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  शास्त्र और बोध: फर्क जो बचपन से न समझा मनुष्य प्रायः यह समझ ले लेता है कि वेद क्या कहते हैं, गीता क्या कहती है, बुद्ध क्या कहते हैं, ओशो क...

शास्त्र और बोध: फर्क जो बचपन से न समझा

 शास्त्र और बोध: फर्क जो बचपन से न समझा

मनुष्य प्रायः यह समझ ले लेता है कि वेद क्या कहते हैं, गीता क्या कहती है, बुद्ध क्या कहते हैं, ओशो क्या कहते हैं। परंतु "कौन क्या कहता है" जान लेना बोध नहीं; यह केवल शिक्षा, शास्त्रीय ज्ञान है।

आध्यात्मिक यात्रा वहीं रुक जाती है जहाँ व्यक्ति किसी शास्त्र, गुरु या विचार को अंतिम सत्य मान लेता है। तब खोज बंद हो जाती है; वह केवल अपने ज्ञान की रक्षा करता रहता है। उसका अहंकार "मैं जानता हूँ" के रूप में जीवित रहता है — और यही अहंकार उसके बोध की राह में सबसे बड़ा अड़चन बन जाता है।

योग का प्रवेशद्वार ज्ञान नहीं, अज्ञान की स्वीकृति है। जो स्वयं को अज्ञानी मानने के लिए तैयार नहीं, वह चाहे कितने ही वेद‑उपनिषद, गीता या दर्शन कंठस्थ कर ले, बोध के निकट नहीं पहुँचता। शास्त्र मानचित्र हैं, गंतव्य नहीं। जो मानचित्र को ही यात्रा समझ लेता है, वह जीवन भर मार्गों पर चर्चा करता रहता है; पर यात्रा नहीं करता।

पहले बोध, फिर प्रकाश, और उसके बाद शास्त्र का वास्तविक अर्थ खुलता है। अन्यथा शास्त्र केवल स्मृति बनकर रह जाते हैं—समझ नहीं बनते। इसी कारण एक अनपढ़ व्यक्ति भी सत्य को जान सकता है, जबकि एक अत्यधिक शिक्षित व्यक्ति केवल शब्दों का संग्रहकर्ता बना रह जाता है। सत्य का संबंध स्मृति से नहीं, जागरूकता से है।

ओशो बार‑बार इस ओर इशारा करते थे कि भारत में बहुत से लोग धर्मों के बारे में जानते हैं, पर धर्म को जीते नहीं। शास्त्रों का बोझ कभी‑कभी खोज में सहायता करने के बजाय बाधा बन जाता है, क्योंकि व्यक्ति उत्तर पहले ही स्वीकार कर चुका होता है और प्रश्न जीवित नहीं रहता।

इसे एक सूत्र में कहना जाए तो:
"शास्त्र जानना ज्ञान नहीं है; स्वयं को जानना ज्ञान है।
जो उत्तर लेकर चलता है, वह खोज नहीं करता।
जो प्रश्न बनकर जीता है, वही बोध तक पहुँच सकता है।"