सुविधाजनक धार्मिकता का पाखंड
यह धर्म नहीं, बल्कि सुविधा का चुनाव है:
मीनू कार्ड वाली जीवनशैली: धर्म को एक अनुशासन की जगह "क्या खाएं, क्या न खाएं, कैसे बैठें" का एक मीनू कार्ड बना दिया गया है। जब धर्म आचरण की जगह केवल क्रियाकांड (Rituals) बन जाता है, तब ऐसे ही बचकाने सवाल पैदा होते हैं कि "घर के कॉकरोच का क्या करें?"
चुनिंदा दया (Selective Compassion): एक कॉकरोच को मारने में हिचकिचाहट दिखाना और उसे 'अहिंसा' का नाम देना आसान है। लेकिन उस थाली में पड़े अनाज के पीछे जो खेतों में लाखों कीट-पतंगों, चूहों और जीवों का संहार हुआ है, उसे अनदेखा करना मानसिक अंधेपन का सबूत है। वह अनाज 'बलि' मांगता है, तब जाकर बाज़ार पहुँचता है।
विश्व गुरु का भ्रम: जिस देश को हम 'विश्व गुरु' कहते हैं, वहाँ अगर शिक्षित समाज भी भोजन की प्रक्रिया (Supply Chain) की बुनियादी हकीकत से बेखबर होकर कॉकरोच पर धार्मिक उपदेश झाड़ता है, तो यह बौद्धिक दिवालियापन है।
पाखंड का भूगोल।
अंधकार और विरासत
जब हम वास्तविकता को छोड़कर केवल प्रतीकों (Symbols) को पूजने लगते हैं, तो देश 'धरोहर' नहीं बल्कि 'पाखंड का केंद्र' बन जाता है। असली धर्म तो यह बोध था कि "मैं" कर्ता नहीं हूँ, सब कुछ अस्तित्व की एक लहर है। लेकिन यहाँ तो "मैं" को बचाने के लिए कॉकरोच तक का सहारा लिया जा रहा है ताकि खुद को धार्मिक सिद्ध किया जा सके।
यह गुरु-शिष्य का खेल दरअसल एक मनोवैज्ञानिक सुरक्षा कवच है। शिष्य को लगता है उसने एक 'मृदुभाषी' गुरु पा लिया और गुरु को लगता है उसने एक 'जिज्ञासु' चेला। दोनों मिलकर उस कड़वे सच से भाग रहे हैं कि जिस भोजन पर वे पल रहे हैं, वह भी संघर्ष और मृत्यु से उपजा है।