अध्याय पथ — जीवन का काव्य ✧
जब तक मनुष्य मन के पार जीवन को नहीं देखता,
वह दिखने और दिखाने के बीच भटकता रहता है।
कभी त्यागी बनकर खड़ा होता है,
कभी भोगी बनकर सजता है —
पर दोनों ही वेश हैं, जीवन नहीं।
दिखना और दिखाना —
दोनों ही इस बात के प्रमाण हैं
कि अभी भीतर की पूर्णता जागी नहीं।
जहाँ जीवन मिल जाता है,
वहाँ भूमिका गिर जाती है,
और होना ही शेष रहता है।
देखो वृक्ष को —
वह खड़ा है, पर स्वयं को सिद्ध नहीं करता।
पक्षी उड़ता है, पर घोषणा नहीं करता।
नदी बहती है, पर पहचान नहीं बनाती।
केवल मनुष्य ही है
जो अपने होने पर विश्वास नहीं कर पाता।
यही उसकी कमजोरी है —
और इसी से उसकी बेचैनी जन्म लेती है।
वह शक्ति को खोजता है,
पर शक्ति पंचतत्व की तरह है —
जो बस है, बिना दावा, बिना प्रदर्शन।
तत्व खौलते हैं, बहते हैं, बदलते हैं,
पर कभी नहीं कहते — “मैं कुछ हूँ।”
मनुष्य ही कहता है — “मैं हूँ, मुझे देखो,”
और उसी क्षण वह स्वयं से दूर हो जाता है।
जीवन कोई नाटक नहीं करता।
जीव अपने होने में पूर्ण है।
केवल मनुष्य ही भूमिका गढ़ता है
और भूल जाता है कि वह पहले से पूर्ण था।
जब जीवन मिल जाता है —
त्याग भी छूट जाता है, भोग भी।
दिखना भी गिर जाता है, छिपना भी।
बस मौन बचता है —
और उसी मौन में जीवन अपना काव्य स्वयं लिखता
वेदांत 2.0