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  जीवन—तीर्थ यात्रा: सत्, तम और आज की रात यदि हम निष्पक्ष होकर देखें, तो पाएँगे कि बिना किसी डिग्री या औपचारिक शास्त्रीय प्रशिक्षण के भी ऐसे...

जीवन—तीर्थ यात्रा: सत्,

 

जीवन—तीर्थ यात्रा: सत्, तम और आज की रात

यदि हम निष्पक्ष होकर देखें, तो पाएँगे कि बिना किसी डिग्री या औपचारिक शास्त्रीय प्रशिक्षण के भी ऐसे मन मिल जाते हैं जिनमें उपनिषद-समान प्रश्न स्वयं उठने लगते हैं—“मैं कौन हूँ?”, “यह तम का सामूहिक खेल क्या है?”, “सत इतना अकेला क्यों है?”

यह किसी व्यक्ति की निजी उपलब्धि नहीं, बल्कि स्वयं सत्-तत्त्व का नियम है। जहाँ-जहाँ मन का दर्पण थोड़ा स्वच्छ होता है, वहाँ-वहाँ सत् अपने-आप प्रतिबिम्बित होने लगता है। जो विचार हमारे भीतर उठ रहे हैं, वे वास्तव में “मेरे” नहीं, वे उस मूल अस्तित्व की स्मृति हैं जो अभी भी हर हृदय में गुप्त रूप से सक्रिय है।

1. जीवन तीर्थयात्रा और “सत् ही मूल घर”

वेद-उपनिषद्-गीता की परंपरा जीवन को एक तीर्थयात्रा के रूप में देखती है। यह तीर्थयात्रा केवल स्थान परिवर्तन नहीं, बल्कि आत्मा का फिरना, साक्षात्कार की ओर बढ़ना और अंततः अपने मूल घर—सत्—में लौटना है। उस मार्ग का सारगत आनंद ही जीवन का असली उद्देश्य है।

  • मूल घर की स्मृति: उपनिषद घोषित करते हैं—“सदेव सोम्य इदमग्र आसीत”—आदि में केवल सत् था, एकमेव, अद्वितीय। वही हमारा मूल घर है; जीवन की संपूर्ण यात्रा उसी भूले हुए सत्-गृह की पुनः स्मृति है।

  • भीतर की यात्रा: गुरु श्वेतकेतु से “तत्त्वमसि” (तू वही है) कहकर बोध कराया गया। यह स्मरण कराता है कि यात्रा बाहर से भीतर, और भीतर से सत् में विलय की है।

बाधा: इस यात्रा पर विभिन्न उपादान और बाधाएँ आती हैं; सबसे प्रबल और सूक्ष्म बाधा है मन का अहंकार, जो तमस और रजस के साथ मिलकर व्यक्ति को स्थिरता, प्रतिष्ठा और असलियत के भ्रम में डाल देता है।

2. त्रिगुण, तमस का वर्चस्व और आज का समय

त्रिगुण का आदर्श चित्र हमें बताता है कि सृष्टि के भीतर तीन गुण व्याप्त हैं—सत् (प्रकाश, सत्य, स्थिर ज्ञान), रजस (गतिशीलता, काम, उत्साह) और तमस (अन्धकार, जड़ता, अज्ञान)। ये गुण न तो पूर्ण रूप से अलग हैं, न ही स्थायी; परन्तु मनोवैज्ञानिक और सामाजिक रूप में इनका अनुपात किसी युग में विशेष रूप से बढ़ जाता है।

तमस जब सत्ता बनता है

  • अज्ञान का मोह: गीता स्पष्ट कहती है कि “सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः…”—यही तीन गुण जीव को बाँधते हैं। जब किसी युग में तम का अनुपात बढ़ जाता है, तो सामूहिक चेतना पर अंधकार की छाया पड़ती है।

  • भ्रमित दृष्टि: गीता के अनुसार “तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्”—तमस अज्ञानजन्य मोह है। जब यही गुण सामूहिक सत्ता बनता है, तो अंधकार ही लोगों को प्रकाश लगने लगता है; वे वास्तविक ज्योति को देख ही नहीं पाते।

आधुनिकता की जटिलताओं ने इस स्थिति को और तीव्र कर दिया है। संचार-प्रौद्योगिकी, स्वतः की ब्राण्डिंग, पावर-डायनामिक्स और बाजारवाद ने अहंकार का दायरा बढ़ाया है। तंत्र, विधि या धर्म के नाम पर जो मन-प्रभाव चलाया गया, उसने तमस को औजार बना दिया है।

3. अहंकार, रावण-कंस और 'पत्थर' बनने का भ्रम

रावण और कंस केवल पौराणिक चरित्र नहीं, बल्कि सांकेतिक रूप से उन तामसिक शक्तियों के प्रतिनिधि हैं जो अँधेरे में ही प्रकाश देख पाती हैं। उनके लिए भोर, सत्य और विवेक एक पराई दुनिया है।

गीता असुरस्वभाव को इस प्रकार चिह्नित करती है:

“दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च…”

वही अहंकार आज धार्मिक या राजनीतिक 'पर्वत' बनकर अपने चारों ओर 'पत्थर-समूह' (अंधभक्त या चेतनाहीन भीड़) इकट्ठा करता है। आज के धार्मिक-समाज में एक सर्वसामान्य प्रवृत्ति यह दिखाई देती है कि तमस स्वयं को धर्म का रूप दे देता है—सेवा, धर्मकार्य और श्रद्धा के नाम पर आडंबर पनपते हैं।

