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  ॐ vedanta 2 .0  life  अनंत यात्रा सीढ़ियाँ, सत्य और मृत्यु का रहस्य "हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्। तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्...

अनंत यात्रा: सीढ़ियाँ, सत्य और मृत्यु का रहस्य

 

vedanta 2 .0  life 

अनंत यात्रा




सीढ़ियाँ, सत्य और मृत्यु का रहस्य
"हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥"
"हे पूषन्! सत्य का मुख सोने के पात्र (चमकदार आवरण) से ढका हुआ है। मुझ सत्य-धर्मी के लिए उसे हटा दें, ताकि मैं परम सत्य का दर्शन कर सकूँ।"— ईशावास्य उपनिषद्, १५
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प्रस्तावना — शब्द और सत्य

ब्द सत्य की ओर इशारा तो कर सकते हैं, पर वे स्वयं सत्य नहीं होते। जिस प्रकार प्यास शब्द लिखने से कंठ की तृष्णा नहीं बुझती, उसी प्रकार 'परमात्मा', 'ब्रह्म' या 'सत्य' कहने भर से उस अनंत का अनुभव नहीं हो जाता। हम एक ऐसे जगत में हैं जहाँ हमने मानचित्र को ही भूमि मान लिया है। यह अध्याय उसी भ्रम को तोड़ने का एक विनम्र प्रयास है।

सत्य एक ऐसा एकांत अनुभव है जिसे बांटा नहीं जा सकता। जो इसे जानता है, वह मौन हो जाता है; और जो बहुत बोलता है, वह शायद अभी तट पर ही खड़ा है। यह यात्रा शब्दों से निशब्द की ओर, और मृत्यु से अमरत्व की ओर ले जाने वाली है।

अध्याय १: ग्रंथ — सीढ़ी हैं, छत नहीं

मनुष्य की सबसे बड़ी भ्रांति यह है कि उसने धर्मग्रंथों को ही अंतिम पड़ाव मान लिया है। वेद, उपनिषद् और भगवद्गीता निस्संदेह मानवता की अमूल्य निधियां हैं, परन्तु वे गंतव्य नहीं, मार्ग हैं। वे वह उँगली हैं जो चाँद की ओर इशारा कर रही है। मूर्ख उँगली को पकड़ लेता है और चाँद को भूल जाता है।

"नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो
न मेधया न बहुना श्रुतेन।"
"यह आत्मा न प्रवचन से, न बुद्धि से और न ही बहुत सुनने (शास्त्र ज्ञान) से प्राप्त की जा सकती है।"— कठोपनिषद्, १.२.२३

ग्रंथ एक नक्शा हैं। नक्शा कितना भी सटीक क्यों न हो, उस पर चलने का परिश्रम आपको ही करना होगा। नक्शे में बने पहाड़ पर चढ़ने से पसीना नहीं आता, लेकिन वास्तविक पहाड़ की चढ़ाई साँसें फुला देती है। उपनिषदों ने स्वयं अपनी सीमा स्वीकार की है, जब वे ब्रह्म की व्याख्या करते हुए कहते हैं — "नेति, नेति" (यह नहीं, यह भी नहीं)।

वे कहते हैं कि तुम जिस भी वस्तु, विचार या रूप को 'सत्य' कहोगे, वह सत्य से छोटा होगा। अतः ग्रंथ वह सीढ़ी है जिसे चढ़कर ही छत (परम सत्य) पर पहुँचा जा सकता है, लेकिन छत पर पहुँचने के लिए अंततः सीढ़ी को छोड़ना ही पड़ता है।

अध्याय २: जो लिखा जा सकता है, वह पूर्ण सत्य नहीं

ज्ञान के तीन स्तर हैं — श्रवण, मनन और निदिध्यासन। पढ़ना या सुनना (श्रवण) केवल सूचना है। उसे तर्क से समझना (मनन) बौद्धिक व्यायाम है। लेकिन उसे जीना (निदिध्यासन) ही वास्तविक ज्ञान है।

"पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।"— कबीरदास

सत्य को लिखा जा सकता है, लेकिन उसके 'अनुभव' को नहीं। रहस्यवादी संत श्री रामकृष्ण परमहंस अक्सर नमक की पुतली का उदाहरण देते थे। वे कहते थे — "एक नमक की पुतली समुद्र की गहराई नापने गई। जैसे ही वह पानी में उतरी, वह गलकर समुद्र ही हो गई। अब लौटकर कौन बताए कि समुद्र कितना गहरा है?"

