Translate

  मेरी यात्रा — सिर्फ यात्रा है। यह कोई तीर्थ नहीं, कोई अंतिम पड़ाव नहीं। तीर्थ वहाँ बनता है जहाँ मन रुकना चाहता है, और जीवन निरंतर चलना चाह...

मेरी यात्रा — सिर्फ यात्रा है।

 मेरी यात्रा — सिर्फ यात्रा है।

यह कोई तीर्थ नहीं, कोई अंतिम पड़ाव नहीं।
तीर्थ वहाँ बनता है जहाँ मन रुकना चाहता है,
और जीवन निरंतर चलना चाहता है।
इंसान भटका हुआ इसलिए है
क्योंकि उसने जीवन को छोड़कर मार्गों को पकड़ लिया है।
मार्ग साधन था — लक्ष्य बन गया।
शब्द संकेत थे — सत्य बन बैठे।
धर्म, गुरु, शास्त्र —
ये बाहर खड़े हुए प्रश्न हैं।
पर असली प्रश्न भीतर उठता है —
तुम कौन हो?
मैं कौन हूँ?
जीवन क्या है?
ईश्वर क्या है?
जब ये प्रश्न भीतर जलते हैं
तभी यात्रा शुरू होती है।
और जब प्रश्न गहरे होते जाते हैं
तो उत्तर बाहर नहीं — भीतर जन्म लेते हैं।
मंज़िल कोई स्थान नहीं है।
मंज़िल जीवन को पूर्ण रूप से जी लेना है।
जीवन से अलग सत्य नहीं,
जीवन से अलग मुक्ति नहीं।
मन जब भीड़ से हटता है,
चेतना जब शोर से दूर होती है,
बुद्धि जब पकड़ छोड़ देती है —
तब भीतर स्थिरता उतरती है।
और उस स्थिरता में
जीवन खेल बन जाता है।
तुम खिलाड़ी नहीं रहते — साक्षी हो जाते हो।
देखते हो, अनुभव करते हो, बोध होता है।
भीतर हज़ार फूल खिलते हैं।
अनंत की सुगंध फैलती है।
नाद सुनाई देता है — बिना शब्द का संगीत।
स्त्री उस क्षण नृत्य बन जाती है,
गीत उसके भीतर से बहता है।
पुरुष उस क्षण संगीत बन जाता है,
वाणी वेद की तरह प्रकट होती है।
यह किसी साधना से नहीं आता।
यह किसी विशेष ज्ञान से नहीं आता।
यह तब आता है जब जीवन को बिना भागे जिया जाता है।
जीवन और जरूरत — दोनों साथ चल सकते हैं।
जीना त्याग नहीं, संतुलन है।
अनुभव बिना ज्ञान — अंधे का हाथ पकड़कर अंधे को चलाना है।
और यही मानवता का भटकाव बन गया है।
पुण्य के नाम पर उपाय,
कर्म के नाम पर डर,
ईश्वर के नाम पर आश्वासन —
ये सब मन को समझाने के तरीके हैं।
पर अज्ञान को सजा नहीं दी जा सकती।
अज्ञान केवल समझ से पिघलता है।
जब ईसा ने सत्य कहा
तो अज्ञान ने उन्हें सूली पर चढ़ाया।
उनकी करुणा दया नहीं थी —
गहन समझ थी।
जैसे आँधी में गिरा वृक्ष दोषी नहीं होता,
वैसे ही मन भी दोषी नहीं।
प्रकृति संतुलन करती है,
कुछ टूटता है ताकि नया जन्म ले सके।
और तब समझ आता है —
जीवन ही ईश्वर है।
जीवन ही गुरु है।
जीवन ही अंतिम सत्य है।
✦ Vedanta 2.0 ✦