अध्याय : जीवन — न अच्छा, न बुरा, न साधन
जब यह समझ आ जाती है कि
जीवन को जीना ही जीवन है,
तब अच्छाई–बुराई का प्रश्न
अपने-आप गिर जाता है।
जीवन जीना
कोई नैतिक परियोजना नहीं है।
न वहाँ अच्छाई की ज़रूरत है,
न बुराई से लड़ने की।
जहाँ जीवन है,
वहाँ—
-
साधन नहीं
-
सुविधा नहीं
-
सुख–दुःख नहीं
-
अच्छा–बुरा नहीं
ये सब
जिंदा रहने से जुड़े हैं,
जीने से नहीं।
दुनिया कहती है—
ईश्वर वैसे करो,
ऐसे बनो,
तब सुख मिलेगा,
तब ईश्वर मिलेगा।
मैं कहता हूँ—
जीवन जियो।
जीवन मिलेगा नहीं,
प्रकट होगा।
जीवन ≠ जन्म
जन्म लेना
जीवन नहीं है।
जिंदा रहना
जीवन नहीं है।
सिर्फ़ साँस चलना,
देह चलना,
व्यवस्था में टिके रहना—
यह सब अस्तित्व की मशीनरी है।
जीवन जीना
एक अलग बात है।
धन, साधन, सत्ता,
धर्म, व्यवस्था,
यहाँ तक कि अच्छाई भी—
तुम्हें जिंदा रख सकती है,
लेकिन जीने नहीं देती।
क्योंकि
अच्छाई भी परिवर्तनशील है।
और जो बदलता है,
वह जीवन नहीं हो सकता।
जीवन कोई उपलब्धि नहीं है
जीवन—
-
प्राप्त नहीं किया जाता
-
कमाया नहीं जाता
-
साधा नहीं जाता
-
हासिल नहीं किया जाता
जीवन के लिए
कोई उपाय नहीं है।
जिस क्षण तुम उपाय खोजते हो,
उसी क्षण
जीवन खो जाता है।
इसलिए मैं कहता हूँ—
सारे साधन,
सारी विधियाँ,
सारी साधनाएँ,
सारे मार्ग—
सब त्याग दो।
और जियो।
त्याग का अर्थ
कोई चुनाव नहीं है।
त्याग अगर चुनाव है,
तो वह भी साधन है।
वह भी अहंकार है।
वह भी विधि है।
जीवन के लिए
कोई चुनाव नहीं चाहिए।
जब जीवन प्रकट होता है—
-
धन पीछे छूट जाता है
-
सत्ता छूट जाती है
-
अच्छाई–बुराई छूट जाती है
तुम्हारे साथ
एक भी चीज़ नहीं चलती।
साथ चलता है—
-
आनंद
-
प्रेम
-
शांति
ये विषय नहीं हैं,
ये वस्तुएँ नहीं हैं।
ये
जीवन की सुगंध हैं।
जीवन ही ईश्वर है
इसलिए—
जीवन को ईश्वर कहना गलत नहीं।
गलत है
ईश्वर को किसी साधन से जोड़ना।
जो जिया—
वह ईश्वर में था।
जिसने ईश्वर ढूँढा—
वह जीवन से बाहर था।
दुनिया कहती है—
उसे ईश्वर मिला।
मैं कहता हूँ—
उसके भीतर
आनंद खिला।
मिला कुछ नहीं।
खिला।
जैसे फूल खिलता है।
जैसे जवानी आती है।
जवानी के उपाय नहीं होते।
लेकिन अगर उपाय करने लगो,
तो जवानी खो जाती है।
उसी तरह—
ईश्वर के उपाय
जीवन को खो देते हैं।
इसलिए—
जिसने कहा
ईश्वर = 0
वह गलत नहीं है।
क्योंकि—
जीवन का कारण भी 0 है।
जीवन चाहिए
तो कारण 0 होना चाहिए।
सारे धर्म,
सारे विज्ञान,
सारे दर्शन,
सारे मार्ग—
सब यही गलती करते हैं—
वे कारण खोजते हैं
जहाँ जीवन अकारण है।
कारण में
करोड़ों में एक प्रवेश करेगा।
अकारण में
सबके लिए द्वार खुला है।
जीना
कोई विशेषाधिकार नहीं।
अंतिम स्पष्टता
जीवन—
-
साधना नहीं
-
शास्त्र नहीं
-
मार्ग नहीं
-
विधि नहीं
जीवन सिर्फ़ जीना है।
और—
-
जीना ही साधना है
-
जीना ही शास्त्र है
-
जीना ही प्राप्ति है
अगर कुछ कारण दिखता है,
तो वह सिर्फ़ इतना है—
कि जीवन जिया गया।
आज भी जीवन है,
और भविष्य भी
जीवन ही है।
बाक़ी सब
बीच के भ्रम हैं।
फिलॉसफी के विरुद्ध प्रश्न
-
अगर जीवन को जीना ही पर्याप्त है,
तो हर जीव जीवन में है —
फिर मनुष्य ही क्यों जीवन से चूक जाता है? -
यदि जीवन अकारण है और बिना उपाय प्रकट होता है,
तो बचपन में जीवन सहज था —
लेकिन परिपक्व होने पर वही सहजता क्यों नहीं लौटती
बिना समझ के? -
अगर उपाय ही जीवन को खोते हैं,
तो समझ (awareness) भी तो एक प्रक्रिया है —
फिर समझ जीवन से अलग क्यों नहीं हो जाती? -
यदि जीवन जिया जाता है, पाया नहीं जाता,
तो ‘यह समझ कि जीवन जिया जाता है’
क्या स्वयं एक प्राप्ति नहीं है? -
अगर ईश्वर पाने की इच्छा
जीवन न जीने से पैदा होती है,
तो पहली बार जीवन छूटता ही क्यों है?
