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  दया का ढोंग और छिना हुआ निवाला ​(व्यवस्था की लूट और दान का सूक्ष्म अहंकार) ​१. कुदरत का प्रबंध बनाम इंसान का कब्ज़ा ​अस्तित्व का नियम है क...

दया का ढोंग और छिना हुआ निवाला

  दया का ढोंग और छिना हुआ निवाला

​(व्यवस्था की लूट और दान का सूक्ष्म अहंकार)
​१. कुदरत का प्रबंध बनाम इंसान का कब्ज़ा
​अस्तित्व का नियम है कि जीव के आने से पहले उसकी 'रोटी' का प्रबंध हो जाता है। चाहे वह पक्षी हो या इंसान, कुदरत कभी किसी को खाली हाथ नहीं भेजती।
​हकीकत: समस्या तब शुरू होती है जब इंसान की 'बुद्धि' और 'लालच' आने वाले के हिस्से पर पहले ही कब्ज़ा कर लेते हैं।
​अन्याय: जब संसाधनों पर मुट्ठी भर लोगों का कब्ज़ा हो जाता है, तो बाकी लोग स्वाभाविक रूप से 'भूखे' और 'गरीब' रह जाते हैं। यह गरीबी ईश्वरीय नहीं, बल्कि मानवीय है।
​२. पुण्य नहीं, यह कर्ज की वापसी है
​हम अक्सर हजारों गरीबों को भोजन देकर खुद को 'दानी' समझते हैं, लेकिन गहराई से देखें तो यह पुण्य नहीं है।
​हमने पक्षियों और प्रकृति का हिस्सा छीना, इसलिए उन्हें दाना देना हमारा कर्तव्य है, कोई महान कार्य नहीं।
​ठीक वैसे ही, जब हम किसी गरीब को रोटी देते हैं, तो हम उसे कुछ 'दे' नहीं रहे होते, बल्कि उस व्यवस्था द्वारा छीने गए उसके हक का एक छोटा सा टुकड़ा उसे लौटा रहे होते हैं।
​तर्क: यदि हम ईमानदारी से अपनी रोटी कमाते और दूसरों के हक पर कब्जा न करते, तो दुनिया में कोई भूखा ही न होता। जिसे हम 'दान' कह रहे हैं, वह दरअसल 'चोरी की गई संपत्ति का एक अंश' लौटाना मात्र है।
​३. 'भगवान' बनने का सूक्ष्म खेल
​यह खेल बहुत गहरा है। पहले संसाधनों पर कब्जा करो, फिर दूसरों को लाचार बनाओ, और फिर कुछ टुकड़े डालकर उनके 'दाता' या 'भगवान' बन जाओ।
​सत्ता का केंद्र: बाबा, महात्मा और समृद्ध लोग इसी लाचारी पर अपनी प्रसिद्धि का महल खड़ा करते हैं। वे गरीबों को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय उन्हें 'आजीवन भोजन' की कतार में खड़ा रखते हैं ताकि उनकी अपनी 'सत्ता' और 'स्वप्न' जीवित रहें।
​अपमान: जब एक व्यक्ति जो रोटी कमाने में समर्थ है, वह किसी दूसरे के सामने हाथ फैलाता है, तो यह केवल उसके शरीर की भूख नहीं, बल्कि उसकी आत्मा का अपमान है।
​४. बोध: थूकने जैसा सत्य
​जब एक गरीब या शोषित व्यक्ति को इस 'इंसानी बुद्धि' के खेल का पता चलता है, तो उसे उस सहायता से प्रेम नहीं, बल्कि घृणा होती है।
​जिसे वह अपना 'भाग्य' या 'संतों की कृपा' समझ रहा था, वह दरअसल उसके साथ हुआ एक बहुत बड़ा धोखा है।
​जिस दिन यह बोध घटता है, उस दिन उसे उन 'भगवानों' और 'दाताओं' के चेहरे पर थूकने का मन करता है, जिन्होंने उसकी आत्मनिर्भरता छीनकर उसे दया का पात्र बना दिया।
​निष्कर्ष: > "असली धर्म किसी को रोटी के टुकड़े डालना नहीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था और दृष्टि का निर्माण करना है जहाँ किसी को किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े। जहाँ 'होने' की गरिमा हो, न कि 'भीख' की लाचारी।"
वेदांता 2.0
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