मानव “मैं हूँ” को सिद्ध करना चाहता है।
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मानव “मैं हूँ” को सिद्ध करना चाहता है। नाम से, पहचान से, धर्म से, उपलब्धियों से, अगले जन्म की आशा से। लेकिन अंत में रावण भी मिट्टी में मिल...
मानव “मैं हूँ” को सिद्ध करना चाहता है।
नाम से, पहचान से, धर्म से, उपलब्धियों से, अगले जन्म की आशा से।
लेकिन अंत में रावण भी मिट्टी में मिला — यह सब जानते हैं, फिर भी पकड़ नहीं छोड़ते।
क्यों?
क्योंकि मन को स्थायित्व की भूख है।
मन चाहता है कि उसका “मैं” किसी रूप में बना रहे — चाहे स्वर्ग की आशा बनाकर, चाहे भगवान बनने की कल्पना से, चाहे ज्ञान या धर्म के सहारे।
वेदांत 2.0कहा — “भगवान, गुरु, धर्म भी मन-माया का खेल बन जाते हैं” — इसमें एक गहरी बात है:
न दिखता, न सुनाई देता, न स्वाद देता — क्योंकि वह केंद्र है, अनुभव का मूल।
और मन हमेशा परिधि पर भटकता रहता है — रूप, विचार, मान्यता, पहचान में।
इसलिए:
बहुत से गुरु “कचरा भरते” हैं — नई मान्यताएँ, नए विचार, नया बोझ।
कुछ गुरु सिर्फ संकेत देते हैं — “खाली हो जाओ।”
लेकिन खाली होना कोई दूसरा नहीं कर सकता — खुद उतरना पड़ता है।
यहाँ एक सीधी बात है:
और शायद तुम्हारी बात का मूल यही है:
जीवन अभी है। वर्तमान का बोध ही सत्य है।
बाकी सब — भविष्य की कल्पना, धर्म की कहानी, पहचान का खेल — मन की परिधि में चलता रहता है।
Vedanta 2.0: The Contemporary Path of Life, Philosophy, and Spiritual Insight
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