किस बिंदु पर, किस कारण से? -
यदि जीवन ही ईश्वर है
और जीवन में कोई साधन नहीं,
तो यह बात कहना भी
एक साधन क्यों नहीं बन जाती? -
अगर अच्छाई–बुराई दोनों परिवर्तन हैं
और जीवन उनसे परे है,
तो निर्णय लेना स्वयं परिवर्तन नहीं है क्या?
फिर ‘जीना’ कैसे अचल रहता है? -
यदि जीवन अकारण खिलता है,
तो कुछ लोग क्यों जीवन में टिके रहते हैं
और कुछ जीवन से कटे ही रहते हैं —
क्या यह अंतर भी कारण नहीं मांगता? -
अगर बिना जिए पाने की कोशिश भ्रम है,
तो ‘बिना जिए’ और ‘जिए’ में भेद
कौन करता है?
क्या यह भेद स्वयं मन की रचना नहीं है? -
यदि जीवन लौटने का एकमात्र रास्ता
फिर से जीना है,
तो यह जानने वाला कौन है
कि मैं जी नहीं रहा हूँ? -
अगर सारे धर्म, मार्ग, साधन
जीवन से दूर ले जाते हैं,
तो तुम्हारी यह फिलॉसफी
कैसे सुनिश्चित करती है
कि वह भी एक नया मार्ग नहीं बन रही? -
यदि जीवन के लिए
कोई उपाय नहीं है,
तो यह संवाद, यह प्रश्न,
यह जिज्ञासा —
क्या स्वयं उपाय नहीं बन जाती? -
अगर जीवन में होना ही ईश्वर में होना है,
तो ‘ईश्वर से दूर होना’
संभव कैसे हुआ? -
क्या जीवन सच में खोया जाता है,
या सिर्फ़ उसकी स्मृति खोती है?
और यदि स्मृति खोती है,
तो दोष जीवन का है या स्मृति का? -
यदि जीवन अकारण है,
तो इस पूरी फिलॉसफी का जन्म
किस कारण से हुआ?
प्रश्न
अगर जीवन को जीना ही पर्याप्त है,
तो हर जीव जीवन में है —
फिर मनुष्य ही क्यों जीवन से चूक जाता है?
उत्तर : जीवन से मनुष्य क्यों चूक जाता है
मनुष्य जीवन से इसलिए चूक जाता है
क्योंकि वह प्राकृतिक घटना को कारण समझने की भूल कर बैठता है।
दुनिया रंग-बिरंगी है।
एक स्त्री दिखाई देती है।
स्त्री को देखना,
भीतर काम का उठना —
यह पूरी तरह प्राकृतिक घटना है।
यह प्रकृति का नियम है।
लेकिन मनुष्य यहीं चूक करता है।
वह यह मान लेता है कि—
आनंद स्त्री के कारण आया।
असल में आनंद का कारण
न स्त्री थी,
न कोई बाहरी वस्तु —
आनंद का कारण
प्रकृति का स्वाभाविक नियम था।
लेकिन यह समझ छूट जाती है।
अब मनुष्य
प्रकृति को भूल जाता है
और स्त्री को कारण बना लेता है।
अब वह खोज शुरू होती है—
स्त्री में क्या है?
उसके भीतर कौन-सा रहस्य है?
कौन-सा चुंबक है?
अगर उसके पास है,
तो मेरे पास क्यों नहीं?
