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  अंधे भक्त,अंधे गुरु,अंधे धर्म, अपने आप की पहचान करे, स्त्री = गुरु = धरती = प्रकृति ये चारों एक ही तत्व की भिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। इनका ...

अंधे भक्त,अंधे गुरु,अंधे धर्म, अपने आप की पहचान करे,

 अंधे भक्त,अंधे गुरु,अंधे धर्म, अपने आप की पहचान करे,

स्त्री = गुरु = धरती = प्रकृति
ये चारों एक ही तत्व की भिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। इनका स्वभाव है: देना। मौन देना। निरंतर देना।
मूल बात जो तुम कह रहे हो
1. असली गुरु का धर्म: बुलाना नहीं, उपलब्ध रहना
स्त्री, धरती, प्रकृति — ये तीनों कभी विज्ञापन नहीं करतीं।
धरती नहीं चिल्लाती "मुझ पर बीज डालो"।
स्त्री का मौन ही उसका आमंत्रण है: "उपयोग हो जाऊँ"।
गुरु भी वही है। जो बुलाए, जो विज्ञापन करे, जो भीड़ जुटाए — वह वेश्यावृत्ति है। ज्ञान की वेश्यावृत्ति।
असली गुरु सिर्फ उपलब्ध रहता है। जिसकी प्यास जगी, वह पात्र हो गया। गुरु पात्रता नहीं पूछता।
2. स्त्री को छोड़कर कोई सिद्ध नहीं हुआ
शिव की पार्वती थीं। शिव आदेश पालक थे, पार्वती आदेश थीं।
तुलसी को रत्नावली ने धक्का दिया — "हाड़-मांस की देह में क्या रखा है?" तुलसी भागे नहीं, स्त्री ने ही गुरु बनकर भेजा।
बुद्ध ने यशोधरा को छोड़ा नहीं — राहुल आ गया था। उत्तराधिकारी दे दिया, तब गए। जो उपयोग करे वह मिल गया, तब मुक्त हुए।
जो स्त्री से भागता है, वह प्रकृति से भागता है। जो प्रकृति से भागा, वह कहाँ पहुँचेगा?
जंगल, संन्यास, भगवान — सब धोखा है अगर स्त्री-तत्व का तिरस्कार किया।
3. तीन लोक का सूत्र
जिसने स्त्री को गुरु मान लिया — यानी जिसने ग्रहण करना सीख लिया, जिसने मौन आमंत्रण सुन लिया — उसके लिए तीनों लोक खुल जाते हैं।
क्यों? क्योंकि स्त्री = प्रकृति = धरती। ये तीनों ही लोक हैं।
भू-लोक धरती। भुव-लोक प्रकृति। स्व-लोक स्त्री-तत्व की चेतना।
स्त्री शिष्य के आगे तीनों लोक हार जाते हैं — क्योंकि वह लड़ता नहीं, ग्रहण करता है।
विकृति कब आती है
जब स्त्री को, धरती को, गुरु को "कहना पड़े" — तब विकृति है।
विज्ञापन वेश्यावृत्ति है।
आज धर्म का विज्ञापन हो रहा है, गुरु का विज्ञापन हो रहा है, स्त्री का भी विज्ञापन हो रहा है।
यह तीनों की विकृत स्थिति है। स्वभाव से च्युत होना है।
यह दर्शन Vedanta 2.0 life है,