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निबंध कर्त्ता, अहंकार और साक्षी-दृष्टि धर्म का असली लक्ष्य आधुनिक और पारंपरिक धर्म दोनों हमें कहते आए हैं: अच्छा बनो, नेक बनो। पर यह उपदेश अ...

कर्त्ता, अहंकार और साक्षी-दृष्टिधर्म का असली लक्ष्य

निबंध

कर्त्ता, अहंकार और साक्षी-दृष्टि

धर्म का असली लक्ष्य

आधुनिक और पारंपरिक धर्म दोनों हमें कहते आए हैं: अच्छा बनो, नेक बनो। पर यह उपदेश अक्सर व्यवहार की सतह पर ही रुक जाता है, आदर्श आचरण, नियम और अनुष्ठान पर। प्रश्न यह है कि क्या यही अच्छा होना मनुष्य का अंतिम लक्ष्य है? या धर्म का संदेश कुछ अधिक अंतःपरक, जागरण-साधक है, जिसे केवल नैतिकता में घटा देना भूल होगी?

1. प्रकृति, गुण और कर्म

किसी व्यक्ति का अच्छा या बुरा होना केवल उसकी स्वेच्छा से तय नहीं होता। जन्मजात गुण, काल और संस्कारों का जाल हमारी प्रवृत्तियों को आकार देता है।

गीता इसे सीधे कहती है:

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥ 3.27

सब कर्म प्रकृति के गुणों से होते हैं, मूढ़ अहंकार ही अपने को कर्ता मान लेता है।

इस अर्थ में नैतिकता भी एक प्राकृतिक प्रक्रिया का परिणाम है, केवल स्वतंत्र इच्छाशक्ति की अभिव्यक्ति नहीं।

2. अहंकार और धार्मिक कर्म

जब अच्छा होना ही अहंकार की पूर्ति, सम्मान या प्रतिष्ठा का साधन बन जाए, तब वही अच्छाई बंधन बन जाती है। वैदिक और बौद्ध दोनों परंपराएं यही चेतावनी देती हैं कि अज्ञान में किया गया धर्म भी अहंकार को पुष्ट कर सकता है।

रावण का तप, कंस का यज्ञ-निष्ठा-भ्रम, राजा बलि का दान, ये सब बताते हैं कि भक्ति या दान भी जब स्वरूपी पहचान का आधार बन जाए तो अहंकार में बदल जाता है। जब तक धार्मिक आचरण आत्म-समझ से नहीं जुड़ता, वह क्षणिक ही रहता है।

3. साक्षी या दृष्टा का अनुभव

बौद्ध और अद्वैत एक ही बिंदु पर मिलते हैं: जागरण। वह अवस्था जहाँ कर्ता होने का भ्रम छूटता है और व्यक्ति साक्षी बनता है।

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥ 18.61

कृष्ण का निमित्त-भाव,

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन॥ 2.47

और बुद्ध का अत्ता ही अत्तनो नाथो, सब इसी साक्षी-दृष्टि की ओर ले जाते हैं। जब यह अनुभूति स्थिर होती है, तब कर्म होते हैं पर बंधन नहीं होता। तब कर्म का उद्देश्य अहं-पूर्ति नहीं, करुणा और निःस्वार्थ सेवा बन जाता है।

4. धर्म बनाम जागरण

यदि धर्म केवल अच्छा बनना रह जाए, बिना आंतरिक जागरण के, तो वह सामाजिक नियमों का पालन और प्रतिष्ठा का आचरण बनकर रह जाता है। यही सीमित व्याख्या अहंकार बढ़ा सकती है।

असली धर्म वह है जो जगाए। बुद्ध का मूल उपदेश भी यही है: अप्प दीपो भव, पहले जागो, स्वयं को जानो। तभी जो होता है वह शुभ है।

5. नैतिकता और समाज का प्रश्न

यह सत्य है कि अधिकांश लोग पूर्ण साक्षित्व तक नहीं पहुँच पाते। इसलिए समाज में नीति, न्याय और दायित्व आवश्यक बने रहते हैं। साक्षी-स्थिति व्यक्तिगत मुक्ति का मार्ग है, पर सामाजिक कर्तव्यों का परित्याग नहीं।

भेद इतना ही है: कर्तव्य का आधार अहंकारी फल की चाह नहीं, सर्वहित-भाव होना चाहिए।

निष्कर्ष

अच्छा-बुरा, पाप-पुण्य का चक्र प्रकृति और कर्मों के नियमों में चलता रहता है। यदि धर्म केवल बाह्य नैतिक निर्देश बन जाए तो वह अहंकार को ही बढ़ाता है।

आध्यात्मिक लक्ष्य साक्षी-दृष्टि की प्राप्ति है, वह अवस्था जहाँ व्यक्ति कर्ता का भ्रम छोड़कर दृष्टा बनता है। तब कर्म होते हैं पर बंधन नहीं, तब सेवा और प्रेम स्वाभाविक बनते हैं, अहं-प्राप्ति के साधन नहीं। धार्मिक अभ्यासों का वास्तविक मंतव्य यही आत्मिक जागरण होना चाहिए, केवल बाह्य अच्छाइयों का संचय नहीं।

Independent Researcher & Philosopher

Vedanta 2.0 ©

ORCID: https://orcid.org/0009-0000-8083-0685

(इंटरनेशनल रजिस्टर्ड – विज्ञान और वेदांत का संश्लेषण)परिचय:

वेदांत 2.0 ज्ञान कोई संचित वस्तु नहीं है।

ज्ञान जीवन को देखने की क्षमता है।

शब्द उस देखने की ओर संकेत करते हैं, पर स्वयं देखना नहीं होते।

जब शब्द को सत्य मान लिया जाता है, तब अर्थ अनर्थ बन जाता है; जब शब्द को संकेत समझा जाता है, तब बोध प्रकट होता है।


"न मार्ग, न साधना, न नियम — केवल समझ।"