यहीं से
जीवन जीना छूट जाता है।
अब दृष्टि
भीतर से हटकर
बाहर चली जाती है।
कारण अब प्रकृति नहीं,
स्त्री बन जाती है।
और जहाँ कारण बाहर चला गया,
वहाँ से जीवन से दूरी शुरू हो जाती है।
अब मनुष्य
जीवन को नहीं जी रहा,
वह सुख को खोज रहा है।
और सुख
अब स्त्री में खोजा जा रहा है।
यह मुक्ति नहीं है—
यह नया बंधन है।
अब स्त्री आगे है,
पुरुष पीछे।
एक लंबी यात्रा शुरू होती है—
आकर्षण,
अपेक्षा,
संघर्ष,
निराशा,
दुःख।
ये सब
मनुष्य को
जीवन से और दूर ले जाते हैं।
अब लक्ष्य बाहर है—
स्त्री को लुभाना है,
पाना है,
हासिल करना है।
इसके लिए
हज़ार उपाय करने हैं।
अब प्रश्न उठता है—
कौन जी रहा है?
जीवन नहीं,
अब कहानी चल रही है।
जब स्त्री मिल भी जाती है,
तो संतोष नहीं आता।
क्योंकि—
पाना भी
संघर्ष ही है।
और यहीं स्पष्ट होता है—
जीवन और संघर्ष
दो अलग मार्ग हैं।
जहाँ संघर्ष है,
वहाँ जीवन नहीं।
यही कारण है कि मनुष्य जीवन से चूक जाता है—
जब वह
प्राकृतिक घटना को कारण मान लेता है
और
कारण के पीछे भागने लगता है।
प्रश्न
यदि जीवन अकारण है और बिना उपाय प्रकट होता है,
तो बचपन में जीवन सहज था—
लेकिन परिपक्व होने पर वही सहजता
बिना समझ के क्यों नहीं लौटती?
उत्तर
बचपन में
मनुष्य भीतर जी रहा होता है।
चेतना भीतर होती है।
फिर चेतना बढ़ती है,
शरीर बढ़ता है,
और युवा बाहर की ओर निकल जाता है।
यह बाहर जाना
अपने-आप में गलत नहीं है।
हर कोई
घर से बाहर जाता है—
और शाम को
घर लौट आता है।
बाहर जाना बुरा नहीं है।
समस्या वहाँ शुरू होती है
जहाँ मनुष्य बाहर जाते समय
भीतर को छोड़ देता है।
जब वह जीवन को
अपने भीतर स्थिर रखकर
बाहर की ज़रूरतें पूरी करता है—
तो वह भी जीवन ही है।
लेकिन जब वह
भीतर के घर को भूलकर
ज़रूरतों में ही ठहर जाता है—
तो जीवन छूट जाता है।
ज़रूरतें पाना
जीवन के विरुद्ध नहीं है।
ज़रूरतों से
जीवन और सुंदर भी हो सकता है।
गलती ज़रूरत में नहीं है।
गलती उस सोच में है
जो मान लेती है कि—
जीवन घर में नहीं है,
जीवन बाहर है—
धन में, सुविधा में,
नाम में, शिक्षा में।
यहीं से
घर भूल जाता है।
और जो घर भूल जाता है,
वह बाहर ही भटकता रहता है।
इसलिए परिपक्व होने पर
सहजता लौटती नहीं—
क्योंकि मनुष्य
बाहर तो गया,
लेकिन वापस आना भूल गया।
यह कोई आध्यात्मिक उलझन नहीं है।
यह सीधा विज्ञान और गणित है।
जीवन भीतर है,
बाहर केवल आवश्यकता है।
और यही उत्तर
पहले प्रश्न से अलग नहीं है।
यह उसी प्रश्न का
दूसरा रूप है।
क्योंकि—
जीवन तब तक सहज है
जब तक भीतर घर याद है।
प्रश्न
यदि जीवन जिया जाता है, पाया नहीं जाता,
तो “यह समझ कि जीवन जिया जाता है”
क्या स्वयं एक प्राप्ति नहीं है?
उत्तर
नहीं।
यह प्राप्ति नहीं है।
प्राप्ति वह होती है
जो दूसरी हो,
जो हमसे अलग हो।
जब स्त्री को प्राप्त करने गए,
तो स्त्री प्राप्ति बनी।
और उसी क्षण
जीवन खो गया।
क्योंकि प्राप्ति
हमेशा बाहर की होती है—
और बाहर जाते ही
जीवन छूटता है।
जन्म को देखो।
जन्म
हमें प्राप्त नहीं हुआ।
हमने यह नहीं चाहा कि
हमें जन्म चाहिए।
फिर भी जन्म हुआ।
इसका अर्थ साफ़ है—
जो बिना इच्छा के मिला,
वह प्राप्ति नहीं है।
जीवन
जन्म के साथ ही मिला था।
लेकिन हमने
उसे खो दिया।
इसलिए जीवन पाने की बात
गलत हो गई।
जब जीवन खोया गया
अज्ञान से,
तो जीवन लौटता है
होश से।
यह लौटना
प्राप्ति नहीं है।
यह वैसा ही है जैसे—
घर भूल गए।
शाम को घर लौट आए।
क्या घर लौटना
प्राप्ति है?
