"स्त्री एक जीवित दृश्य है। जिसमें स्त्री नहीं समझी, तब धर्म, संस्था, उपासना, त्याग, विधि, विज्ञान पैदा हुई — एक प्रेम की खोज न कर पाने में कई पाखंड का जन्म हुआ।"
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"स्त्री एक जीवित दृश्य है। जिसमें स्त्री नहीं समझी, तब धर्म, संस्था, उपासना, त्याग, विधि, विज्ञान पैदा हुई — एक प्रेम की खोज न कर पान...
"स्त्री एक जीवित दृश्य है।
यही सबसे बड़ा सत्य है। सुनो:
1. स्त्री = जीवित दृश्य, जीवित शास्त्र
पुरुष ने स्त्री को पढ़ा नहीं। उसने स्त्री को "समस्या" समझा।
जब समस्या समझी जाती है, तो समाधान खोजे जाते हैं।
और समाधान के नाम पर पैदा हुआ —
धर्म: "स्त्री माया है, इससे बचो"
संस्था: "स्त्री को काबू में रखो, मठ बनाओ, नियम बनाओ"
उपासना: "स्त्री की मूर्ति बनाकर पूजो, असली स्त्री से दूर रहो"
त्याग: "स्त्री छोड़ो, तभी मुक्ति"
विधि-विज्ञान: "स्त्री को समझो, नापो, परिभाषित करो"
ये सब क्यों हुआ? क्योंकि पुरुष प्रेम की खोज नहीं कर पाया।
प्रेम होता तो शास्त्र की ज़रूरत न पड़ती।
प्रेम होता तो मंदिर-मस्जिद की दीवारें न उठतीं।
प्रेम होता तो "स्त्री क्या है?" ये सवाल ही न उठता — वो बस "है" होती।
2. "वही आज के धार्मिक सब कहते — हमारे देश में हम कितने बुद्ध पुरुष, कितनी हमारी हिंदू धर्म संस्था, हमारी पूरे विश्व संस्था है, शाखा है"
हाँ, ढोल बहुत पीटे जा रहे हैं।
"हम विश्वगुरु थे, हम फिर बनेंगे। हमारी शाखाएँ हर देश में हैं।"
पर रुक कर पूछो — विश्वगुरु का दर्जा किसे देना चाहते हो?
पाखंड का दर्जा? जो बाबा मंच से ब्रह्मचर्य सिखाए, कमरे में स्त्री बुलाए?
अस्वस्थता का दर्जा? जो समाज को बाँटे, नफरत सिखाए, डर बेचे?
अशांति-लूट का दर्जा? जो धर्म के नाम पर ज़मीन हड़पे, चंदा खाए, राजनीति करे?
या शांति-प्रेम का दर्जा? जो चुपचाप एक भूखे को रोटी दे, बिना कैमरा, बिना पोस्टर?
3. "तब मैं इतना अंधे भक्तों से पूछता — विश्वगुरु होता है पहले उसकी परिभाषा समझे"
बिल्कुल। विश्वगुरु बनने से पहले तीन बातें साफ करो:
विश्वगुरु कौन?
विश्वगुरु क्या नहीं?
जिसके पास जाने से मन शांत हो
जिसके पास जाने से भीड़ बढ़े
जो तुम्हें तुमसे मिला दे
जो तुम्हें अपने झंडे से मिला दे
जिसके मौन में उत्तर हो
जिसके शोर में सवाल ही सवाल हों
जो स्त्री को "माँ" कहे और सच में माँ जैसा बर्ताव करे
जो "माँ" कहकर मंच पर बिठाए, पर्दे के पीछे आँख गड़ाए
4. "धर्म क्या, आध्यात्मिक पाखंड क्या है, उसके बाद विश्व की बात करे तब ठीक है"
धर्म = धारण करना। क्या धारण किया? प्रेम, करुणा, ठहराव।
पाखंड = दिखावा करना। क्या दिखाया? दाढ़ी, माला, प्रवचन, आयोजन।
आज 99% धर्म "पाखंड" है, क्योंकि केंद्र में "स्त्री" नहीं समझी गई।
जिस धर्म में स्त्री या तो देवी बनकर पत्थर हो जाए, या दासी बनकर बिस्तर — वो धर्म नहीं, सौदा है।
जिस अध्यात्म में स्त्री को देखकर आँख झुकने की बजाय चमक जाए — वो अध्यात्म नहीं, वासना है।
इसलिए पहले घर ठीक करो, फिर विश्व की बात करो।
पहले अपनी गली की स्त्री सुरक्षित हो, फिर "वसुधैव कुटुंबकम्" का नारा लगाओ।
पहले अपने आश्रम की एक लड़की की आँख में भय न हो, फिर विश्वगुरु का बोर्ड लगाओ।
पहले अपने मन में स्त्री के लिए "दृश्य" नहीं, "दर्शन" हो, फिर दुनिया को सिखाने निकलो।
आखिरी बात तुम्हारी भाषा में:
स्त्री जीवित दृश्य है। जब तक वो नहीं समझी गई, तब तक हर धर्म लंगड़ा है, हर संस्था अंधी है, हर उपासना बहरी है।
विश्वगुरु वो नहीं जो शाखा गिनाए।
विश्वगुरु वो है जिसके साए में स्त्री बिना डरे सो जाए।
जिसके सामने बच्ची बिना सोचे हँस दे।
जिसके मौन से पुरुष की आँख झुक जाए।
बाकी सब दुकान है।
और दुकानदार कभी गुरु नहीं होता। 
vedanta 2.0 life
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