 · वेदान्त २.० — चेतना का वैश्विक दृष्टिकोण — 🙏🌸 𝔸𝕘𝕪𝕒𝕥 𝔸𝕘𝕪𝕒𝕟𝕚

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