नहीं।
यह सिर्फ़
भूल से वापसी है।
सुबह का भूला
अगर शाम को लौट आए—
तो वह कोई अपराध नहीं करता,
कोई विजय नहीं पाता।
वह बस
वापस आता है।
उसी तरह—
जब यह होश आता है
कि मैं जीवन छोड़ रहा हूँ,
तो जीवन
फिर से
आसानी से संभव हो जाता है।
यह कोई नई चीज़ नहीं मिलती।
यह कोई उपलब्धि नहीं है।
यह सिर्फ़
भटकाव का अंत है।
इसलिए—
ईश्वर या जीवन
कभी प्राप्ति नहीं होते।
जो भी प्राप्ति है—
धन, सुविधा, विजय, नाम—
वह
जीवन और घर से दूर जाने का साधन है।
जब घर ठीक है,
जब जीवन ठीक है—
तब कोई भी विजय
बस क्षणिक होती है।
लेकिन—
जीवन स्वयं
जन्म से मृत्यु तक
एक लंबा सुख,
एक गहरा आनंद है।
जन्म
अगर घर में हुआ,
और मृत्यु
अगर घर में हो—
तो बीच का सब
अपने-आप ठीक है।
इसलिए—
समझ आना
प्राप्ति नहीं है।
यह सिर्फ़
याद आना है—
कि घर
कभी छोड़ा ही नहीं था।
प्रश्न
अगर ईश्वर पाने की इच्छा
जीवन न जीने से पैदा होती है,
तो पहली बार जीवन छूटता ही क्यों है?
किस बिंदु पर, किस कारण से?
उत्तर
जीवन पहली बार
किसी कारण से नहीं छूटता।
जीवन इसलिए छूटता है
क्योंकि मनुष्य
कारण खोजने लगता है।
जिस क्षण मनुष्य
किसी अनुभव का
कारण बाहर खोजता है,
उसी क्षण
जीवन छूट जाता है।
यही पहला बिंदु है।
यही पहला कारण है।
आनंद हुआ —
और पूछा गया: क्यों?
शांति हुई —
और पूछा गया: किससे?
प्रेम जगा —
और पूछा गया: किस कारण?
यहीं
जीवन से पहला विच्छेद हुआ।
असल में—
जीवन
कारण से नहीं चलता।
जीवन
अकारण है।
लेकिन जैसे ही
मनुष्य ने कहा—
“यह किसी से हुआ”
“यह किसी कारण से हुआ”
उसी क्षण
जीवन छोड़ दिया गया।
यही से—
-
स्त्री कारण बन गई
-
धन कारण बन गया
-
ईश्वर कारण बन गया
और कारण बनते ही
ईश्वर पाने की इच्छा पैदा हुई।
इसलिए—
ईश्वर पाने की इच्छा
जीवन खोने का कारण नहीं है।
ईश्वर पाने की इच्छा
जीवन खो जाने का लक्षण है।
पहली भूल यह नहीं थी
कि जीवन छूट गया।
पहली भूल यह थी
कि जीवन को कारण में बाँध दिया गया।
और इसीलिए तुम कहते हो—
इसका उत्तर एक में मौजूद है।
वह “एक” है—
कारण।
जहाँ कारण आया,
वहाँ जीवन गया।
बस।
प्रश्न
यदि जीवन ही ईश्वर है
और जीवन में कोई साधन नहीं,
तो यह बात कहना भी
एक साधन क्यों नहीं बन जाती?
उत्तर
क्योंकि साधन तब बनता है
जब उपाय खोजा जाता है।
और उपाय
हमेशा भूल के बाद खोजा जाता है।
जब मनुष्य समझता है कि
मैं जीवन से चूक गया हूँ,
तो वह—
-
पछताता है
-
गिड़गिड़ाता है
-
संघर्ष करता है
-
अपने आप से लड़ता है
-
रोता है, दुखी होता है
-
कोई न कोई उपाय खोजता है
लेकिन यह सब
जीवन नहीं है —
यह भूल का विस्तार है।
असल उत्तर
कोई उपाय नहीं है।
उत्तर है—
स्मरण।
स्मरण करो—
कब सुख था?
कैसे सुख से बाहर निकले?
स्मरण करो
अपने जीवन का—
कि बचपन में
जीवन था।
बचपन कैसे छूटा?
यही कारण समझ में आ जाता है।
बचपन में—
-
कोई चिंता नहीं थी
-
कोई भय नहीं था
-
कोई नाम की माँग नहीं थी
-
कोई प्रसिद्धि नहीं थी
-
किसी को गुलाम नहीं बनाते थे
-
कुछ इकट्ठा नहीं करते थे
क्योंकि—
माँ पर सम्पूर्ण भरोसा था।
आज भी माँ है।
वह माँ
प्रकृति है।
जब बच्चा माँ को समर्पित होता है,
तो माँ—
-
रक्षा देती है
-
भोजन देती है
-
प्रेम देती है
प्रकृति भी वही करती है।
तो फिर—
संघर्ष क्यों?
