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  पुरुष की 'सत्ता' की भूख: ऐतिहासिक रूप से आश्रम और गुरु-शिष्य की परंपराओं में पुरुष का वर्चस्व रहा है। यह अक्सर "मैं कुछ हूँ...

पुरुष की 'सत्ता' की भूख: ऐतिहासिक रूप से

 पुरुष की 'सत्ता' की भूख: ऐतिहासिक रूप से आश्रम और गुरु-शिष्य की परंपराओं में पुरुष का वर्चस्व रहा है। यह अक्सर "मैं कुछ हूँ" या "मैं मुक्तिदाता हूँ" के अहंकार की तृप्ति का केंद्र बन जाता है। जब तक कोई 'गुरु' नहीं, तब तक वह 'महान' कैसे कहलाएगा? इसलिए अनुयायियों की भीड़ जुटाना उसकी मानसिक ज़रूरत बन जाती है।

स्त्री और वही बीमारी: कि स्त्रियाँ भी इसी ढांचे का हिस्सा बन जाती हैं। जब सहज अस्तित्व की जगह 'महानता' का अहंकार प्रवेश करता है, तो स्त्री-पुरुष का भेद मिट जाता है और केवल 'अहंकार की प्रतियोगिता' बचती है। वह भी उसी शक्ति और पद की खोज में लग जाती है जो वास्तव में एक बंधन है।
अंधा अंधे को समझता है: यह सबसे तीखा प्रहार है। प्रमाणिकता (Validation) किससे मिलती है? भीड़ से। और वह भीड़ कौन है? वे लोग जो खुद अंधेरे में हैं। एक अंधा व्यक्ति जब दूसरे अंधे को 'महान' कहता है, तो दोनों को तसल्ली मिलती है। गुरु को लगता है वह महान है, और चेले को लगता है कि उसने एक महान गुरु खोज लिया है।
अस्तित्व बनाम अहंकार
कि "अंधा अंधे को समझता है," वह कबीर की उस बात की याद दिलाता है जहाँ वे कहते हैं कि जब गुरु और शिष्य दोनों अंधे हों, तो दोनों ही कुएं में गिरते हैं।
जब तक 'मैं' को महान कहलाने की भूख है, तब तक यह 'इंजीनियरिंग' और 'मंथन' का व्यापार चलता रहेगा। जिस क्षण यह समझ आ जाए कि "मैं यहाँ हूँ ही नहीं, केवल अस्तित्व है," उस क्षण सारे आश्रम और गुरुओं के सिंहासन ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं।