अध्याय: सत्य का अधिष्ठान और साक्षी भाव
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अध्याय: सत्य का अधिष्ठान और साक्षी भाव १. सत्य का केंद्र: बाहर नहीं, भीतर सत्य कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे बाहर से खोजकर लाया जाए। जो बाह...
अध्याय: सत्य का अधिष्ठान और साक्षी भाव
१. सत्य का केंद्र: बाहर नहीं, भीतर
सत्य कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे बाहर से खोजकर लाया जाए। जो बाहर से लाया जाता है, वह विचार या धारणा हो सकती है, किंतु जीवंत सत्य नहीं। सत्य वह आधार है जिस पर हमें खड़ा होना है। जब हम सत्य में स्थित होते हैं, तब खोजना समाप्त हो जाता है और 'होना' (Being) शुरू होता है।
२. कर्ता का विसर्जन और प्रकृति का कार्य
सत्य का वास्तविक उपयोग तब होता है जब मनुष्य स्वयं 'कर्ता' बनने के मोह को त्याग देता है। जब तुम बीच से हट जाते हो, तब तुम सत्य के मार्ग में बाधा नहीं बनते। इस 'हटने' की स्थिति में ही प्रकृति अपना कार्य पूर्ण शुद्धि के साथ कर पाती है। यहाँ मनुष्य सत्य का उपयोग नहीं करता, बल्कि सत्य मनुष्य के माध्यम से स्वयं को प्रकट करता है।
३. प्रतीकों का भ्रम और सत्य की गुलामी
जो लोग केवल मूर्तियों, अतीत की घटनाओं या इतिहास के संकेतों को पकड़कर बैठे हैं, वे सत्य की जीवंतता से दूर हैं। आज की विडंबना यह है कि लोगों ने सत्य को अपना गुलाम बना लिया है—अपनी मान्यताओं और स्वार्थों को सही ठहराने के लिए सत्य को एक 'ढाल' की तरह उपयोग किया जा रहा है। यह सत्य का सम्मान नहीं, बल्कि उसके नाम पर झूठ का खेल है।
४. धार्मिक कोने का अवलोकन
सत्य की बिना समझ के धर्म केवल एक आवरण है। वास्तविक धार्मिकता उस कोने में खड़े होने में है जहाँ से तुम जीवन के खेल को बिना किसी हस्तक्षेप के देख सको। जब तुम सत्य को स्वयं को सौंप देते हो, तब तुम कर्म तो करते हो पर उसके बोझ (Ego) से मुक्त रहते हो।
सत्र का सार:
"सत्य वह नहीं जिसे तुम सिद्ध करो, सत्य वह है जिसमें तुम सिद्ध हो जाओ। जब तक सत्य तुम्हारी ढाल है, तब तक तुम युद्ध में हो; जिस दिन तुम सत्य की ढाल बन जाओगे, उस दिन तुम बुद्ध हो।"
About author: vedanta 2.0 Life
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