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होशपूर्ण भोग ही योग है साधु और भोगी दो नहीं, एक ही सिक्के के दो पहलू

 

भोग-योग संश्लेषण: होशपूर्ण भोग ही योग है
भोग-योग संश्लेषण

होशपूर्ण भोग ही योग है

साधु और भोगी दो नहीं, एक ही सिक्के के दो पहलू

1. पारंपरिक विभाजन

सदियों से सिखाया गया झूठा द्वैत

भोगी

सांसारिक, पतन की ओर

  • • इच्छाओं में डूबा
  • • बेहोशी में भोग
  • • समाज द्वारा निंदित

द्वैत का भ्रम

साधु

त्यागी, दमन की ओर

  • • इच्छाओं का दमन
  • • जबरदस्ती का त्याग
  • • समाज द्वारा पूजित

2. क्रांतिकारी मिलन

भोग

अनुभव

केंद्रीय सिद्धांत

होशपूर्ण भोग ही योग है

योग

जागरूकता

3. वासना से प्रेम तक स्पेक्ट्रम

चेतना बढ़ने के साथ भोग का रूपांतरण

वासना

बेहोशी में भोग

अंधकार • मजबूरी

भोग

अनुभव

ऊर्जा • गति

प्रेम

होश में भोग

प्रकाश • स्वतंत्रता

चेतना बढ़ रही है

4. ऊर्जा का रूपांतरण

भोग

(अनुभव)

+

जागरूकता

(Awareness)

=

योग

(जुड़ाव)

जैसे रासायनिक क्रिया - दो तत्व मिलकर तीसरा बनाते हैं

5. ओशो का सूत्र

"इच्छा को जबरदस्ती छोड़ना नहीं, जीना है। पका हुआ फल स्वयं गिर जाता है।"

कच्चा फल

जबरदस्ती तोड़ना

दमन - कड़वाहट रह जाती है, वासना लौटती है

पका फल

सहज गिरना

परिपक्वता - अनुभव से मुक्ति, मिठास बनी रहती है

6. दृष्टिकोण तुलना

पारंपरिक दृष्टिकोण
आधुनिक अद्वैत

भोग = पतन

पाप समझो

भोग = परिपक्वता का साधन

सीढ़ी बनाओ

योग = दमन

रोकना है

योग = चेतना का विस्तार

जानना है

साधु = विरक्त

दुनिया छोड़ो

साधु = सजग

दुनिया में रहो, बेहोशी छोड़ो

7. योगी की परिभाषा

योगी वह नहीं जो दुनिया छोड़ दे, वह है जो दुनिया में रहकर भी कर्ता न बने

साक्षी भाव - भोग में भी अलिप्त

भोग से भागो मत, भोग को जानो। जानना ही योग है।