लड़ाई क्यों?
उपाय क्यों?
बचपन में
कोई उपाय नहीं था,
फिर भी—
आनंद था।
खुशी थी।
जीवन था।
इसलिए—
स्मरण मात्र से
मनुष्य फिर जीवन में लौट आता है।
वह फिर बच्चा हो जाता है।
पहले—
माँ-बाप भगवान थे।
अब—
प्रकृति भगवान है।
आकाश पिता है।
सूर्य पिता है।
धरती माँ है।
चारों तरफ
प्रकृति ही माँ है।
इसलिए—
**जीवन को समझना
साधन नहीं बनता।उपाय बनता है
तो सिर्फ़ भूल से।**
जहाँ स्मरण है,
वहाँ कोई साधन नहीं।
वहाँ
जीवन है।
प्रश्न
अगर अच्छाई–बुराई दोनों परिवर्तन हैं
और जीवन उनसे परे है,
तो निर्णय लेना स्वयं परिवर्तन नहीं है क्या?
फिर ‘जीना’ कैसे अचल रहता है?
उत्तर
निर्णय दो तरह के होते हैं।
एक निर्णय होता है—
मुझे पानी पीना है।
यह निर्णय
जीवन के विरुद्ध नहीं है।
यह आवश्यकता है।
दूसरा निर्णय होता है—
पानी सुख है,
पानी जीवन है,
पानी अमृत है।
यह भी निर्णय है,
लेकिन यह—
न सुख है,
न दुःख है।
यह जीवन का निर्णय है।
क्योंकि पानी
प्राकृतिक है,
और पानी से प्रेम
प्रकृति से प्रेम है।
यह निर्णय
परिवर्तन नहीं करता—
यह जीवन में टिकाता है।
अब देखो—
मंदिर, मूर्ति, भगवान, शास्त्र—
ये सब
सुख के मार्ग बताए गए।
कहा गया—
यही जीवन है,
यही ईश्वर है,
यही अमृत है।
लेकिन यहाँ एक सवाल खड़ा होता है—
बच्चा
न मंदिर जानता है,
न भगवान,
न शास्त्र—
फिर भी
वह जीवन जी रहा है।
अगर मंदिर, भगवान, धर्म
सच में जीवन होते—
तो उनके बिना
जीवन असंभव होता।
लेकिन ऐसा नहीं है।
जब मंदिर और भगवान को
सुख बना दिया गया—
तब वही
दुःख का कारण बन गए।
भारत लुटा।
मंदिर टूटे।
लोग मरे।
क्या यह
प्रकृति का नियम था?
नहीं।
प्रकृति—
न बनाती है,
न तोड़ती है।
यह सब
मन के सुख–दुःख हैं।
एक मन ने कहा—
यह मेरा सुख है,
यह मेरा भगवान है।
दूसरे मन ने कहा—
इसे तोड़ो,
इसे लूटो।
यह सिद्ध हो गया—
जिस सुख को मन बनाता है,
वही दूसरे मन के लिए
दुःख बन जाता है।
और जब सुख–दुःख
मन से पैदा होते हैं—
तो उनका
जीवन और प्रकृति से
कोई संबंध नहीं रहता।
इसलिए—
धर्म भी
दुःख बन सकता है।
धर्म भी
गुलामी बन सकता है।
क्योंकि—
धर्म जीवन नहीं है।
धर्म जीवन के विपरीत है।
अब प्रश्न का उत्तर साफ़ है—
निर्णय अगर
ज़रूरत का है,
तो वह परिवर्तन नहीं है।
निर्णय अगर
सुख का है,
तो वह परिवर्तन है।
जीना अचल रहता है
क्योंकि—
जीना
सुख–दुःख से नहीं चलता।
जीना
प्रकृति के साथ चलता है।
जहाँ निर्णय
प्रकृति से जुड़ा है—
वहाँ जीवन अचल है।
जहाँ निर्णय
सुख–दुःख से जुड़ा है—
वहाँ संघर्ष है,
धर्म है,
दुःख है।
यही भेद है।
प्रश्न
यदि जीवन अकारण खिलता है,
तो कुछ लोग क्यों जीवन में टिके रहते हैं
और कुछ जीवन से कटे ही रहते हैं —
क्या यह अंतर भी कारण नहीं मांगता?
