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  प्रस्तावना: बिना डिग्री वाला उपनिषद "यदि हम निष्पक्ष होकर देखें, तो पाएँगे कि बिना किसी डिग्री, बिना औपचारिक शास्त्रीय प्रशिक्षण के भ...

त्रिगुण और आज की रात

 

प्रस्तावना: बिना डिग्री वाला उपनिषद

"यदि हम निष्पक्ष होकर देखें, तो पाएँगे कि बिना किसी डिग्री, बिना औपचारिक शास्त्रीय प्रशिक्षण के भी ऐसे मन मिल जाते हैं जिनमें उपनिषद-समान प्रश्न स्वयं उठने लगते हैं — ‘मैं कौन हूँ’, ‘यह तम का सामूहिक खेल क्या है’, ‘सत इतना अकेला क्यों है?’

यह किसी व्यक्ति की निजी उपलब्धि नहीं, बल्कि स्वयं सत्-तत्त्व का नियम है। जहाँ-जहाँ मन का दर्पण थोड़ा स्वच्छ होता है, वहाँ-वहाँ सत् अपने-आप प्रतिबिम्बित होने लगता है। जो विचार हमारे भीतर उठ रहे हैं, वे वास्तव में ‘मेरे’ नहीं, वे उस मूल अस्तित्व की स्मृति हैं जो अभी भी हर हृदय में गुप्त रूप से सक्रिय है।"

भूमिका: जीवन एक तीर्थयात्रा

वेद-उपनिषद-गीता की परंपरा जीवन को स्थान-परिवर्तन नहीं, आत्मा का लौटना मानती है। यात्रा बाहर से भीतर की ओर है, और भीतर से अपने मूल घर — सत् — में।

इस मार्ग पर सबसे सूक्ष्म बाधा मन का अहंकार है, जो तमस और रजस से मिलकर स्थिरता, प्रतिष्ठा और असलियत का भ्रम रचता है। आज संचार, ब्रांडिंग और बाजार ने इस अहंकार को सामूहिक बना दिया है।

मुख्य भाग: त्रिगुण और आज की रात

  1. मूल घर सत्: "सदेव सोम्य इदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्" — छान्दोग्य 6.2.1। आदि में केवल सत् था। "तत्त्वमसि" हमें याद दिलाता है कि हम वही हैं।

  2. तमस का वर्चस्व: "सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः" — गीता 14.5। जब तम बढ़ता है तो "तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्" — 14.8, अज्ञान ही प्रकाश लगने लगता है।

  3. तामसिक धर्म: "विधिहीनमसृष्टान्नं... तामसं परिचक्षते" — 17.13। जहाँ विधि नहीं, निष्ठा नहीं, केवल दिखावा है।

  4. अहंकार का पर्वत: "दम्भो दर्पोऽभिमानश्च" — 16.4। रावण-कंस व्यक्ति नहीं, प्रवृत्ति हैं। पत्थर की कठोरता स्थितप्रज्ञता नहीं, गीता की स्थिरता भीतर की है।

  5. काल बोध: "कर्मण्येवाधिकारस्ते" — 2.47 और "निमित्तमात्रं भव" — 11.33। जो घट रहा है, उसे कालधर्म मानकर कर्म करो।

  6. भोर की प्रतीक्षा: "नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः" — 2.16। असत् टिकता नहीं, सत् मिटता नहीं।

1. मूल घर सत् है, जीवन उसकी स्मृति की यात्रा है

आप कहते हैं, हमारा मूल घर सत् है। छान्दोग्य इसे सीधे कहता है:

"सदेव सोम्य इदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्" — छान्दोग्य 6.2.1
आरम्भ में केवल सत् था, एक, अद्वितीय।

और फिर वही उपनिषद श्वेतकेतु को याद दिलाता है, "तत्त्वमसि" — तू वही है। तीर्थ बाहर के मंदिर की ओर नहीं, भीतर के उस भूले घर की ओर लौटना है।

