अध्याय: मृत्यु—एक अनमोल आविष्कार
प्रवचन: अज्ञात अज्ञानी (Agyat Agyani)
१. अधूरी प्यास और मृत्यु का भय
साधारण मनुष्य को यह महसूस होता है कि उसे कभी मौत न आए। यह जीवन को बचाने की इच्छा नहीं है, बल्कि यह इस बात का बोध है कि 'जीवन अभी अधूरा है'। मृत्यु से बचने की कोशिश का अर्थ यह कतई नहीं है कि मनुष्य को जीवन में बहुत सुख या आनंद मिल रहा है, बल्कि सच तो यह है कि वह मरने से इसलिए डरता है क्योंकि उसने अभी तक जीया ही नहीं है।
जब तक जीवन के रस को चखा नहीं गया, तब तक अंत का भय बना रहता है। शरीर का बीमारी से गिरना तो एक भौतिक मजबूरी है, लेकिन जीवन में आनंद का न होना एक आध्यात्मिक त्रासदी है।
२. आनंद: मृत्यु का स्वागत और नया जन्म
जब जीवन में आनंद की पकड़ बन जाती है, तो वही आनंद 'मुक्ति' बन जाता है। जिसने आनंद को जी लिया, वह मृत्यु को स्वीकार नहीं करता, बल्कि उसका स्वागत करता है। उसके लिए मृत्यु कोई अंत नहीं, बल्कि:
- एक नया आविष्कार है।
- एक नया जन्म है।
- एक नया बोध और नई दुनिया है।
जिसने जीवन को 'हासिल' करने की वस्तु समझा, वह हमेशा भय, नर्क और चिंता में रहा। लेकिन जिसने जीवन को 'जीने' की घटना समझा, उसने परमात्मा को पा लिया।
३. मार्ग और गंतव्य का द्वैत (Duality)
हम अक्सर सोचते हैं कि पहले मार्ग खोजेंगे, ज्ञान और विज्ञान हासिल करेंगे, फिर जीवन जिएंगे। यह संभव नहीं है। जीवन जीना और मार्ग का मिलना एक साथ घटित होता है। मुक्ति कहीं बाहर नहीं खोजनी, आनंद कहीं बाहर नहीं ढूँढना। वह तो 'भीतर ठहरने' और 'भीतर जो घट रहा है उसे घटने देने' में है।
जैसे ही आप ठहरते हैं, दिशा स्वतः मिल जाती है।
४. पूर्णता का बोध: १% का अंकुरण
यदि आपके जीवन में आज १% की भी कमी महसूस होती है, तो उसे 'अभाव' मत मानिए। उसे मात्र एक 'अंकुरण' की आवश्यकता समझिए। ठहरने का अर्थ ही यह है कि—"मेरे पास आज कोई कमी नहीं है।"
जब आप इस पूर्णता के बिंदु पर ठहरते हैं, तो वह १% भी १००% पूर्णता का बोध कराने लगता है। अभाव केवल मन की दौड़ है; अस्तित्व में तो केवल 'पूर्णता' ही है।
इस लेख/प्रवचन का सार-सूत्र (Sutra):
"मृत्यु सुंदर है उनके लिए जिन्होंने जीवन को 'उपलब्धि' नहीं, बल्कि 'अनुभव' की तरह जिया है। ठहरना ही मार्ग है, और बोध ही गंतव्य।"