Translate

अनुभव से बुद्धि तक, और बुद्धि से पुनः जीवन की ओर भाग 2:  1. आज मनुष्य जी कम रहा है, दिखा अधिक रहा है आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही है...

अनुभव से बुद्धि तक, और बुद्धि से पुनः जीवन की ओर भाग 2:

अनुभव से बुद्धि तक, और बुद्धि से पुनः जीवन की ओर भाग 2: 
1. आज मनुष्य जी कम रहा है, दिखा अधिक रहा है

आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही है। साधन बहुत हैं, पर आत्म-संपर्क कम है। जानकारी बहुत है, पर मौन कम है। अभिव्यक्ति बहुत है, पर अनुभव कम है।

हम जीवन को सुरक्षित रखने, व्यवस्थित करने, सिद्ध करने और सजाने में लगे हैं, पर उसे पूरी तरह जीने की क्षमता क्षीण होती जा रही है। स्क्रीन पर हजारों दृश्य हैं, पर आँख के सामने उगते सूरज को देखने का अवकाश नहीं है। बाहर का विकास बढ़ा है, भीतर का संतुलन घटा है।

2. ज्ञान जीवन का विषय बन गया है

पहले जीवन ज्ञान था, आज ज्ञान जीवन का विषय बन गया है।

मनुष्य ने जीवन को भीतर से जीने की जगह बाहर से देखना शुरू कर दिया। अनुभव की जगह विश्लेषण ने ली, सहभागिता की जगह निरीक्षण ने, और जीवन की सहजता की जगह बुद्धि का ढाँचा खड़ा हुआ। विज्ञान, व्यवस्था, शिक्षा, शास्त्र और व्याख्या के रूप इसी दूरी से स्पष्ट हुए।

3. धर्म अनुभव से कटकर व्याख्या बन गया

जब धर्म जिया कम जाता है और समझाया अधिक जाता है, तब समस्या उत्पन्न होती है।

अनुभव पीछे हटता है, तो महिमा, कथा, प्रतीक और व्याख्या केंद्र में आ जाते हैं। तब धार्मिकता जीवन की गहराई नहीं रहती, वह भाषा या आचरण का प्रदर्शन बन जाती है। जो केवल धर्म की बात करता है, वह धार्मिक प्रतीत हो सकता है, पर जो धर्म को जीता है, वही वास्तव में धार्मिक है।

4. विज्ञान जीवन से दूरी के साथ उभरता है

यह कहना उचित नहीं होगा कि विज्ञान शत्रु है। विज्ञान मानव बुद्धि की एक महान उपलब्धि है। पर दार्शनिक दृष्टि से यह भी सत्य है कि विज्ञान वहीं अधिक विकसित होता है, जहाँ मनुष्य जीवन को प्रत्यक्ष रूप से नहीं जी पाता और उसे बाहर से समझना चाहता है।

जहाँ सीधा अनुभव नहीं बचता, वहाँ प्रमाण, पद्धति, मापन और विश्लेषण की आवश्यकता बढ़ती है। विज्ञान उसी आवश्यकता की परिपक्व अभिव्यक्ति है।
भाग 3: उतर
5. पहले जीवन ही ज्ञान था

प्राचीन मनुष्य के लिए ज्ञान किसी पुस्तक या संस्था का परिणाम नहीं था। उसका ज्ञान जीवन से उत्पन्न होता था। वह प्रकृति, संबंध, श्रम, ऋतु, जन्म, मृत्यु और मौन के बीच सीखता था।

जानना उसके लिए कोई अलग बौद्धिक क्रिया नहीं थी। वह जो जीता था, वही उसका ज्ञान बनता था। जीवन ही सबसे बड़ा शिक्षक था।

6. विज्ञान कोई अलग विषय नहीं था

आज हम विज्ञान, दर्शन, चिकित्सा, अध्यात्म और खगोल को अलग-अलग शाखाओं में बाँटकर देखते हैं। पर एक समय ऐसा रहा होगा जब ये सब जीवन के भीतर ही समाहित थे।

तब जीवन स्वयं एक अखंड प्रक्रिया था। उसमें शरीर का अनुभव भी था, प्रकृति का अवलोकन भी, आकाश का बोध भी, और चेतना का स्पर्श भी। जीना ही विज्ञान था।

