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  यह कहने की आग में हर मानव जलता है। नाम बनाकर, धर्म पकड़कर, ज्ञान सजाकर, भगवान गढ़कर — बस एक ही पुकार भीतर चलती है — “देखो… मैं हूँ।” रावण...

हर मानव जलता है।

  यह कहने की आग में

हर मानव जलता है।
नाम बनाकर, धर्म पकड़कर,
ज्ञान सजाकर, भगवान गढ़कर —
बस एक ही पुकार भीतर चलती है —
“देखो… मैं हूँ।”
रावण भी जानता था मिट्टी है अंत,
फिर भी सोने की लंका बनाई।
हम भी जानते हैं —
सब गिर जाएगा,
फिर भी पकड़ नहीं छूटती।
अगले जन्म की आशा,
कभी सिद्ध होने का सपना —
मन की सबसे पुरानी चाल है।
सत्य खड़ा है —
न आँखों में, न शब्दों में,
न स्वाद, न स्पर्श, न ध्वनि में।
वह केंद्र है —
जहाँ पहुँचे बिना
परिधि का चक्कर खत्म नहीं होता।
गुरु आते हैं —
कुछ नया कचरा दे जाते हैं,
कुछ आईना पकड़ाते हैं।
पर खाली होना —
किसी की कृपा नहीं,
अपनी गिरती हुई पकड़ है।
भगवान परिधि में खड़े हैं,
भीड़ में बिकते हुए।
केंद्र मौन है —
वर्तमान की साँस में।
जीवन अभी है।
यहीं।
जहाँ “मैं” गिरता है —
और होना बचता है।
वेदांत 2.0 Life