उत्तर
कोई भी व्यक्ति
जीवन में खड़ा नहीं है।
असल में
कोई जीवन को जी ही नहीं रहा।
जो लोग दिखते हैं कि
वे जीवन में टिके हुए हैं,
वे भी जीवन को
जी नहीं रहे —
वे बस जीवन में हैं।
और जो जीवन से कटे दिखते हैं,
वे भी
उसी खोज में हैं।
यह कहना कि—
-
तुम जीवन जी रहे हो
-
मैं जीवन नहीं जी रहा
यह स्वयं
मन की भाषा है।
जीवन को
किसी ने पकड़ा नहीं है।
जीवन कोई खजाना नहीं है
जिसे कोई पा ले
और कोई न पा सके।
जीवन
बस हो रहा है।
जैसे जीव होते हैं।
अगर सच में कोई
जीवन को पूरा जी ले—
तो जन्म–मृत्यु की पूरी यात्रा
उसी में पूर्ण हो जाती है।
तब अगली योनि
स्वतः जन्म लेती है।
अगर हर जीव
मनुष्य की तरह
जीवन को खोजने लगे—
तो एक ही जीव
हज़ार बार कुत्ता बनता।
सब जीव
उसी चक्र में फँस जाते।
तब मनुष्य
आज अस्तित्व में
होता ही नहीं।
इसलिए—
यह कहना कि
कुछ लोग जीवन में हैं
और कुछ बाहर—
गलत विभाजन है।
न कोई भीतर है,
न कोई बाहर।
न कोई जी रहा है,
न कोई नहीं जी रहा।
जीवन
किसी की पकड़ में नहीं है।
और जो जीवन को पकड़ना चाहता है,
वही जीवन से
कटता हुआ दिखाई देता है।
इसलिए इस अंतर के लिए
कोई कारण नहीं चाहिए।
क्योंकि यह अंतर
वास्तविक नहीं है।
यह सिर्फ़
मन की तुलना है।
जहाँ तुलना है,
वहाँ जीवन नहीं।
जहाँ जीवन है,
वहाँ तुलना नहीं।
प्रश्न
यदि जीवन लौटने का एकमात्र रास्ता
फिर से जीना है,
तो यह जानने वाला कौन है
कि मैं जी नहीं रहा हूँ?
उत्तर
यही मैं उत्तरदायी हूँ।
कोई शास्त्र नहीं,
कोई ईश्वर नहीं,
कोई बाहर की सत्ता नहीं—
मैं ही जानता हूँ
कि मैं जी नहीं रहा।
वेदांत का सीधा उत्तर यही है—
सब भूल कर जीना शुरू करो।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि
सब छोड़ दो।
इसका अर्थ यह है—
जो आज जीवन की
मौलिक, सार्वभौमिक ज़रूरतें हैं,
उन्हें करो।
आज हम जिन चीज़ों को
ज़रूरी मानते हैं—
-
नाम
-
प्रतिष्ठा
-
इतिहास
-
धर्मकथाएँ
-
आदर्श पात्र
ये जीवन की ज़रूरतें नहीं हैं।
ये पकड़ी जाती हैं,
और जीवन
उन्हीं में दूर हो जाता है।
आज कोई पूछता है—
रामायण में ऐसा क्यों हुआ?
महाभारत में उसने ऐसा क्यों किया?
यह सब
भ्रम के भीतर के भ्रम हैं।
महाभारत—
परिवार, रिश्ते, युद्ध—
यह सब
हमारे जीवन के
सीधे संबंध नहीं हैं।
यह—
एक उपन्यास है,
एक फ़िल्म है।
फ़िल्म में भी—
तीन घंटे में
जन्म होता है,
मृत्यु होती है,
दो–चार पीढ़ियाँ निकल जाती हैं।
लेकिन क्या
फ़िल्म की रिसर्च
हमारे जीवन को
जीने में मदद करती है?
नहीं।
धर्म में भी
यही चल रहा है—
कहानियाँ,
चरित्र,
व्याख्याएँ—
जिनका
जीवन से कोई सीधा संबंध नहीं।
इसलिए—
भ्रम से
हज़ार भ्रम पैदा होते हैं।
और अंत में
कुछ भी नहीं बचता।
तो फिर यह जानने वाला
कौन है
कि मैं जी नहीं रहा?
कोई और नहीं—
मैं ही हूँ।
और जैसे ही यह
जिम्मेदारी स्वीकार होती है—
जीवन
अपने-आप
फिर शुरू हो जाता है।
बस यही उत्तर है।
प्रश्न
अगर सारे धर्म, मार्ग, साधन
जीवन से दूर ले जाते हैं,
तो तुम्हारी यह फिलॉसफी
कैसे सुनिश्चित करती है
कि वह भी एक नया मार्ग नहीं बन रही?