7. अनुभव मूल था, बुद्धि बाद में आती थी

मानव जीवन में बुद्धि का स्थान महत्वपूर्ण है, पर बुद्धि मूल नहीं है। मूल है अनुभव। पहले सत्य जीवन में घटता है, फिर बुद्धि उसे शब्द, रूप और विचार देती है।

जब अनुभव केंद्र में होता है, तब बुद्धि उसकी अभिव्यक्ति बनती है। लेकिन जब बुद्धि केंद्र में आ जाती है, तब अनुभव पीछे छूटने लगता है। यही वह बिंदु है जहाँ जीवन की ऊष्मा कम होने लगती है।

8. ऋषि विशेषज्ञ नहीं, जीया हुआ ज्ञान थे

ऋषि वह है, जिसमें ज्ञान और जीवन अलग-अलग नहीं रह जाते। वह केवल विषयों का जानकार नहीं होता, वह स्वयं अनुभव की परिपक्वता होता है।

उसमें देखने की क्षमता, जीने की गहराई और समझ की शांति एक साथ उपस्थित होती है। इसलिए ऋषि विशेषज्ञ से बड़ा है, वह जीया हुआ ज्ञान है।

9. विज्ञान को मनुष्य ने विकसित नहीं किया

यहीं उतर शुरू होता है। विज्ञान को मनुष्य ने विकसित नहीं किया, मनुष्य विज्ञान में घटा है। यदि हम यह समझ लें कि हम विज्ञान के कर्ता नहीं, कारक मात्र हैं, तो जीवन से अलगाव मिटता है।

इसे अहंकार के बिना, बोझ के बिना, किसी प्रस्ताव के बिना देखें, तो यह सब काल का खेल है, ब्रह्मांड का विस्तार है। इसमें मनुष्य की बुद्धि ने कुछ अलग से कर दिया हो, ऐसा नहीं है।

जो वैज्ञानिक समझते हैं कि हमारी बुद्धि आगे है, और जो धार्मिक समझते हैं कि जीवन अतीत में था और हम पीछे हैं, दोनों ही भूल में हैं। श्रेष्ठ बुद्धि वही है जो आज जीने लगे, संतुलन में जीने लगे।
भाग 4 : संतुलन
10. अस्तित्व स्वयं सबसे बड़ा विज्ञान है

यदि विज्ञान का अर्थ सत्य की खोज है, तो अस्तित्व स्वयं सबसे बड़ी प्रयोगशाला है। जीवन में हर क्षण परिवर्तन, संबंध, अनुभूति, जन्म, क्षय, ऊर्जा और मौन उपस्थित हैं।

जो मनुष्य सजग होकर जीता है, वह अस्तित्व को केवल पढ़ता नहीं, उसे अनुभव करता है। जो सचमुच जी रहा है, वही अस्तित्व का वास्तविक वैज्ञानिक है। उसे उत्तर सिद्धांत में नहीं, अनुभव में मिलता है।

11. असली ज्ञान यही है

असली ज्ञान यही है कि हम कुछ करते नहीं, सब हुआ है, सब हो रहा है। इसको देखते ही मनुष्य जीवन की धारा में जुड़ जाता है।

फिर जीना ही साधना है, जीना ही विज्ञान है, जीना ही धर्म है, जीना ही आनंद है, जीना ही ईश्वर है।

तो जो है, उसका विरोध क्यों? यह सब उसी की लीला है, उसी के नियम से विकसित हुआ है। जब यह दिख जाता है कि यह अंधकार भी मेरा बनाया हुआ नहीं है, तब गलती, ज्ञान, विचार, अहंकार, कुछ भी बचता नहीं। यही स्वर्ग है, यही मोक्ष है, यही योग, समाधि, बुद्धत्व है।

जो जैसा कर रहा है, करने दो। उसे अज्ञान या अधर्म मत समझो। वह समझे या न समझे, यदि वह जी रहा है तो वह जीवन में है। कोरा जानने की धार्मिकता ही नरक है।

विज्ञान है तो मैं भी विज्ञान से ही यह लिख रहा हूँ। विज्ञान न होता तो लिखना असंभव था। इसलिए अच्छा-बुरा सब छोड़कर जियो। यही परम श्रद्धा है।