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गीता का वेदांत 2.0 संस्करण — "जो हैं, उसे ईमानदारी से स्वीकार करो" अक्सर लोग कहते हैं— "जो हो रहा है, सब अच्छा है।" लेकि...

गीता का वेदांत 2.0 संस्करण

गीता का वेदांत 2.0 संस्करण
— "जो हैं, उसे ईमानदारी से स्वीकार करो"
अक्सर लोग कहते हैं— "जो हो रहा है, सब अच्छा है।"
लेकिन कृष्ण का संदेश इससे भी अधिक गहरा है।
उन्होंने अर्जुन को यह नहीं कहा कि युद्ध छोड़कर संत बन जाओ। उन्होंने यह भी नहीं कहा कि अपनी प्रकृति बदल लो। उन्होंने केवल अर्जुन को उसकी वास्तविकता का स्मरण कराया।
"हे अर्जुन, तू योद्धा है।"
तेरा स्वभाव युद्ध है। यदि तू करुणा के नाम पर अपने स्वभाव से भागेगा, तो वह करुणा नहीं, भ्रम होगा। अपने स्वभाव से पलायन ही अप्रामाणिकता है।
फिर कृष्ण कहते हैं—
"निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्।"
तू अंतिम कर्ता नहीं है। तू केवल माध्यम है। अस्तित्व की विशाल व्यवस्था में घटनाएँ घट रही हैं। तू अपने अहंकार को कर्ता मत मान।
इसीलिए वे कहते हैं—
"मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठाः।"
जिन्हें तू मारने जा रहा है, वे काल की दृष्टि से पहले ही मारे जा चुके हैं। तू केवल उस घटना का दृश्य माध्यम है।
इसका अर्थ भाग्यवाद नहीं, बल्कि कर्ताभाव का विसर्जन है।
फल की चिंता वहीं करता है जो स्वयं को कर्ता मानता है।
"मैं जीतूँगा।" "मैं हारूँगा।" "मुझे पाप लगेगा।" "मुझे पुण्य मिलेगा।"
ये सब अहंकार के कथन हैं।
योद्धा का धर्म युद्ध है, व्यापारी का व्यापार, कलाकार की कला, किसान की खेती।
कृष्ण किसी को किसी और जैसा बनने के लिए नहीं कहते।
यदि आम्रपाली सामने होती, तो उसे अर्जुन जैसा बनने को नहीं कहते।
यदि वाल्मीकि सामने होते, तो उन्हें युद्ध करने को नहीं कहते।
यदि अर्जुन सामने है, तो उसे सन्यास नहीं देते।
हर व्यक्ति को उसकी अपनी ज्यामिति, उसकी अपनी प्रकृति और उसके अपने स्वधर्म में पूर्ण होने का आह्वान ही गीता का जीवंत संदेश है।
समस्या तब जन्म लेती है जब मनुष्य अपनी वास्तविक भूमिका छोड़कर किसी और का मुखौटा पहन लेता है।
पुजारी यदि व्यापारी है तो स्वयं को व्यापारी कहे।
गुरु यदि प्रसिद्धि चाहता है तो उसे स्वीकार करे।
मोटिवेशनल वक्ता यदि प्रेरणा बेच रहा है तो उसे आध्यात्मिक मुक्ति का नाम न दे।
ढोंग वहीं से प्रारंभ होता है जहाँ मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को छिपाता है।
मेरे लिए धर्म का अर्थ किसी मत, संप्रदाय या कर्मकांड से पहले ईमानदारी है।
जो हैं, उसे स्पष्ट रूप से स्वीकार करना ही धर्म है।
शेष सब अस्तित्व के नियमों के अनुसार घट रहा है।
मनुष्य इच्छा करता है, योजनाएँ बनाता है, लेकिन कितनी ही बार बिना किसी योजना के घटनाएँ घट जाती हैं। कभी अचानक सब बदल जाता है। इससे स्पष्ट है कि हमारी इच्छा अंतिम सत्ता नहीं है।
जब तक "मैं ही सब कुछ कर रहा हूँ" यह भ्रम बना रहेगा, तब तक वास्तविक स्वतंत्रता संभव नहीं।
यदि मनुष्य अकर्ता को जान ले, तभी वास्तविक कर्तृत्व का अर्थ समझ सकता है।
प्रकृति के अधीन रहकर हम स्वयं को सर्वशक्तिमान मानते हैं।
यहाँ तक कि श्रीकृष्ण भी गीता में स्वयं को काल और प्रकृति की व्यवस्था से पृथक कोई व्यक्तिगत अहंकारी सत्ता के रूप में प्रस्तुत नहीं करते। वे विराट व्यवस्था की ओर संकेत करते हैं, जहाँ व्यक्ति नहीं, अस्तित्व कार्यरत है।
अतः न बदलने की आवश्यकता है, न किसी और जैसा बनने की।
गुलाब हो तो महको।
काँटा हो तो चुभो।
योद्धा हो तो युद्ध करो।
कवि हो तो लिखो।
लेकिन जो नहीं हो, उसका अभिनय मत करो।
मेरे अनुसार यही धर्म है। यही प्रामाणिकता है। यही मुक्ति की शुरुआत है।
— अज्ञात अज्ञानी
स्वतंत्र चिंतक | VEDANTA 2.0 LIFE के लेखक
मैं न गुरु हूँ, न उपदेशक, न किसी धर्म, संप्रदाय या संस्था का प्रतिनिधि। मेरा प्रयास केवल इतना है कि जीवन को उसी रूप में देखा जाए, जैसा वह है।