यही रहस्यवादी की दुविधा है। जिसने सत्य को चखा, वह गूंगा हो गया। जैसे गूंगे को गुड़ खिलाने पर वह उसका स्वाद तो लेता है पर वर्णन नहीं कर सकता। अक्षर (शब्द) केवल राख हैं जो उस अग्नि की याद दिलाते हैं जो कभी जली थी। पढ़ने से आप विद्वान हो सकते हैं, पर बुद्ध नहीं। बुद्ध होने के लिए शब्दों के जंगल से बाहर निकलकर मौन के आकाश में उड़ना पड़ता है।

अध्याय ३: मृत्यु का रहस्य — सीढ़ी, अंत नहीं

जैसे ग्रंथ अंतिम सत्य नहीं हैं, वैसे ही मृत्यु जीवन का अंत नहीं है। हम मृत्यु से भयभीत होते हैं क्योंकि हम स्वयं को यह शरीर मानते हैं। लेकिन यह शरीर तो केवल एक वस्त्र है, एक वाहन है।

"न जायते म्रियते वा कदाचि-
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥"
"आत्मा न कभी जन्म लेती है, न मरती है। वह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर भी वह नहीं मारी जाती।"— श्रीमद्भगवद्गीता, २.२०

मृत्यु एक विराम है, पूर्णविराम नहीं। यह एक कोमा (,) है, जिसके बाद वाक्य फिर शुरू होता है। जिस प्रकार दिन भर के श्रम के बाद रात्रि की नींद आवश्यक है ताकि अगले दिन नई ऊर्जा के साथ जागा जा सके, उसी प्रकार जीवन भर के अनुभवों को पचाने के लिए मृत्यु रूपी महानींद आवश्यक है।

मृत्यु केवल देह का रूपांतरण है। यह एक द्वार है, दीवार नहीं। जब हम एक कमरे से दूसरे कमरे में जाते हैं, तो हम पहले कमरे के लिए अदृश्य हो जाते हैं, पर हमारा अस्तित्व समाप्त नहीं होता। चेतना की यात्रा भौतिक शरीर की सीमाओं से कहीं आगे जाती है। मृत्यु वह सीढ़ी है जो हमें पुराने जीर्ण वस्त्र उतारकर नूतन वस्त्र धारण करने का अवसर देती है।

अध्याय ४: यात्रा अनंत है — मंज़िल क्या है?

यदि मृत्यु अंत नहीं है, तो मंज़िल क्या है? क्या मोक्ष मंज़िल है? या मोक्ष भी केवल एक पड़ाव है? भारतीय दर्शन कहता है कि यह यात्रा वर्तुल (cyclic) और अनंत (infinite) है।

रमण महर्षि से जब पूछा जाता था कि मृत्यु के बाद हम कहाँ जाते हैं, तो वे पूछते थे — "वे 'हम' कौन हैं जो कहीं जाएंगे? पहले उसे तो जान लो जो अभी यहाँ है।"

वास्तव में, कहीं पहुँचना नहीं है। यात्रा बाहर की नहीं, भीतर की है। हम उस कस्तूरी मृग के समान हैं जो सुगंध के स्रोत को पूरे जंगल में ढूंढता है, जबकि सुगंध उसकी अपनी नाभि से आ रही होती है। जन्म और मृत्यु इस अनंत यात्रा के स्टेशन हैं। गाड़ी किसी स्टेशन पर रुकती है, पर वह स्टेशन उसका घर नहीं होता।

यात्री अनंत है, पथ अनंत है। हर मंज़िल एक नई यात्रा की शुरुआत है। परमात्मा कोई स्थिर बिंदु नहीं है जहाँ जाकर सब रुक जाएगा; परमात्मा एक सतत सृजन है, एक नित्य नूतन प्रवाह है।

उपसंहार — मैं ही यात्रा हूँ

अंततः, सारे वेदों, उपनिषदों और गीता का सार एक ही महावाक्य में सिमट आता है —

"अहं ब्रह्मास्मि""मैं ही ब्रह्म हूँ"— बृहदारण्यक उपनिषद्

जब तक 'मैं' और 'सत्य' दो अलग-अलग हैं, तब तक यात्रा जारी रहेगी। जिस क्षण यह बोध होता है कि खोजने वाला (साधक) और जिसे खोजा जा रहा है (साध्य), दोनों एक ही हैं — उसी क्षण यात्रा पूरी हो जाती है, और साथ ही यह भी समझ आता है कि यात्रा कभी थी ही नहीं।

मृत्यु एक भ्रम है, शब्द एक इशारा हैं, और ग्रंथ एक निमंत्रण हैं। सत्य न लिखा जा सकता है, न पढ़ा जा सकता है। सत्य केवल होना है।

अज्ञात  अज्ञानी 

॥ इति ॥