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  अध्याय — बिना चेहरा, बिना नाम ✧ जिस दिन जीवन सच में जीवित हो जाएगा, उस दिन सब सहारे स्वयं गिर जाएँगे। मैं नहीं चाहता कि कोई चेहरा ईश्वर बन...

अध्याय — बिना चेहरा, बिना नाम ✧

 अध्याय — बिना चेहरा, बिना नाम ✧

जिस दिन जीवन सच में जीवित हो जाएगा,
उस दिन सब सहारे स्वयं गिर जाएँगे।
मैं नहीं चाहता
कि कोई चेहरा ईश्वर बने,
कोई नाम गुरु बने,
कोई शब्द धर्म बन जाए।
मेरी चाहत बस इतनी है —
मनुष्य स्वयं को समझे,
बिना चेहरे, बिना नाम, बिना शास्त्र, बिना धर्म।
गुरु की तरह अपने भीतर जागे,
और जीवन को जिये —
किसी विचार की छाया में नहीं,
अपने मौन की रोशनी में।
जब जीवन नहीं होता,
तभी मनुष्य कुछ पकड़ता है।
कभी ओशो, कभी धर्म,
कभी शास्त्र, कभी धन,
कभी साधन, कभी शब्द,
कभी भगवान की कल्पना।
ये सब प्रमाण हैं —
कि अभी जीवन दूर है।
क्योंकि जहाँ जीवन होता है,
वहाँ परदे गिर जाते हैं।
गुरु, धर्म, धन, शास्त्र —
सब मंच की सजावट बनकर
मौन में विलीन हो जाते हैं।
जो भीतर नचाता है,
वह केवल शांति है।
वह आनंद है।
वह प्रेम है।
वह जीवन है —
जिसे नाम की आवश्यकता नहीं।
जहाँ लोग कहते हैं —
“मेरा गुरु बड़ा, मेरा भगवान बड़ा, मैं बड़ा,”
वहीं समझ लेना —
जीवन अभी आया नहीं।
मन कभी सत्य नहीं पकड़ता।
मन केवल पकड़कर खड़ा होता है —
और यही उसकी बेचैनी का प्रमाण है।
जीवन पकड़ा नहीं जाता,
जीवन जिया जाता है।
वेदांत 2.0 life