पत्थर की कठोरता बनाम आत्मिक स्थिरता

यहाँ एक सूक्ष्म छल है जिसे समझना आवश्यक है:

विशेषतापत्थर की मजबूती (तामसिक जड़ता)आत्मिक स्थिरता (सत् की स्थितप्रज्ञता)
प्रकृतिकठोर, रूढ़ और लचीलेपन से शून्य।अंदर से दृढ़, बाहर से कोमल और संवेदनशील।
धार्मिक स्वरूपआडंबर, दिखावा और खुद को शक्तिशाली मानना।विवेक, सहानुभूति और गहरी समझ।
शास्त्रीय आधारतमस का भ्रम (दिखावटी धर्मकार्य)।गीता के स्थितप्रज्ञता के लक्षण (चित्त का सत् में टिकना)।

गीता ऐसे दिखावटी और विवेकहीन कर्मों को तामसिक मानती है:

  • तामसिक यज्ञ: “विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्… तामसं परिचक्षते”—जहाँ कर्म का नाम है, पर विवेक, विधि और आंतरिक निष्ठा नहीं, वही आज के दिखावटी धर्म-कार्य का स्वरूप है।

  • तामसिक श्रद्धा: “यजन्ते तामसा प्रेतान् भूतरूपिणश्चान्ये”—तामसिक लोग प्रेतों-भूतों की पूजा में लगे रहते हैं, जो तांत्रिक विकृतियों से जुड़ता है।

4. सत् का मार्ग, नियति और “यह भी गुजर जाएगा”

यहाँ पर सत् का मार्ग अकेलापन माँग सकता है। सत् जो वास्तविकता का गहन बोध करता है, उसे दिखावे, भीड़ और सामूहिक तमस से दूरी बनाए रखनी पड़ती है। परन्तु यह दूरी भय के कारण नहीं—यह साहसपूर्ण प्रतीक्षा और धैर्य है।

काल और नियति का बोध

  1. कर्मयोग: गीता कहती है—“कर्मण्येवाधिकारस्ते”—हमारा अधिकार कर्म पर है, काल के परिणामों पर नहीं। जो घट रहा है, उसे कालधर्म मानकर अपने सत्संकल्प से विचलित न होना ही योग है।

  2. निमित्त भाव: भगवान अर्जुन से कहते हैं—“निमित्तमात्रं भव”—काल अपना काम कर रहा है; सत् का साधक निमित्त बनकर, साक्षी भाव से, सही समय पर सही कर्म करता है।

  3. असत की क्षणभंगुरता: गीता का सूत्र है—“नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः…”—असत् की सत्ता क्षणिक है। आज तम की रात कितनी भी घनी लगे, पर सत् का अभाव कभी नहीं होता।

काल-तत्त्व का निष्कर्ष: शास्त्र जीवन को निरंतर प्रवाह बताते हैं। इसलिए “ये भी गुजर जाएंगे” केवल एक सांत्वना नहीं, बल्कि एक अकाट्य दार्शनिक सत्य है।

5. व्यावहारिक निहितार्थ: व्यक्तिगत और सामाजिक मार्ग

व्यक्तिगत स्तर पर (साधना और विवेक)

  • साधन: साधना, आत्मनिरीक्षण, गुरु-सिष्य संबंध और निरन्तर अध्ययन वे साधन हैं जो तमस के आवरण को भेदते हैं।

  • गुरु का वास्तविक अर्थ: उपनिषद पुकारते हैं—“उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत” (उठो, जागो, और श्रेष्ठ गुरु के निकट जाकर बोध पाओ)। गुरु वह जीवनदृष्टि है जो वैचारिक स्पष्टता लाए, न कि वह जो किसी पर्वत-जैसी संस्था की भीड़ में आपको फँसा दे।

  • सावधानी: गुरु-आधारित संस्थाएँ स्वयं तम का केंद्र बन सकती हैं यदि वे सत्ता और प्रतिष्ठा से जुड़ जाएँ। इसीलिए गीता कहती है—“श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं”—पर वह श्रद्धा विवेक के मानदंडों पर कसी होनी चाहिए।

सामाजिक स्तर पर (सूक्ष्म परिवर्तन)

  • यह कोई शक्ति की लड़ाई नहीं, बल्कि सूक्ष्म वैचारिक परिवर्तन है।

  • माध्यम: शिक्षा, वैचारिक विमर्श, खुले संवाद और नैतिक नेतृत्व ऐसे उपाय हैं जो समय के साथ तमस की सत्ता को चुनौती दे सकते हैं।

  • दृष्टिकोण: तमस को मिटाना समस्याओं को दबाना नहीं है; बल्कि तमस के अंश को पहचानकर उसे ज्ञान और कर्म के माध्यम से बदलना ही सच्ची क्रिया है।

निष्कर्ष

वेद-उपनिषद-गीता का अंतिम उपदेश यही है कि जीवन एक तीर्थयात्रा है—एक निरन्तर अग्रसरता जिसकी शांति, आनंद और साक्षात्कार ही अंतिम लक्ष्य है।

काल और अंधकार का खेल चलता रहेगा; पर जो व्यक्ति सत् में निवास करता है, वह अकेला जरूर होगा पर भयभीत नहीं। वह भोर की प्रतीक्षा करेगा—निराशा में नहीं, बल्कि दृढ़ विश्वास और कर्मयोग में। वह समझता है कि पत्थर बनने से अधिक आवश्यक है भीतर की मजबूती और धैर्य। और इसी में सच्चा धर्म, सच्चा ज्ञान और असली विजय है।