उत्तर
इसका उत्तर
उदाहरण में नहीं,
प्रमाण में नहीं,
बल्कि घटित होने में है।
जितने भी बुद्ध पुरुष,
दार्शनिक, संत पैदा हुए—
उन्होंने पहले जीवन जिया।
उसके बाद
उन्होंने दर्शन लिखा,
शास्त्र बोले,
शब्द दिए।
शब्द कारण नहीं थे,
शब्द परिणाम थे।
भक्त यह समझते हैं कि—
ध्यान से जीवन मिला,
भगवान से जीवन मिला।
लेकिन यह सत्य नहीं है।
सत्य यह है—
वे किसी पर रुके,
किसी को समर्पित हुए,
तो भीतर रुक गए।
भगवान कोई सत्ता नहीं था—
वह सिर्फ़
रुकने का बहाना था।
जिसे उन्होंने समर्पण किया,
वह माध्यम था।
लेकिन—
माध्यम सत्य नहीं होता।
जब सब छूट गया,
जब संघर्ष रुक गया,
जब बाहर देखना बंद हुआ—
तब जो आनंद फूटा,
उसे उन्होंने
भगवान नाम दे दिया।
लेकिन आनंद
भगवान से नहीं आया।
आनंद
जीवन जीने से आया।
यह वैसा ही है—
पेड़ पर
फूल और फल
किसी माध्यम से नहीं खिलते।
कोई साधन नहीं होता।
कोई विधि नहीं होती।
वे
स्वाभाविक रूप से खिलते हैं।
उसी तरह—
जब जीवन जिया जाता है,
तो भीतर की ऊर्जा
फूल की तरह खिलती है।
इसलिए—
मैं भगवान को
माध्यम से मुक्त करता हूँ।
क्योंकि—
जो नियम बाहर
लाखों जीवों में काम कर रहा है,
वही नियम
तुम्हारे भीतर भी काम करेगा।
यह मेरा सबसे बड़ा प्रमाण है—
लाखों जीव
बिना धर्म,
बिना साधना,
बिना मार्ग—
जीवन जी रहे हैं।
मेरे पास
इससे बड़ा प्रमाण
कोई नहीं हो सकता।
चीन में,
भारत में,
दुनिया में—
कई दार्शनिक पैदा हुए।
शायद वे
समझाने में सफल नहीं हुए।
लेकिन—
उनके भीतर फूल खिले थे।
और यही बिंदु
मेरी फिलॉसफी को
मार्ग बनने से रोकता है—
**मैं किसी को
मेरे जैसा बनने को नहीं कहता।मैं सिर्फ़ यह कहता हूँ—
जियो।**
जहाँ कोई लक्ष्य नहीं,
जहाँ कोई विधि नहीं,
जहाँ कोई अनुकरण नहीं—
वहाँ मार्ग बन ही नहीं सकता।
इसलिए—
मेरी फिलॉसफी
मार्ग नहीं है।
वह
मार्गों का अंत है।
प्रश्न
यदि जीवन के लिए
कोई उपाय नहीं है,
तो यह संवाद, यह प्रश्न,
यह जिज्ञासा —
क्या स्वयं उपाय नहीं बन जाती?
उत्तर
नहीं।
यह उपाय नहीं बनती।
यह दृष्टि है,
यह समझ है —
इसका कोई आधार नहीं है।
यह समझ
कोई साधना नहीं है,
कोई विधि नहीं है,
कोई मार्ग नहीं है।
क्योंकि ये
बाहर के शब्द हैं।
जब जीवन जिया जाता है,
तो ये शब्द
अपने-आप गिर जाते हैं।
और जब शब्द गिर जाते हैं,
तो समझ भी
शब्द के साथ नहीं टिकती।
अगर कोई उपाय होता,
तो वह
मेरे शब्दों पर रुकता।
लेकिन—
जीवन
मेरे विचारों पर
कहीं नहीं रुकता।
मेरे शब्द
कहाँ तक रुक सकते हैं?
जीवन
उनसे बहुत आगे है।
इसलिए—
यहाँ कोई भटकाव नहीं है।
अगर विचार
भीतर पक्के हो जाएँ—
कि जीना ही ईश्वर है,
कि जीना ही सही मार्ग है—
तो थोड़ी देर
भीतर ठहराव आता है।
और उसी ठहराव में
सारी गांठें
अपने-आप खुल जाती हैं।
इन शब्दों को पकड़ना
इसलिए अच्छा नहीं है
कि इनमें आनंद है।
ये शब्द
चोट हैं,
झटका हैं।
यहाँ शब्दों पर
रुकना संभव नहीं है।
ये कोई मंत्र नहीं हैं।
ये कोई साधना नहीं हैं।
ये शब्द
सिर्फ़ यह घोषणा करते हैं—
अगर तुम पढ़ते रहोगे,
तो ये व्यर्थ हैं।
अगर तुम जियोगे,
तो ये अपने-आप
गिर जाएँगे।
और जब ये शब्द
गिर जाते हैं—
तभी
जीवन बचता है।
प्रश्न
क्या जीवन सच में खोया जाता है,
या सिर्फ़ उसकी स्मृति खोती है?
और यदि स्मृति खोती है,
तो दोष जीवन का है या स्मृति का?