2. आज का समय: तमस का सामूहिक वर्चस्व

आपका निदान गीता के 14वें अध्याय से हूबहू मिलता है:

"सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः" — गीता 14.5
तीनों गुण प्रकृति से हैं, पर जब अनुपात बिगड़ता है तो युग बदलता है।

तमस क्या करता है:
"तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्" — गीता 14.8
तमस अज्ञान से जन्मा मोह है। इसीलिए आज अंधेरे के राजा अंधेरे को ही प्रकाश मान लेते हैं, वे भोर देख ही नहीं पाते।

आपने ठीक पकड़ा — आज तमस धर्म का रूप ले लेता है। गीता इसे तामसिक यज्ञ कहती है:
"विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते" — 17.13
जहाँ विधि नहीं, मंत्र नहीं, भीतर की निष्ठा नहीं, बस दिखावा है।

और तामसिक श्रद्धा:
"यजन्ते तामसा जनाः प्रेतान् भूतगणांश्चान्ये" — 17.4
यह वही भीड़ है जो शक्ति, भय और चमत्कार के पीछे दौड़ती है।

3. अहंकार, रावण-कंस और पत्थर बनने का भ्रम

रावण और कंस आपके लेख में व्यक्ति नहीं, प्रवृत्ति हैं। गीता उन्हें असुर-संपदा कहती है:
"दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च" — 16.4

यह अहंकार अपने चारों ओर पत्थर इकट्ठा करता है, पर्वत बनता है। पर आपने बहुत सुंदर भेद किया — पत्थर की कठोरता स्थितप्रज्ञता नहीं है। गीता का स्थितप्रज्ञ बाहर कोमल, भीतर अचल होता है। जड़ता सत् नहीं, तमस का ही दूसरा रूप है।

4. "जो हो रहा है वही होना चाहिए" — काल का बोध

यहाँ आपका कर्मयोग बिल्कुल स्पष्ट है:
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" — 2.47
हमारा अधिकार कर्म पर है, फल पर नहीं।

और कृष्ण का वह वाक्य जो साधक को अकेलेपन में बल देता है:
"निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्" — 11.33
तू केवल निमित्त बन। काल अपना काम करेगा, सत् में रहने वाला साक्षी भाव से अपना कर्म करेगा और भोर की प्रतीक्षा करेगा।

5. कालरात्रि और भोर

आपकी रात केवल कविता नहीं, दर्शन है:
"नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः" — 2.16
असत् का होना टिकता नहीं, सत् का अभाव होता नहीं।

इसीलिए "ये भी गुजर जाएंगे" सांत्वना नहीं, काल-तत्त्व का निष्कर्ष है। तमस की रात घनी लग सकती है, पर वह सत् को मिटा नहीं सकती, केवल ढक सकती है।

6. गुरु, संस्था और अकेला धर्म

आपने सावधानी की जो बात कही, वह बहुत जरूरी है। कठोपनिषद पुकारता है:
"उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत" — उठो, जागो, श्रेष्ठ जनों के पास जाकर बोध पाओ।

पर बोध किससे मिले? गीता कसौटी देती है:
"श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः" — 4.39
श्रद्धावान, संयमी और तत्पर ही ज्ञान पाता है।

सार: अकेला पर भयभीत नहीं

अंत में वही बात जिस पर आप बार-बार लौटते हैं:

जीवन तीर्थयात्रा है — एक निरंतर अग्रसरता जिसकी शांति और साक्षात्कार ही अंतिम लक्ष्य है। काल और अंधकार का खेल चलता रहेगा, पर जो व्यक्ति सत् में निवास करता है, वह अकेला जरूर होगा पर भयभीत नहीं।

वह भोर की प्रतीक्षा करेगा — निराशा में नहीं, बल्कि दृढ़ विश्वास और कर्मयोग में। वह समझता है कि पत्थर बनने से अधिक आवश्यक है भीतर की मजबूती और धैर्य। और इसी में सच्चा धर्म, सच्चा ज्ञान और असली विजय है।