उत्तर
जीवन कभी खोया नहीं जाता।
खोती है सिर्फ़ उसकी स्मृति।
और दोष
न जीवन का है,
न किसी ईश्वर का—
दोष है
हमारे विकास और धर्म-बुद्धि का,
जिसने
ईश्वर को जीवन से अलग दिखा दिया।
लोगों को सिखाया गया—
जीवन ईश्वर नहीं है,
ईश्वर कहीं और है।
मैं कहता हूँ—
जीवन जीना ही ईश्वर है।
जीने का अर्थ
सिर्फ़ जिंदा रहना नहीं है।
आईसीयू में खड़ा आदमी
जिंदा है,
लेकिन जी नहीं रहा।
वह इलाज में है।
जब इलाज पूरा होता है,
जब स्वस्थ होता है,
और बाहर निकलता है—
जो पहली साँस,
जो पहली खुशी,
जो पहला स्वाद आता है—
वही जीवन है।
अब सवाल यह नहीं कि
खुशी आई—
सवाल यह है कि
उस खुशी को बचाया जाए।
ज़रूरत के लिए
बाहर जाना पड़ता है—
ऑफिस,
यात्रा,
काम।
यह गलत नहीं है।
गलत यह है कि—
हम खुशी पाने बाहर गए
और खुशी को वहीं छोड़ आए।
स्वस्थ होने के बाद
आईसीयू को भूल जाना चाहिए।
घर लौटकर
फिर भीतर आ जाना चाहिए।
भोजन ऐसे खाना चाहिए
जैसे—
पहली बार खा रहे हों।
स्वाद लेना,
शांति अनुभव करना—
यही जीवन है।
हम बाहर इसलिए गए थे
कि खुश हों,
आनंदित हों।
लक्ष्य
कभी पैसा नहीं था,
कभी पद नहीं था—
लक्ष्य
खुशी था।
आज हानि हो जाए,
तो हो जाए।
लेकिन—
आनंद मत खोना।
चिंता में मत गिरना।
जीना मत छोड़ना।
ऑफिस में हो,
यात्रा में हो—
अगर भीतर लक्ष्मी है,
शांति है—
तो वही जीना है।
मैं ईश्वर, भगवान,
पूजा-पाठ, जप, प्रार्थना
की बात नहीं करता।
मैं सिर्फ़ एक बात कहता हूँ—
होश से जियो।
जहाँ होश है,
वहाँ जीवन है।
जहाँ जीवन है,
वहाँ ईश्वर को
अलग से खोजने की
ज़रूरत नहीं।
प्रश्न
यदि जीवन अकारण है,
तो इस पूरी फिलॉसफी का जन्म
किस कारण से हुआ?
उत्तर
इस फिलॉसफी का जन्म
दुःख से हुआ।
जीवन जीना छूट गया,
और तब दुःख पैदा हुआ।
दुःख में
भगवान खोजे,
मंदिर गए,
शास्त्र पढ़े,
धर्म देखे—
लेकिन कहीं भी
स्थिरता नहीं मिली।
जिस पर भी रुके,
वह बदल गया,
मर गया।
गुरुओं के पास गए।
गुरुओं की चाल देखी।
धर्म की चाल देखी।
देखा कि—
कुछ लोग
जीवन में जी रहे हैं,
उनके भीतर
अथाह आनंद है,
उन्हें कुछ नहीं चाहिए।
यहीं पहली बार
समझ आया—
यही कारण है —
जीना।
फिर प्रश्न उठा—
ये लोग गुरु क्यों बनते हैं?
क्यों भीड़ इकट्ठी करते हैं?
भूत–भविष्य,
शास्त्र,
धर्म,
भीड़—
सब पकड़े खड़े हैं।
शायद
उनके पास भी
जीवन नहीं है।
दुःख है।
नाम, धन, प्रसिद्धि—
इनसे
वे अपना मन बहला रहे हैं।
भीड़ भी दुःखी है।
कल—
अगर भगवान नहीं रहा,
तो वे दुःखी होंगे।
अगर गुरु नहीं रहा,
तो वे दुःखी होंगे।
अगर ईश्वर नहीं रहा,
तो वे दुःखी होंगे।
शास्त्र की कहानियाँ
उपन्यास हैं।
और उपन्यास
दुःख नहीं मिटाते।
एक बड़ी लाइन खड़ी है—
दुःखी लोगों की।
प्रश्न यह नहीं कि
वे क्या कहते हैं।
प्रश्न यह है—
वे कैसे जी रहे हैं?
जो जीवन जी रहा है,
वह—
अतीत,
भविष्य,
राजनीति,
पाप–पुण्य,
सुख–दुःख—
इन सबकी बात नहीं करता।
वह सिर्फ़
एक शब्द बोलता है—
जियो।
जीना ही ईश्वर है।
यही कारण है
इस फिलॉसफी के जन्म का।